07/09/2026 :जहरीली शराब से 22 मौतें आईआईटी मंडी में जातिगत पोस्टर नोएडा केस में हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला सहारनपुर मस्जिद कैसे ढही इमारतें गिरने से हजारों मौतें

07/09/2026 :जहरीली शराब से 22 मौतें  आईआईटी मंडी में जातिगत पोस्टर  नोएडा केस में हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला  सहारनपुर मस्जिद कैसे ढही  इमारतें गिरने से हजारों मौतें
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मध्य प्रदेश में जहरीली शराब त्रासदी : 20 रुपये के अंतर ने ली 22 जानें, 112 की हालत बिगड़ी आईआईटी मंडी में 'शूद्रों को उच्च वर्गों की सेवा करनी चाहिए' वाले पोस्टर पर जांच के सहारनपुर में कोर्ट द्वारा 'अवैध' ठहराए जाने के महज़ तीन दिन बाद कैसे ढहाई गई 150 साल पुरानी मस्जिद राजधानी में पाँच साल में इमारतें गिरने से 169 मौतें, देश भर में लगभग 8,000 जीडीपी और बाक़ी आँकड़ों के बीच बहुत बड़ा अंतर्विरोध है: पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग आकार पटेल | 9/11 के पार 11 सितंबर के हमलों की 25वीं बरसी जल्द ही हमारे सामने होगी शुद्धव्रत सेनगुप्ता | वंदे मातरम को राष्ट्रीय मुद्दा बनाना, उस पर सवाल खड़े करता है भगवा चमक के नीचे की दरारें: जमीन पर बीजेपी का आत्मविश्वास क्यों कमजोर पड़ रहा है 'आरएसएस छिपकर काम कर रहा है': मोहन भागवत की ब्रिटेन यात्रा के खिलाफ संसद के बाहर सैकड़ों लोगों का प्रदर्शन 'गोदी मीडिया हाय-हाय' से जमीन पर विरोध तक: सीजेपी प्रदर्शन में टीवी पत्रकार निशाने पर क्यों आए मध्य प्रदेश के सागर जिले में हुई जहरीली शराब त्रासदी में22 लोगों की जानसिर्फ 20 रुपये के मामूली अंतर के कारण चली गई. जहरीली शराब के सेवन से 112 लोगों की तबीयत बिगड़ी. बंडा थाना क्षेत्र के तीन गांवों के ये शराब के लती लोग एक नकली शराब ब्रांड की लत के कारण अपनी जान देकर भारी कीमत चुका बैठे. बंडा थाने में दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, यह नकली शराब सिर्फ इसलिए बेची गई क्योंकि यह 20 रुपये सस्ती थी. लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि इलाके में 'जहरीली शराब' बिक रही थी और सरकारी तंत्र या आबकारी विभाग को भनक नहीं थी? या कारोबार सबकी मिलीभगत से चल रहा था? रबींद्रनाथ चौधरीके अनुसार, एक स्थानीय निवासी अनूप सिंह लोधी ने अपनी शिकायत में बताया कि उनके गांव के आठ लोग अवैध शराब के कारोबार में लिप्त थे. वह 4 सितंबर को अपने भतीजे राजेंद्र सिंह लोधी के साथ इनमें से एक व्यापारी की दुकान पर गए थे. व्यापारी ने उन्हें बताया कि एक लाइसेंस प्राप्त विक्रेता ने आपूर्ति नेटवर्क के माध्यम से एक नकली ब्रांड मंगवाया था, जो प्रति क्वार्टर (चौथाई बोतल) 20 रुपये सस्ता था. व्यापारी ने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि इस नकली ब्रांड का फॉर्मूला मूल ब्रांड के जैसा ही है, लेकिन 70 रुपये के मूल ब्रांड की तुलना में यह 20 रुपये सस्ता (50 रुपये का) है. आरोप है कि राजेंद्र सिंह लोधी ने वह नकली शराब पी ली और बीमार पड़ गए. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां रविवार को उनकी मौत हो गई. दो अन्य मृतकों—करतार सिंह लोधी और दिग्विजय सिंह लोधी—ने भी कथित तौर पर इसी जहरीली नकली शराब का सेवन किया था. इस बीच, जहरीली शराब त्रासदी होने से ठीक कुछ घंटे पहले आबकारी विभाग द्वारा संबंधित अधिकारियों को जारी उस आदेश ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें घातक शराब ब्रांड 'सागर गोल्ड' को 'जब्त करने' के निर्देश को बदलकर 'अब आगे किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है' कर दिया गया था. आबकारी विभाग के आधिकारिक सूत्रों ने सोमवार को बताया कि जारी किए गए आदेशों का क्रम कुछ इस प्रकार था—'इसकी बिक्री रोकें', 'संदिग्ध स्टॉक जब्त करें', और फिर 'अन्य किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है'. इस मामले में शराब ठेकेदार समेत 30 लोगों पर केस दर्ज किया गया है और 14 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया है. 'पीटीआई'की रिपोर्ट के अनुसार, आईआईटी मंडी ने अपने परिसर में लगे एक पोस्टर को लेकर जांच के आदेश दिए हैं, जिसमें लिखा था कि 'शूद्रों को उच्च वर्गों की सेवा करनी चाहिए.' 'भगवद्गीता – द टाइमलेस विजडम' (भगवद्गीता – कालातीत ज्ञान) शीर्षक से यह पोस्टर संस्थान के सभागार के बाहर प्रदर्शित किया गया था और इसमें समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभाजित किया गया था. पोस्टर में ब्राह्मणों की भूमिका 'ईश्वर के संदेश का प्रसार करना', क्षत्रियों की 'समाज और आध्यात्मिकता की रक्षा करना', वैश्यों की 'अर्थव्यवस्था को चलाना, दूसरों का समर्थन करना' और शूद्रों की 'उच्च वर्गों की सेवा करना' बताई गई थी. रविवार (6 सितंबर) को आईआईटी मंडी समुदाय को भेजे एक ईमेल में, संस्थान के निदेशक लक्ष्मीधर बेहरा ने कहा कि वे 4 सितंबर को जन्माष्टमी समारोह के दौरान प्रदर्शित इस पोस्टर के बारे में जानकर 'स्तब्ध' थे. 'परिसर के भीतर हाल ही में प्रदर्शित पोस्टर की स्पष्ट निंदा' शीर्षक वाले अपने ईमेल में, बेहरा ने कहा कि पोस्टर को संस्थान द्वारा 'किसी भी तरह से' अनुमोदित नहीं किया गया था. पीटीआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि बेहरा का खुद इस्कॉन से लंबा जुड़ाव रहा है. वर्तमान में वह आईआईटी मंडी में तीन-क्रेडिट का गीता पाठ्यक्रम पढ़ाते हैं और प्रस्तावित भक्तिवेदान्त विश्वविद्यालय के संस्थापक हैं, जो खुद को एक इस्कॉन पहल के रूप में वर्णित करता है. बेहरा ने पीटीआई को बताया कि इस मामले की जांच के लिए संकाय सदस्यों और अनुसूचित जाति व अन्य पिछड़ा वर्ग सहित विभिन्न सामाजिक श्रेणियों के प्रतिनिधियों वाली एक समिति का गठन किया गया है. आईआईटी मंडी के निदेशक पद पर अपनी नियुक्ति के तुरंत बाद, बेहरा खुद उस समय विवादों में घिर गए थे जब इंटरनेट पर एक वीडियो सामने आया था जिसमें उन्हें यह कहते सुना गया था कि वह 'पवित्र मंत्रों' का जाप करके अपने दोस्त के अपार्टमेंट और परिवार को'दुष्ट आत्माओं'से मुक्त कराने के लिए भूत भगाने (झाड़-फूंक) के कृत्य में शामिल थे. 2023 में, उन्होंने यह दावा करते हुए छात्रों को मांस न खाने की शपथ दिलाई थी कि हिमाचल प्रदेश में भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं जानवरों के प्रति क्रूरता के कारण हो रही थीं. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीय स्नातक आकृति चौधरी के खिलाफ लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के आरोपों को खारिज करते हुए राज्य प्रशासन और पुलिस तंत्र को सख्त चेतावनी दी है. न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ द्वारा दिए गए इस ऐतिहासिक 15 पन्नों के आदेश में नागरिक स्वतंत्रताओं, लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही पर विस्तृत मार्गदर्शन दिया गया है. आकृति चौधरी को नोएडा में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में हिरासत में लिया गया था. पुलिस ने इस आंदोलन को रोकने के लिए 15 एफआईआर दर्ज की थीं और लगभग 60 लोगों को जेल भेजा था. 'द इंडियन एक्सप्रेस' मेंसोम्या पंवारके अनुसार, अदालत ने पाया कि वीडियो साक्ष्यों में लोग शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगों (अधिक वेतन और काम के मानवीय घंटे) के लिए एकत्र हुए थे, न कि हिंसा फैलाने के लिए. पीठ ने माना कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में सड़कों पर उतरकर बिना हथियारों के शांतिपूर्ण आंदोलन करना शामिल है. मुख्य बिंदु और कानूनी दिशा-निर्देश 'ऑर्वेलियन डिस्टोपिया' और नौकरशाही को चेतावनी: आदेश में कहा गया कि 'नौकरशाही और पुलिस जब अपनी निष्ठा की शपथ के अनुरूप कार्य करती है, तो इस राज्य के आभारी नागरिक उन्हें अत्यंत सम्मान देंगे और सही मायनों में उन्हें ऐसे स्थान पर बिठाएंगे जिससे ईश्वर को भी ईर्ष्या हो सकती है.' लेकिन आदेश में आगे कहा गया, 'हालांकि, हर बार जब वे उस गंभीर शपथ को नजरअंदाज करते हैं और उसके विपरीत कार्य करते हैं, तो उत्तर प्रदेश राज्य के लोग उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के एक दमनकारी अवशेष के रूप में देखेंगे, जिससे उनके प्रति आक्रोश और घृणा उत्पन्न होगी तथा नागरिक अशांति का माहौल बनेगा. यह अदालत उनकी ज्यादतियों और/या गैर-कानूनी कृत्यों—विशेष रूप से जो बिना किसी पर्याप्त कारण या उचित प्रक्रिया (कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया में निहित) के नागरिकों की नागरिक स्वतंत्रता पर आघात करते हैं—को सुधारते हुए, उनके तानाशाही आचरण को दर्ज करने के अलावा, पीड़ित नागरिक को मुआवजा देने के लिए सख्त आदेश पारित कर सकती है. अन्यथा, वह दिन दूर नहीं जब नौकरशाही में मौजूद गुमराह अधिकारी उत्तर प्रदेश राज्य को एक 'ऑर्वेलियन डिस्टोपिया' में बदल देंगे.' संविधान के प्रति वफादारी: पीठ ने रेखांकित किया कि आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की प्राथमिक वफादारी संविधान और जनता के प्रति होनी चाहिए, न कि तत्कालीन राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति. अधिकारियों को याद दिलाया गया कि वे लोकतंत्र में जनता के सेवक हैं. लोकतांत्रिक सेफ्टी वाल्व के रूप में विरोध प्रदर्शन: अदालत ने कहा कि समाज में असहमति और प्रदर्शन 'प्रेशर कुकर में सेफ्टी वाल्व' की तरह काम करते हैं. दबी हुई भावनाओं को रोकने से हिंसा भड़कने का खतरा बढ़ता है. शांति भंग की केवल आशंका के आधार पर लोगों को एकत्रित होने से रोकना उनके संवैधानिक अधिकारों को खत्म करने जैसा है. एनएसए के दुरुपयोग पर रोक: उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) का उपयोग सामान्य मामलों में जमानत रोकने के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता. किसी व्यक्ति को एनएसए के तहत निरुद्ध करने के लिए ठोस और मजबूत साक्ष्य होने चाहिए, न कि केवल जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) की काल्पनिक या पूर्वाग्रह से ग्रसित राय. ऐतिहासिक मुआवजा और अधिकारियों पर व्यक्तिगत जवाबदेही: अदालत ने गौतम बुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) द्वारा शक्ति के गैर-जिम्मेदाराना प्रयोग और अनुच्छेद 21 के तहत नागरिक अधिकारों के उल्लंघन पर कड़ा रुख अपनाया. अदालत ने याचिकाकर्ता को ₹5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया और यह स्पष्ट निर्देश दिया कि इस राशि की वसूली संबंधित जिला मजिस्ट्रेट के वेतन से की जाए, साथ ही इसमें शामिल निचले स्तर के अधिकारियों (एसएचओ तक) से भी अनुपातिक वसूली हो. आदेश में कहा गया, 'यह अदालत यह भी निर्देश देती है किउक्त राशि की वसूली गौतम बुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट के वेतन से की जानी चाहिए,जिन्होंने बिना दिमाग लगाए यह हिरासत आदेश पारित किया है, और उन सभी अन्य अधिकारियों से भी की जानी चाहिए जो एसएचओ स्तर तक इसके लिए जिम्मेदार रहे हों.' राज्य को यह याद दिलाते हुए कि एक शांतिपूर्ण आंदोलन जहां लोग बिना अस्त्र-शस्त्र के एकत्र होते हैं, उसे अभी भी शरारती तत्वों द्वारा विफल किया जा सकता है (जो उन पक्षों द्वारा भेजे जा सकते हैं जिनकी रुचि यह सुनिश्चित करने में हो कि ऐसा आंदोलन टूट जाए), अदालत ने कहा कि ऐसे तत्व हिंसा के कृत्यों में लिप्त हो सकते हैं जिन्हें बाद में पूरे समूह पर मढ़ दिया जाता है जो 'स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण' है. फैसले में कहा गया, 'शांति भंग की आशंका के आधार पर लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर एकत्र होने या अपने अधिकारों के लिए आंदोलन करने से रोकना, समस्या के समाधान की जगह मुख्य अधिकार को ही खत्म कर देने जैसा होगा. यदि राज्य द्वारा ऐसा दृष्टिकोण अपनाया जाता है और अदालतों द्वारा उसका अनुमोदन किया जाता है, तो इससे सार्वजनिक स्थानों पर राय की सामूहिक अभिव्यक्ति समाप्त हो जाएगी. संविधान ऐसे अधिकार की रक्षा करता है और राज्य की केवल व्यक्तिपरक राय पर इसके साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता है. राज्य को यह भी महसूस करना चाहिए कि उसके पास एक मजबूत और शक्तिशाली पुलिस बल है, जिसे ऐसी बड़ी सभाओं में सार्वजनिक व्यवस्था सुनिश्चित करने और सभा व उसके संचालन के तरीके की वीडियोग्राफी करने में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, ताकि हिंसा भड़कने की स्थिति में जवाबदेही तय की जा सके.' यह फैसला प्रशासनिक मशीनरी को यह संदेश देता है कि अनियंत्रित शक्तियों का प्रयोग लोकतंत्र में अस्वीकार्य है और व्यक्तिगत जवाबदेही से बचना संभव नहीं है. यह खबर का सारांश है. पूरी खबरयहांपढ़ी जा सकती है. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिला कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित लगभग 115 से 150 साल पुरानी आजादी से पहले की मस्जिद को स्थानीय प्रशासन ने भारी सुरक्षा बल और बुलडोजर की मदद से ढहा दिया. यह कार्रवाई जिला अदालत द्वारा मस्जिद प्रबंधन समिति की अपील खारिज किए जाने के महज तीन दिन बाद की गई, जिससे राज्य में एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है. 'द वायर' मेंउमर राशिदकी विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, यह विवाद 2025 में बजरंग दल के एक कार्यकर्ता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के बाद शुरू हुआ. इसके आधार पर राजस्व विभाग की जांच के बाद सहारनपुर डीएम ने राज्य सरकार की ओर से मुकदमा दायर किया. प्रशासन का तर्क था कि खसरा नंबर 539 स्थित जमीन राजस्व रिकॉर्ड में सरकारी भूमि के रूप में दर्ज है, जिसे मूल रूप से विश्राम गृह के लिए बनाया गया था और बाद में अवैध रूप से धार्मिक ढांचे में बदल दिया गया. जुलाई में सिटी मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 315 वर्ग मीटर जमीन पर अनाधिकृत कब्जे के लिए 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाते हुए बेदखली का आदेश दिया था. 2 सितंबर को जिला जज सत्येंद्र कुमार ने इस आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि मस्जिद पक्ष जमीन के स्वामित्व और वैध कब्जे का कोई ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा. 5 सितंबर को सुबह प्रशासन ने बेदखली की कार्रवाई की और परिसर में किराए पर चल रहे उप-डाकघर को भी हटा दिया. मस्जिद के मुतवल्ली और प्रबंधन समिति ने जो प्रमुख बिंदु रखे, वे इस प्रकार हैं: यह ढांचा 1911 से पूर्व का है और इसे धार्मिक स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के तहत संरक्षण प्राप्त है. जमीन मूल रूप से जमींदारी रिकॉर्ड (खेवट) में दर्ज थी और 1957 से नगर पालिका तथा वक्फ (संख्या 451) के रूप में पंजीकृत थी. डाक विभाग 1960 से मस्जिद को नियमित किराया दे रहा था. उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को इस मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया गया, जो वक्फ अधिनियम की धारा 85 का उल्लंघन है. राजनीतिक प्रतिक्रिया और विवाद: मस्जिद ढहाए जाने के बाद विपक्षी दलों ने सरकार और प्रशासन की कड़ी आलोचना की. सपा सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें नजरबंद कर उच्च न्यायालय जाने से रोका गया. यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि 2027 के चुनावों से पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने और ध्यान भटकाने के लिए यह कार्रवाई जल्दबाजी में की गई. एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसीने कहा कि 100 साल से अधिक का निरंतर कब्जा 'यूज द्वारा वक्फ' और 'प्रतिकूल कब्जा' के सिद्धांत के तहत कानूनी रूप से संरक्षित है. कांग्रेस व आप सांसद क्रमशः इमरान मसूद और संजय सिंह ने कहा कि खसरा रिकॉर्ड में जमीन आज भी वहीद खान और याकूब खान के नाम दर्ज है और वक्फ बोर्ड को बिना सुने एकपक्षीय कार्रवाई की गई. बसपा प्रमुख मायावती ने मस्जिदों को जल्दबाजी में ढहाने के चलन पर रोक लगाने की मांग की. भाजपा विधायक राजीव गुंबर और प्रशासनिक अधिकारियों ने कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि प्रक्रिया पूरी तरह से कानूनी दायरों, उचित नोटिस अवधि और अदालती आदेशों के पालन के तहत पूरी की गई है. डीआईजी अभिषेक सिंह के अनुसार, शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियाती कदम उठाए गए थे. 'द हिन्दू'की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार (6 सितंबर 2026) को पाँच मंज़िला इमारत गिरने की घटना, जिसमें सोमवार (7 सितंबर) सुबह तक छह लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, एक बार फिर इस बात की भयावह याद दिलाती है कि सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वाली इमारतों पर कार्रवाई में कितनी ढील बरती जाती है. सत्य निकेतन जैसी घटनाएँ लोगों का ध्यान इसलिए खींच लेती हैं क्योंकि इनमें मरने वालों की संख्या ज़्यादा होती है और यह हादसा उस इमारत में हुआ जहाँ छात्रों को पेइंग गेस्ट के तौर पर रहने की जगह दी जाती थी. लेकिन ऐसी कई अलग-अलग घटनाएँ, जो मिलकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दर्जनों और देश भर में कई सौ लोगों की जान लेती हैं, ज़्यादातर किसी की नज़र में ही नहीं आतीं. सालाना 'भारत में दुर्घटनावश मौतें और आत्महत्याएँ' (एडीएसआई) रिपोर्टों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2020 से 2024 के बीच पाँच वर्षों में देश भर में इमारतें गिरने से कुल 7,874 लोग मारे गए. इसी अवधि में दिल्ली में 169 मौतें दर्ज हुईं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की सबसे ताज़ा उपलब्ध रिपोर्ट, एडीएसआई 2024, बताती है कि देश भर में जहाँ इन मौतों में मामूली गिरावट आई है, वहीं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 2020 के बाद से मौतें बढ़ी हैं. एडीएसआई में 'ढाँचों के गिरने' से हुई मौतों की पाँच उप-श्रेणियाँ हैं—'रिहायशी मकान/आवासीय इमारत का गिरना', 'सरकारी/व्यावसायिक इमारत का गिरना', 'बाँध का गिरना', 'पुल का गिरना' और 'अन्य'. इस रिपोर्ट में जिन आँकड़ों की बात की गई है, उनमें बाँध और पुल गिरने की श्रेणियों में दर्ज संख्याएँ शामिल नहीं हैं. देश के सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में 2024 में इमारतें गिरने से सबसे ज़्यादा 223 मौतें दर्ज हुईं. इसके बाद ज़्यादा शहरीकृत और (2011 की जनगणना के मुताबिक़) आबादी के लिहाज़ से दूसरे नंबर के राज्य महाराष्ट्र में 220 मौतें हुईं. 2024 में दिल्ली में हुई मौतों की संख्या (42) देश में 12वें नंबर पर थी, लेकिन राजधानी में हर साल दोहराई जा रही इन मौतों को उसकी आबादी के अनुपात में देखा जाए तो तस्वीर ज़्यादा चिंताजनक है. एडीएसआई रिपोर्टों के मध्य-वर्ष आबादी अनुमानों के आधार पर निकाले गए आँकड़े बताते हैं कि प्रति दस लाख आबादी पर इमारतें गिरने से हुई मौतों के मामले में दिल्ली 2022, 2023 और 2024 में देश में दूसरे या तीसरे स्थान पर रही. 2025 की एडीएसआई रिपोर्ट अभी आनी बाक़ी है, लेकिन मीडिया में आई ख़बरों के संकलन से पता चलता है कि जनवरी 2025 से अब तक 20 घटनाओं में कम से कम 70 लोगों की जान जा चुकी है. (मूल रिपोर्ट में दिया गया नक़्शा 2024 से अब तक मीडिया में दर्ज ऐसी घटनाएँ दिखाता है, जिनमें रविवार का सत्य निकेतन हादसा भी शामिल है.) जन आक्रोश भड़काने वाली घटनाओं के बाद ज़्यादातर सरकारी एजेंसियाँ जिस अनुमानित जल्दबाज़ी के साथ काम करती हैं, वैसी ही प्रतिक्रिया दिल्ली नगर निगम की भी रही—सत्य निकेतन हादसे के बाद उसने कहा है कि वह सभी अवैध पाँच मंज़िला और उससे ऊँची इमारतों को 'तत्काल' सील करेगा. लेकिन इस रिपोर्ट में जिन आँकड़ों की चर्चा की गई है, वे बताते हैं कि इसके पीछे की व्यवस्थागत समस्या के लिए सोची-समझी दीर्घकालिक रणनीतियाँ चाहिए—ऐसी रणनीतियाँ जो सस्ते आवास की बढ़ती ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए इन टाली जा सकने वाली मौतों को ख़त्म करें. 'द हिन्दू'में प्रकाशित सुभाष चंद्र गर्ग की लेख के मुताबिक, भारत के ताज़ा जीडीपी अनुमानों ने सरकारी आँकड़ों की विश्वसनीयता, कार्यप्रणाली, आँकड़ों की गुणवत्ता और आर्थिक वृद्धि की व्याख्या पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है. सरकार ने संशोधित आँकड़ों का बचाव बेहतर कवरेज और कार्यप्रणाली में बदलाव का हवाला देकर किया है, लेकिन पारदर्शिता और अर्थव्यवस्था के आकार में हुए तीखे संशोधनों को लेकर सवाल बने हुए हैं. द हिंदू को दिए अपने लिखित जवाबों में पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने सरकार की इस सफ़ाई, आँकड़ों की गुणवत्ता पर अपनी चिंताओं, देश की सांख्यिकीय जाँच-पड़ताल में कथित राजनीतिक दख़ल, नीतिगत नतीजों और भारत के विकास-आख्यान से जुड़ी विश्वसनीयता की चुनौती पर बात की है. भारत में परंपरागत रूप से नई जीडीपी शृंखला को पुरानी शृंखला से स्प्लाइसिंग, पुनर्आकलन और बैक-सीरीज़ बनाकर जोड़ा जाता रहा है. जनता से वृद्धि दर मान लेने के लिए कहने से पहले एमओएसपीआई 2011-12 और 2022-23 की शृंखलाओं के बीच एक पारदर्शी पुल क्यों न बनाए? उस पुल में क्या दिखना चाहिए? बिल्कुल जायज़ माँग है. एमओएसपीआई को 2011-12 से 2021-22 तक की बैक-सीरीज़ के आँकड़े जारी करने की समय-सारिणी घोषित करनी चाहिए. ऐसा लगता है कि सरकार इस बारे में बहुत गंभीर नहीं है, क्योंकि अब तक ऐसा कोई कार्यक्रम घोषित नहीं किया गया है. वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही की जीडीपी में हुए लगभग 6 लाख करोड़ रुपये के संशोधन का पारदर्शी ब्योरा जारी करके सरकार इस पूरे विवाद को पहले ही रोक सकती थी. ऐसा क्यों नहीं किया गया, और आपके ख़याल से उस ब्योरे में क्या सामने आता? 6 लाख करोड़ रुपये की नॉमिनल जीडीपी में कमी का सवाल 2022-23 से 2024-25 तक जाता है. सिर्फ़ 2024-25 के लिए ही जीडीपी 12.70 लाख करोड़ रुपये तक घटा दी गई है. सरकार ने यह नहीं बताया कि यह कटौती क्यों करनी पड़ी. उसने इसे इस आम दलील की आड़ में दबा देने की कोशिश की है कि यह नई कार्यप्रणाली, व्यापक कवरेज, नए सूचकांक वग़ैरह से पैदा हुए नए आँकड़ों की वजह से है. यह दलील बेहद कमज़ोर है, क्योंकि बेहतर कवरेज से नॉमिनल जीडीपी बढ़ती है, घटती नहीं. सरकार ने ब्योरा क्यों नहीं दिया, इसकी वजह शायद यही है कि उसे इसकी व्याख्या करने में भारी मुश्किल पेश आ रही है. मेरे आकलन में इसकी सिर्फ़ दो ही व्याख्याएँ हो सकती हैं. एक, सिस्टम से गड़बड़ी हुई, जिससे दोहरी गिनती, गिनती की ग़लतियों वग़ैरह के चलते जीडीपी बढ़ी-चढ़ी दिखी. दूसरी, ऊँची वृद्धि दर का दावा करने के लिए जीडीपी को जान-बूझकर बढ़ाकर दिखाया गया और जब काम निकल गया तो नई शृंखला का मौक़ा लेकर उसे चुपचाप घटा दिया गया. वैसे, जीडीपी में यह कमी आगे भी असल से ऊँची वृद्धि दर दिखाने में मदद करती है. अगर अर्थशास्त्रियों, रेटिंग एजेंसियों और फ़ंड मैनेजरों ने भारत की वृद्धि की अपनी समझ पुराने जीडीपी अनुमानों के इर्द-गिर्द बनाई थी, तो एक बड़े सांख्यिकीय संशोधन से अर्थव्यवस्था का मापा गया आकार और उसकी दिशा बदल जाने पर ज़िम्मेदारी किसकी है? मुझे नहीं लगता कि सरकार में कोई ज़िम्मेदारी लेता है. नुक़सान कारोबारियों और निवेशकों को उठाना पड़ता है, रुपये के अवमूल्यन और शेयर बाज़ार से कम या नकारात्मक रिटर्न की शक्ल में. अगर जीडीपी डिफ्लेटर आख़िरकार क़ीमतों का ही एक पैमाना है, तो आपको कितना भरोसा है कि भारत का मौजूदा क़ीमत-ढाँचा उन क़ीमतों को पकड़ता है जो उत्पादक असल में चुकाते हैं—ख़ासकर सेवाओं, अनौपचारिक गतिविधि और मूल्य-वर्धन शृंखलाओं में—बजाय उन सूचकांकों के जिन्हें देखना आसान है? क्या डिफ्लेटर आँकड़ों के भीतर से संगत होते हुए भी कंपनियों और परिवारों की भोगी हुई महँगाई को व्यवस्थित रूप से कम करके आँक सकता है? डिफ्लेटर मापने में अंतरराष्ट्रीय स्तर की बेहतरीन पद्धतियाँ अपनाने की दिशा में कुछ स्वागतयोग्य हलचल तो है, लेकिन मौजूदा हालात ने एक ऐसा नतीजा सामने रखा है जिसका मेल बैठता नहीं दिखता. जब उपभोक्ता महँगाई 4% से ऊपर है और उत्पादक महँगाई 9% है, तो बाक़ी वस्तुओं और सेवाओं में (जिनका ब्योरा अभी सार्वजनिक होना बाक़ी है) इतनी नकारात्मक या कम महँगाई हो ही नहीं सकती कि पहली तिमाही में डिफ्लेटर 2.5% पर आ जाए. भीतरी असंगति निश्चित रूप से गंभीर है, और इसकी पारदर्शी व्याख्या ज़रूरी है. अगर डबल डिफ्लेशन दुनिया भर में स्वीकृत पद्धति है, तो बहस पद्धति के सिद्धांत पर होनी चाहिए या इस पर कि भारत के पास इसे सांख्यिकीय भरोसे के साथ लागू करने लायक़ बारीक और विश्वसनीय उत्पादन, इनपुट और क़ीमत के आँकड़े हैं भी या नहीं? शेयर बाज़ारों में सीएएस की तरह, हर अंतरराष्ट्रीय बेहतरीन पद्धति को भारत में आसानी से और बिना तकलीफ़ के लागू नहीं किया जा सकता. इसके लिए सिस्टम को बारीकी से तैयार करना होगा और भरोसेमंद उत्पादन, इनपुट तथा क़ीमत के आँकड़े खड़े करने होंगे. जब तक नई पद्धति जमकर विश्वसनीय आँकड़े और नतीजे देने न लगे, तब तक दोनों व्यवस्थाएँ साथ-साथ चलाना और पुराने दौर वाला डिफ्लेटर इस्तेमाल करना समझदारी होगी. क्या डबल डिफ्लेशन विनिर्माण की माप की समस्या हल कर देता है—या अगर आउटपुट और इनपुट क़ीमत सूचकांक ख़ुद ही ठीक से नहीं मापे गए हैं तो यह एक नई समस्या खड़ी कर सकता है? किस अनुभवजन्य साक्ष्य से आप मानेंगे कि नया क़ीमत-ढाँचा विनिर्माण जीवीए को सचमुच बेहतर कर रहा है, न कि उसे माप की ग़लती के प्रति और ज़्यादा संवेदनशील बना रहा है? मुझे नहीं लगता कि इसने विनिर्माण डिफ्लेटर की माप का मामला संतोषजनक ढंग से हल किया है. दिलचस्प बात यह है कि अगर इसे कुछ चुनिंदा क्षेत्रों पर ही लागू किया जाए और बाक़ी के लिए छोड़ दिया जाए, तो कुल नतीजे विकृत हो सकते हैं, क्योंकि जिन दूसरे क्षेत्रों का उत्पाद विनिर्माण के लिए इनपुट बनता है, उनकी इनपुट महँगाई सही तरीक़े से दर्ज नहीं होगी. आर्थिक आकलन उतना ही भरोसेमंद होता है जितने उसके पीछे के आँकड़े. पीछे मुड़कर देखें तो क्या आप मानेंगे कि असली कमज़ोरी जीडीपी के फ़ॉर्मूले में नहीं, बल्कि इसमें थी कि भारत ने एक लगातार जटिल और अनौपचारिक होती अर्थव्यवस्था को मापने के लिए ज़रूरी आँकड़ा-ढाँचे में समय रहते निवेश नहीं किया? मेरा मानना है कि हमारा सिस्टम आज भी भरोसेमंद आँकड़े दे सकता है, बशर्ते नतीजों को किसी ख़ास दिशा में ले जाने का राजनीतिक हित न हो. हाँ, इसके भारी आधुनिकीकरण की ज़रूरत है और यह भी ज़रूरी है कि आँकड़े जुटाने, उनका विश्लेषण करने और डेटा-सेट तैयार करने में सांख्यिकीविद् राजनीतिक नियंत्रण से आज़ाद हों. तेज़ वृद्धि वाली अर्थव्यवस्था और कमज़ोर घरेलू धारणा साथ-साथ रह सकती हैं, लेकिन भारत के असंगठित क्षेत्र के आकार को देखते हुए सांख्यिकी एजेंसी को यह फ़र्क़ कैसे समझाना चाहिए कि मापी गई जीडीपी वृद्धि मज़बूत है जबकि घरेलू आय, रोज़गार, उपभोग और आर्थिक धारणा के संकेत कमज़ोर हैं? मुझे लगता है कि जीडीपी और बाक़ी आँकड़ा शृंखलाओं के बीच बहुत बड़ा अंतर्विरोध है. सामान्य हालात में यह कभी-कभार बाहरी वजहों से हो सकता है. लेकिन अगर कुछ आँकड़ा शृंखलाओं के नतीजे राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो जाएँ और सिस्टम उन नतीजों को पैदा करने के लिए जूझने लगे, तो इन असंगतियों को असाधारण परिस्थितियाँ बताकर टाला नहीं जा सकता. जीडीपी वृद्धि मापते हुए क्या हम आर्थिक कल्याण माप रहे होते हैं—और अगर नहीं, तो अर्थव्यवस्था के अच्छा प्रदर्शन करने का नतीजा निकालने से पहले जीडीपी के साथ कौन से पूरक चर रखे जाने चाहिए? अगर जीडीपी 7.8% की दर से बढ़ रही है, लेकिन परिवारों की वास्तविक क्रय शक्ति और रोज़गार कहीं धीमी रफ़्तार से बढ़ रहे हैं, तो क्या कोई अर्थशास्त्री इसे तेज़ वृद्धि वाली अर्थव्यवस्था कहेगा? हम जीडीपी का तीसरा पाया—आय वाला पक्ष—तैयार ही नहीं करते, यानी जीडीपी के मूल्य-वर्धन के तीन प्राप्तकर्ताओं के बीच आय का बँटवारा: श्रम (वेतन और मज़दूरी), कॉरपोरेट (मुनाफ़ा) और सरकार (उत्पाद कर). जब तक यह नहीं होता, आर्थिक कल्याण को बहुत मोटे तौर पर ही मापा जा सकता है—प्रति व्यक्ति जीडीपी की वृद्धि के रूप में. भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी बहुत कम है. तर्क कहता है कि हमें बहुत ऊँची दर (9-10%) से बढ़ना चाहिए, आय का पुनर्वितरण करना चाहिए (धनवानों पर कर लगाकर और आयकर का दायरा बढ़ाकर), और सरकार के बेहद अनुत्पादक निवेश ख़र्चों में कटौती करनी चाहिए, ताकि जीडीपी की वृद्धि लोगों की तरफ़ मुड़े. एमओएसपीआई और वित्त मंत्रालय के जवाब तकनीकी रूप से बचाव-योग्य लगते हैं, लेकिन क्या वे विश्वसनीयता की खाई पाटते हैं? आपकी नज़र में उस खाई को असल में क्या भरेगा? जीडीपी में कटौती के मुद्दे पर दिया गया जवाब महज़ सरकारी भाषा और गोलमोल बात है. उससे कुछ भी साफ़ नहीं होता. आपकी दलील को कौन-सी बात ग़लत साबित करेगी? किस सबूत से आप 2022-23 की जीडीपी शृंखला के बारे में अपना मन बदलेंगे—और इसके उलट, किस सबूत से आप मानेंगे कि आधिकारिक 7.8% की वृद्धि का आँकड़ा काफ़ी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है? जीडीपी में कटौती/नुक़सान असली है और उसे ख़ुद सरकार ने ही सामने रखा है. कोई भी चीज़ मेरी दलील को ग़लत साबित नहीं कर सकती. अगर सरकार के अपने कहे मुताबिक़ 2025 की पहली तिमाही में जीडीपी 86 लाख करोड़ रुपये थी, तो जीडीपी वृद्धि नॉमिनल रूप में 2.6% और वास्तविक रूप में लगभग शून्य थी. जीडीपी के इस नुक़सान की व्याख्या सिर्फ़ दो में से एक तरीक़े से हो सकती है—या तो यह सामने लाया जाए कि आँकड़ा बढ़ाकर दिखाया गया था, या यह माना जाए कि पिछले वर्षों की वृद्धि को कृत्रिम रूप से ऊँचा दिखाने के लिए ऐसा किया गया था. अमेरिकी शोक मनाएँगे, और किसी दूसरे युद्ध के चलते उन पर थोपी गईं पेट्रोल की ऊँची क़ीमतों के बारे में शिकायत करने के लिए भी समय निकालेंगे. अमेरिकी मीडिया की पड़ताल करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि विदेशों में उसकी सैन्य शक्ति पर संयम का प्रमुख कारक उसकी मतदान करने वाली आबादी की नैतिकता नहीं है. निश्चित रूप से, यह उन लोगों की नैतिकता भी नहीं है जो इस पर शासन करते हैं. सबसे महत्वपूर्ण विचार—और शायद एकमात्र विचार—जब अमेरिकी विमानवाहक पोत दूर-दराज़ के देशों में बमबारी करने और दूसरों को मारने के लिए जाते हैं, तो यह होता है कि अमेरिकियों पर इसका कोई नकारात्मक असर न पड़े. वेनेज़ुएला के तेल पर क़ब्ज़ा करना, जहाँ आक्रमण के साथ-साथ लूटपाट भी होती है, एक आदर्श स्थिति है; ईरान के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाइयों से पैदा होने वाली महँगाई की परेशानी नहीं. इस महीने अमेरिका ने घोषणा की कि एक अमेरिकी कंपनी को वेनेज़ुएला में 17 तेल क्षेत्रों पर 100 साल की रियायत दी जाएगी, जिसकी मात्रा 65 अरब बैरल कच्चे तेल की है. ट्रम्प, जो कि अपनी साख के अनुरूप, अमेरिकी राष्ट्रपतियों में सबसे ईमानदार हैं, ने कहा कि अमेरिका उस देश को 'चलाएगा'. बीबीसी की सुर्ख़ी थी: 'असाधारण अमेरिकी तेल सौदे ने विश्लेषकों को हैरान किया—और कई वेनेज़ुएलावासियों को नाराज़ किया'. बेशक, बहुत कम अमेरिकी नाराज़ हुए. साम्राज्यवाद का एक साफ़-सुथरा मध्य मार्ग इराक़ है. सद्दाम हुसैन (सद्दाम का असामान्य नाम आघात के अर्थ वाले उस शब्द के मूल से जुड़ा है जिससे भारतीय वाक़िफ़ हैं: सदमा) को 20 साल पहले फाँसी दी गई थी. उनके देश पर अमेरिकियों को एक झूठ बेचे जाने के बाद हमला किया गया था: कि उन्हें डराने के लिए एक परमाणु कार्यक्रम विकसित किया जा रहा था. अमेरिकियों को ईरानियों की हत्या के लिए फिर से ठीक उसी झूठ का इस्तेमाल किए जाने से बिल्कुल कोई परेशानी नहीं है; उनकी मुख्य चिंता यह है कि ईरान उनके जीवन में दख़ल न दे. जैसा कि एक सुर्ख़ी में कहा गया था: 'डीज़ल अर्थव्यवस्था का ख़ून है: अमेरिकी क़ीमतें अभी 5.848 डॉलर प्रति गैलन के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गई हैं'. संभवतः, 'ख़ून' शब्द का इस्तेमाल करने में कोई विडंबना नहीं थी. निश्चित रूप से, कोई शर्म नहीं थी. इराक़ एक साफ़-सुथरा मध्य मार्ग क्यों है? जब यह आक्रमण हुआ था तब वह रक्तरंजित था, लेकिन आज अमेरिकी सैन्य शक्ति के बिना भी उस देश पर पूर्ण प्रभुत्व रखते हैं. अमेरिका इराक़ के तेल राजस्व को नियंत्रित करता है, जिसे न्यूयॉर्क फ़ेडरल रिज़र्व में एक इराक़ी बैंक खाते में जमा किया जाना ज़रूरी है. यह 2003 से, यानी 23 वर्षों से ऐसा ही है. कच्चा तेल इराक़ का सबसे महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत है, जो सरकारी बजट का लगभग 90% हिस्सा बनाता है. 11 जनवरी 2020 को वॉल स्ट्रीट जर्नल ने एक सुर्ख़ी के तहत ख़बर प्रकाशित की: 'अमेरिका ने इराक़ को चेतावनी दी कि यदि सैनिकों को जाने के लिए कहा गया तो वह प्रमुख बैंक खाते तक पहुँच खोने का जोखिम उठाएगा'. इसे समझने के लिए किसी स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं है, लेकिन यह जोड़ा जाना चाहिए कि इराक़ी पीछे हट गए और उन्होंने वास्तव में अमेरिका से अपनी सेना इराक़ से वापस बुलाने के लिए नहीं कहा. क्या यह अमेरिकियों या उनकी राजनीति को प्रभावित करता है? बिल्कुल भी नहीं. अमेरिकियों द्वारा इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में मारे गए पाँच लाख लोगों की मौत पर विचार करने से ज़्यादा तो बिल्कुल नहीं. ब्राउन यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन का अनुमान है कि अमेरिका के 9/11 के बाद के युद्ध क्षेत्रों में सीधे युद्ध की हिंसा में कुल नौ लाख लोग और अप्रत्यक्ष रूप से 45 लाख लोग मारे गए. अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, इराक़, सीरिया, लीबिया, यमन, सोमालिया और फ़िलीपींस में युद्धों के कारण लगभग चार करोड़ लोग विस्थापित हुए हैं. यदि राजनीतिक बहस में उस दौर का कोई ज़िक्र आता है, तो वह आमतौर पर ऐसा करने में बर्बाद किए गए पैसे को लेकर होता है. जैसा कि विश्वविद्यालय का अध्ययन बताता है: 'इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, सीरिया और अन्य जगहों पर 9/11 के बाद के युद्धों की कुल लागत लगभग 8 ट्रिलियन डॉलर है. इसमें युद्धों के लिए उठाए गए क़र्ज़ पर भविष्य की ब्याज लागत शामिल नहीं है'. न्यूयॉर्क के युवा मेयर की तरह जो अमेरिकी राजनेता युद्धों का मुद्दा उठाते हैं, उन पर पर्याप्त रूप से साम्राज्यवादी न होने के लिए हमला किया जाता है. जब मैं यह लिख रहा हूँ, तब उन्हें इस महीने के अंत में न्यूयॉर्क में 9/11 समारोह में शामिल न होने के लिए धमकाया जा रहा है. उनके विरोधियों द्वारा बताए गए कारण अस्पष्ट हैं, लेकिन समझा यह जा रहा है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि वह मुस्लिम हैं. इस धौंस के साथ, जैसा कि आमतौर पर ऐसी चीज़ों के साथ होता है, यह लांछन भी लगाया जाता है कि दरअसल वही कट्टरपंथी हैं. अमेरिकी मिसाइलों ने ईरान में स्कूली छात्राओं की हत्या कर दी, एक ऐसा तथ्य जिसे ख़ुद अमेरिकी मीडिया ने स्वीकार किया है, लेकिन इसके कामों के लिए अपनी सेना को फटकारना राजनीतिक आत्महत्या है. बेशक, स्मृति सभा में भी इस सबके बारे में कुछ नहीं होगा. वह संकीर्ण होगी, और उसमें केवल एक ही पीड़ित होगा: अमेरिका. वह दूसरों के साथ क्या कर रहा है, यह एक अलग मामला है और यह 9/11 और उसके पीड़ितों की याद में कोई दख़ल नहीं दे सकता. भारतीय ईरान को मध्य पूर्व का हिस्सा मानते हैं, लेकिन 1947 तक हम ईरान के साथ सीमा साझा करते थे. वहाँ जो हो रहा है, वह हमारे पड़ोस में हो रहा है. एक साल पहले, 9 सितंबर 2025 को, ट्रम्प ने रक्षा विभाग का नाम बदलकर युद्ध विभाग कर दिया था. एक बार फिर, उन्होंने ईमानदारी दिखाई. अमेरिका की सेना अपनी रक्षा करने के लिए मौजूद नहीं है; यह, प्राथमिक रूप से, दूसरों पर युद्ध छेड़ने के लिए मौजूद है. न्यूयॉर्क में दुनिया को बदल देने वाली उस सुबह की 25वीं बरसी पर हम बाक़ी लोगों के लिए भी यह विचार करने का समय है—न केवल उन लोगों पर जो मारे गए थे, बल्कि इस पर भी कि यह घटना क्यों हुई, इसके क्या कारण थे और इसके बाद क्या हुआ. आंतरिक दबाव के अभाव में अमेरिका ख़ुद को नहीं सुधारता. यह हम सभी के लिए एक बहुत बड़ा सबक़ है—और इस बात की समझ भी कि जब दुनिया में सत्ता का असंतुलन होता है तो क्या होता है. 'कड़वी कॉफी' की इस कड़ी में प्रो. अपूर्वानंद, शुद्धव्रत सेनगुप्ता के साथ वंदे मातरम को लेकर जारी विवाद पर विस्तार से बातचीत कर रहे हैं. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वंदे मातरम के पूरे छंद गाए जाएं या नहीं, बल्कि यह भी है कि इस गीत का मूल संदर्भ क्या था, आनंदमठ में इसका अर्थ कैसे बदलता है और क्या किसी नागरिक को देशभक्ति की एक तय अभिव्यक्ति के लिए बाध्य किया जा सकता है. शुद्धव्रत सेनगुप्ता के मुताबिक वंदे मातरम को आज जिस तरह एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बनाया जा रहा है, उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है. उनके अनुसार देश में शिक्षा, रोजगार, महंगाई और सामाजिक-आर्थिक संकट जैसे कई गंभीर मुद्दे हैं, लेकिन संसद का एक पूरा सत्र इन पर पर्याप्त चर्चा के बिना निकल गया. ऐसे में वंदे मातरम को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाना क्या वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाने की कोशिश है? बातचीत में वंदे मातरम के साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भ को समझने की कोशिश की जाती है. शुद्धव्रत बताते हैं कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की मूल रचना और आनंदमठ में शामिल विस्तृत रूप के बीच महत्वपूर्ण अंतर है. शुरुआती दो छंदों में जहां मातृभूमि का भाव प्रमुख है, वहीं बाद के छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे धार्मिक प्रतीक आते हैं. यही वजह है कि निराकार ईश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए इसके पूरे रूप का गायन धार्मिक आपत्ति का विषय बन सकता है. यह आपत्ति केवल मुसलमानों या ईसाइयों तक सीमित नहीं है. ब्रह्म समाज और आर्य समाज जैसी हिंदू परंपराओं में भी मूर्ति पूजा को स्वीकार नहीं किया जाता. शुद्धव्रत अपने ब्रह्म समाज परिवार का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि उन्हें बचपन से वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों तक ही गाने की परंपरा बताई गई. इसके बाद बातचीत आनंदमठ के उस संदर्भ तक पहुंचती है, जिसे आज की बहस में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. शुद्धव्रत के अनुसार उपन्यास का मुसलमान विरोधी संदर्भ महत्वपूर्ण है. वे बताते हैं कि जिस ऐतिहासिक संन्यासी-फकीर विद्रोह की पृष्ठभूमि में आनंदमठ को रखा जाता है, उसमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल थे. यह विद्रोह अकाल, आर्थिक संकट और ईस्ट इंडिया कंपनी की कर नीतियों के खिलाफ था. लेकिन आनंदमठ में इस जटिल इतिहास को एक ऐसे आख्यान में बदला गया जिसमें मुसलमानों को प्रमुख शत्रु के रूप में प्रस्तुत किया गया. इसी कारण शुद्धव्रत का तर्क है कि आनंदमठ और वंदे मातरम को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग करके देखना मुश्किल है. उनके अनुसार किसी ऐसे साहित्यिक संदर्भ से निकले गीत को उन लोगों से अनिवार्य रूप से गाने के लिए कहना, जिन्हें उस रचना के धार्मिक या राजनीतिक अर्थ से आपत्ति हो सकती है, एक गंभीर सवाल खड़ा करता है. बातचीत में रविंद्रनाथ टैगोर की भूमिका भी सामने आती है. 'घरे-बाइरे' और 'गोरा' जैसी रचनाओं के जरिए टैगोर के राष्ट्रवाद और हिंदू जातीयतावाद के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण को समझाया जाता है. 1937 में वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति के निर्णय का भी उल्लेख होता है, जिसमें महात्मा गांधी, मौलाना आजाद, सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेता शामिल थे. शुद्धव्रत के अनुसार उस समय शुरुआती दो छंदों को स्वीकार करने का रास्ता अपनाया गया था, क्योंकि इससे धार्मिक और सामाजिक विविधता का सम्मान बना रह सकता था. बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण सवाल नागरिक स्वतंत्रता से जुड़ता है. शुद्धव्रत बीजू इमैनुएल मामले का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि किसी राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रगान को न गाना, यदि व्यक्ति शांतिपूर्वक रहे और उसमें बाधा न डाले, अपने आप में अपमान नहीं माना जा सकता. उनका सवाल है कि अगर देश के प्रति प्रेम वास्तविक है तो उसकी अभिव्यक्ति का तरीका भी क्या राज्य तय करेगा? इसी संदर्भ में उनका एक महत्वपूर्ण तर्क सामने आता है: 'आप मुझे किसी से प्रेम करने के लिए बाध्य कैसे कर सकते हैं?' उनके अनुसार किसी नागरिक को यह बताना कि वह अपने देश के प्रति प्रेम किस तरह व्यक्त करे, स्वतंत्रता की भावना के विपरीत है. 'कॉउंटरकरंट्स'में निहार नलिनी सारंगी लिखते हैं कि एक दशक तक भारतीय जनता पार्टी की राजनीति का आधार एक ही वाक्य रहा—'मोदी है तो मुमकिन है.' यह केवल नारा नहीं, बल्कि भविष्य पर दावा था. व्यक्तिगत लोकप्रियता और अजेयता की छवि के मेल से यह दावा प्रभावी बना. लेकिन 2026 में यही वाक्य पार्टी के सामने सवाल बनकर लौट रहा है. क्या अब भी सब कुछ मुमकिन है? जमीन से मिल रहे चुनावी, संस्थागत और पीढ़ीगत संकेत बताते हैं कि बीजेपी खुद इस सवाल के जवाब को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है. 2026 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन व्यापक प्रभुत्व के बजाय सिकुड़ती पकड़ की कहानी दिखाता है. केरल में वर्षों की कोशिशों के बावजूद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए का आंकड़ा दहाई के आसपास ही रहा. यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट ने राज्य की राजनीति में अपना प्रभाव बनाए रखा. विश्लेषकों ने विदेशी अंशदान विनियमन कानून में सरकार के संशोधनों को ईसाई मतदाताओं के बीच बीजेपी की सीमित बढ़त के लिए एक महत्वपूर्ण बाधा बताया. पश्चिम बंगाल में शुरुआती रुझानों में बीजेपी को कुछ इलाकों में बढ़त मिलती दिखी, लेकिन तृणमूल कांग्रेस का मुख्य सामाजिक गठजोड़ कायम रहा. बीजेपी नेताओं ने शुरुआती रुझानों को बड़ी जीत की तरह पेश किया, लेकिन अंतिम नतीजों ने इस दावे को कमजोर कर दिया. कर्नाटक का पिछला राजनीतिक संकट भी अब तक पार्टी की कार्यशैली पर असर डाल रहा है. वहां मुख्यमंत्री बनने के दो दिन बाद ही नेतृत्व परिवर्तन की स्थिति पैदा हो गई थी. इसके बाद केंद्रीय नेतृत्व राज्य इकाइयों के साथ अधिक सावधानी से व्यवहार कर रहा है. इन घटनाओं को बीजेपी का पतन नहीं कहा जा सकता. लेकिन यह उस अजेयता की गणित भी नहीं है, जिस पर पार्टी की राजनीतिक छवि टिकी रही है. जो पार्टी जीत को स्वाभाविक मानने की आदत डाल चुकी हो, उसके लिए किसी तरह मुकाबला पार कर लेना पर्याप्त नहीं होता. बीजेपी की प्रचार मशीन और देश के वास्तविक मूड के बीच अंतर को कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी से बेहतर किसी और घटना ने उजागर नहीं किया. इसकी शुरुआत डिजिटल व्यंग्य के रूप में हुई थी. यह प्रतिक्रिया सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की उस टिप्पणी के जवाब में थी, जिसमें उन्होंने बेरोजगार और मुकदमेबाजी में लगे युवाओं की तुलना 'कॉकरोच' और 'परजीवी' से की थी. कुछ ही सप्ताह में यह व्यंग्य एक वास्तविक जन लामबंदी में बदल गया. जंतर-मंतर पर हजारों लोग जुटे. इस व्यंग्यात्मक संगठन ने न्यायिक सुधार, चुनावी पारदर्शिता, महिला आरक्षण, मीडिया के केंद्रीकरण और दल-बदल विरोधी कानून पर आधारित पांच सूत्री मांग-पत्र जारी किया. इस आंदोलन की सबसे बड़ी एकजुट करने वाली वजह 2026 का नीट प्रश्नपत्र लीक मामला था. परीक्षा रद्द करने और उसके बाद पैदा हुए संकट की मांग को छात्रों की आत्महत्याओं की घटनाओं से भी जोड़ा गया. इस आंदोलन ने दस सप्ताह में वह कर दिखाया, जो बीजेपी की आईटी सेल और राष्ट्रवाद की राजनीति दस वर्षों में नहीं कर सकी. उसने जेन-जी को अपने गुस्से के लिए साझा राजनीतिक भाषा दी. सरकार की प्रतिक्रिया में आंसू गैस, लाठीचार्ज और सौ से अधिक लोगों की हिरासत शामिल रही. इसके बाद जुलाई में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने संकट को और गंभीर बना दिया. एक ऐसी सरकार, जिसे अपने राजनीतिक आख्यान पर भरोसा हो, वह शुरुआती स्तर पर बातचीत करती है. लेकिन जब सरकार सड़क पर भीड़ से निपटने के लिए बल प्रयोग का सहारा लेती है, तो यह संकेत होता है कि वह तर्क के स्तर पर कमजोर पड़ रही है और सड़क पर नियंत्रण के जरिए अपनी स्थिति बचाना चाहती है. मूल समस्या केवल चुनावी आंकड़ों की नहीं, बल्कि राजनीतिक आख्यान की थकान की है. राष्ट्रवाद तब प्रभावी होता है, जब वह लोगों को भविष्य की उम्मीद देता है. लेकिन बेरोजगारी, परीक्षा व्यवस्था और संस्थानों की निष्पक्षता जैसे सवालों से बचने के लिए राष्ट्रवाद का इस्तेमाल किया जाए, तो वही कहानी कमजोर पड़ने लगती है. मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी, जिसे बाद में फर्जी डिग्री रखने वालों तक सीमित बताया गया, युवाओं के बीच अलग अर्थ में पहुंची. लोगों को लगा कि न्यायपालिका, कार्यपालिका और राजनीतिक प्रतिष्ठान असहमति का जवाब देने के बजाय उसे खारिज करने के आदी हो चुके हैं. बीजेपी को अहंकारी कहे जाने का अर्थ केवल उसका आत्मविश्वास नहीं है. समस्या यह है कि वह सवाल पूछे जाने की आदत खोती दिख रही है और जब सवाल उठते हैं, तो असहज हो जाती है. यही बदलाव किसी एक चुनावी हार से अधिक महत्वपूर्ण है. निष्पक्ष विश्लेषण के लिए बीजेपी की ताकतों को भी देखना जरूरी है. उसके पास भारतीय राजनीति का सबसे व्यापक संगठनात्मक ढांचा है. उसके पास ऐसा वित्तीय और चंदा जुटाने का तंत्र है, जिसकी बराबरी कोई विपक्षी दल नहीं कर पाता. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कमी जरूर आई है, लेकिन वह अब भी किसी एक विपक्षी नेता से काफी आगे हैं. 2026 के नतीजे बीजेपी के लिए पूरी तरह पराजय नहीं थे. कई राज्यों में उसका मत प्रतिशत कायम रहा, भले ही सीटों में उसका लाभ नहीं दिखा. दूसरी ओर विपक्ष अब तक युवाओं के गुस्से को स्थायी चुनावी गठजोड़ में बदल नहीं पाया है. सीजेपी भी कोई पंजीकृत राजनीतिक दल नहीं है और उसके पास चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार नहीं हैं. इसलिए घटता आत्मविश्वास, सत्ता के खत्म होने के बराबर नहीं है. बीजेपी के रणनीतिकारों को किसी एक सर्वेक्षण या चुनावी आंकड़े से अधिक उस पैटर्न पर ध्यान देना चाहिए, जो उसके नीचे दिखाई दे रहा है. 2026 में पार्टी के सामने सबसे प्रभावी चुनौती कांग्रेस या किसी क्षेत्रीय दल से नहीं, बल्कि एक व्यंग्यात्मक इंस्टाग्राम पेज से आई, जो बाद में सड़क पर उतरने वाला आंदोलन बन गया. इस आंदोलन का नेतृत्व ऐसे युवाओं ने किया, जिनमें से कई ने बीजेपी के उभार को अपनी आंखों से देखा ही नहीं था. पहले बीजेपी का जमीनी आत्मविश्वास इस भरोसे पर टिका था कि उसकी राजनीतिक कहानी लोगों तक पहुंच रही है. अब वह आत्मविश्वास इस कोशिश पर निर्भर दिखाई देता है कि कहानी के कमजोर पड़ते असर को कैसे संभाला जाए. यह राजनीति का अधिक कठिन और असहज दौर है. बीजेपी के सामने अब चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की भी है कि उसका राजनीतिक आख्यान आज भी लोगों के अनुभवों और आकांक्षाओं से जुड़ा हुआ है. 'मकतूब मीडिया'में प्रकाशित पी. पी. जसीम की रिपोर्ट के मुताबिक, रविवार को लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की ब्रिटेन यात्रा का विरोध किया. प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि आरएसएस अपने अंतरराष्ट्रीय दौरे के दौरान भागवत के कार्यक्रमों को सार्वजनिक नजरों से दूर रखने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि उसे जनविरोध का डर है. प्रदर्शन का आयोजन ब्रिटेन इंडियन मुस्लिम काउंसिल, साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप, ह्यूमन्स फॉर ह्यूमन राइट्स, इंडिया लेबर सॉलिडेरिटी और स्ट्राइवयूके समेत कई संगठनों के गठबंधन ने किया था. इसमें भारतीय, दक्षिण एशियाई और ब्रिटिश संगठनों के कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया. प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा के दौरान भागवत के कार्यक्रमों को लेकर आरएसएस की गतिविधियां लगातार गोपनीय होती जा रही हैं. उनका कहना था कि संगठन को आशंका है कि सार्वजनिक रूप से कार्यक्रमों की जानकारी सामने आने पर विरोध और तेज हो सकता है. ह्यूमन्स फॉर ह्यूमन राइट्स यूके के निदेशक राजीव सिन्हा ने प्रदर्शन के दौरान कहा कि अमेरिका के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भागवत के दौरे का विरोध हुआ था. इसके बाद कनाडा में भी कार्यक्रमों का प्रचार सीमित रखा गया. उनके अनुसार, ब्रिटेन में आरएसएस की गोपनीयता और बढ़ गई है तथा पिछले एक सप्ताह से कार्यक्रमों की जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा रही है. ब्रिटेन इंडियन मुस्लिम काउंसिल के नईम बदरुज्जमान ने आरोप लगाया कि आरएसएस ने अपनी पहचान, विचारधारा और वास्तविक उद्देश्य छिपाकर लोगों से मिलने का अवसर हासिल किया. उन्होंने कहा कि कई इमामों और धार्मिक नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह बताया है कि उन्हें संगठन की वास्तविक पहचान के बारे में गुमराह किया गया. भागवत की यात्रा के खिलाफ विरोध की शुरुआत अमेरिका से हुई थी. न्यूयॉर्क में उनके दौरे से जुड़े एक आयोजन स्थल के बाहर प्रदर्शन किया गया था. लंदन में प्रदर्शनकारियों ने कहा कि अमेरिका में विरोध के बाद ब्रिटेन में भागवत के कार्यक्रमों की जानकारी को लेकर गोपनीयता बढ़ गई. प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि ब्रिटेन में भागवत के कार्यक्रमों, विशेषकर अंतरधार्मिक आयोजन 'वननेस सेलिब्रेशन', की जानकारी प्रेस तक को पूरी तरह नहीं दी गई. उनके अनुसार, यह कदम संभावित विरोध से बचने के लिए उठाया गया. साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप की कल्पना विल्सन ने भागवत के दौरे के दौरान आयोजित अंतरधार्मिक कार्यक्रम की आलोचना की. उन्होंने कहा कि 'सार्वभौमिक एकता' के नाम पर आरएसएस की छवि को साफ करने की कोशिश की जा रही है. विल्सन ने आरोप लगाया कि इस तरह की एकता वास्तव में वैश्विक फासीवाद, इस्लामोफोबिया और जियोनिज्म की एकता को दर्शाती है. प्रदर्शनकारियों ने कहा कि ब्रिटेन में भागवत के कार्यक्रमों की सार्वजनिक जानकारी का अभाव इस बात का संकेत है कि आयोजक आगे होने वाले विरोध से चिंतित हैं. उनका दावा था कि आरएसएस अपनी विचारधारा और प्रभाव को लेकर ब्रिटेन में बढ़ती आलोचना का सामना कर रहा है. पार्लियामेंट स्क्वायर में जुटे प्रदर्शनकारियों ने भागवत की यात्रा की अधिक गंभीर जांच की मांग की. उन्होंने ब्रिटिश राजनीतिक और नागरिक संस्थानों से अपील की कि वे आरएसएस की विचारधारा और भारतीय प्रवासी समुदाय के बीच उसके प्रभाव को लेकर अल्पसंख्यक तथा मानवाधिकार संगठनों की चिंताओं पर ध्यान दें. प्रदर्शन में शामिल संगठनों ने कहा कि भागवत की यात्रा को केवल सांस्कृतिक या अंतरधार्मिक संवाद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. उनके अनुसार, आरएसएस की राजनीतिक विचारधारा, अल्पसंख्यकों के प्रति उसका रवैया और भारत में उसके प्रभाव से जुड़े सवालों पर सार्वजनिक बहस जरूरी है. प्रदर्शनकारियों ने यह भी कहा कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय दौरे के कार्यक्रमों को सार्वजनिक रखा जाना चाहिए, ताकि नागरिक समाज, मीडिया और प्रभावित समुदायों को अपनी आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर मिल सके. उनके अनुसार, कार्यक्रमों को गोपनीय रखने से पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर संदेह पैदा होता है. यह प्रदर्शन भागवत की अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन यात्रा के दौरान आरएसएस के खिलाफ बढ़ते विरोध का हिस्सा है. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि संगठन को अपनी विचारधारा और कार्यक्रमों को लेकर सार्वजनिक सवालों का जवाब देना चाहिए, न कि उनसे बचने के लिए कार्यक्रमों को सीमित या गोपनीय रखना चाहिए. 'ऑल्ट न्यूज़'में अनिंद्य और प्रतीक लिखते हैं कि नीट प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ शुरू हुआ गुस्सा जब सड़कों पर उतरा, तो प्रदर्शनकारियों ने अपनी तीखी नाराजगी का एक बड़ा हिस्सा टेलीविजन मीडिया के खिलाफ भी जाहिर किया. उनका आरोप था कि मुख्यधारा का मीडिया जनता की आवाज बनने के बजाय सत्ता की आवाज बन गया है. दिल्ली के जंतर-मंतर और आसपास के प्रदर्शन स्थलों पर टीवी पत्रकारों के पहुंचते ही कई बार 'गोदी मीडिया हाय-हाय' के नारे लगाए गए. एनडीटीवी, न्यूज़ एक्स, एबीपी न्यूज़ और टाइम्स नाउ जैसे चैनलों के लोगो वाले माइक या पहचान-पत्र लेकर पहुंचे पत्रकारों को प्रदर्शनकारियों ने घेरकर उनकी रिपोर्टिंग पर सवाल उठाए. कुछ मामलों में पत्रकारों से बदसलूकी हुई और कुछ घटनाएं शारीरिक टकराव तक पहुंच गईं. टाइम्स नाउ के पत्रकार देव कोटक के साथ धक्का-मुक्की का वीडियो भी सामने आया. मुंबई में जी न्यूज़ के एक पत्रकार को बारिश के बीच प्रदर्शनकारियों की हूटिंग का सामना करना पड़ा. जंतर-मंतर पर लगे एक बैनर ने इस गुस्से को और स्पष्ट किया. इसमें रिपब्लिक के अर्नब गोस्वामी, डीडी के सुधीर चौधरी, एबीपी की चित्रा त्रिपाठी, आज तक की अंजना ओम कश्यप, न्यूज़18 के अमीश देवगन और टाइम्स नाउ नवभारत की रुबिका लियाकत की तस्वीरें थीं. बैनर पर उन्हें 'भारत के सबसे बड़े दुश्मन' बताया गया था. इन घटनाओं ने सवाल खड़ा किया कि युवा प्रदर्शनकारियों ने नेताओं और पुलिस के अलावा टीवी चैनलों को भी अपने विरोध का निशाना क्यों बनाया. जून और जुलाई में दिल्ली में हुए प्रदर्शनों ने देशभर के छात्रों और युवाओं को एक मंच पर ला दिया. कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी की शुरुआत नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ व्यंग्यात्मक आंदोलन के रूप में हुई थी. बाद में यह सरकार से जवाबदेही मांगने वाले व्यापक युवा आंदोलन में बदल गया. प्रदर्शन बढ़ने के साथ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी तेज हुई और अंततः जुलाई में उन्हें पद छोड़ना पड़ा. प्रदर्शन का आकार बढ़ने पर बड़े टेलीविजन चैनलों ने घटनास्थल पर पत्रकार भेजे. लेकिन सामान्य लाइव रिपोर्टिंग के बजाय कई पत्रकारों को भीड़ के खुले विरोध और सवालों का सामना करना पड़ा. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे पत्रकारों की व्यक्तिगत भूमिका के खिलाफ नहीं, बल्कि उन चैनलों की संपादकीय नीति के खिलाफ हैं, जिनका वे प्रतिनिधित्व कर रहे थे. इसी वजह से कुछ पत्रकारों ने अपने चैनल के लोगो वाले माइक का इस्तेमाल बंद कर दिया. एनडीटीवी के शिव अरोड़ा और विष्णु सोम तथा इंडिया टुडे की प्रीति चौधरी उन पत्रकारों में शामिल थे, जिन्होंने बिना ब्रांड वाले माइक से रिपोर्टिंग की. यह विरोध केवल कुछ अलग-अलग घटनाओं तक सीमित नहीं था. दिल्ली के कई स्थानों से सामने आए वीडियो में पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों के बीच इसी तरह की बहस और टकराव दिखाई दिए. छोटे चैनलों के पत्रकारों को भी विरोध का सामना करना पड़ा, जिससे संकेत मिलता है कि गुस्सा केवल बड़े टेलीविजन संस्थानों के खिलाफ नहीं, बल्कि एक खास तरह की पत्रकारिता के खिलाफ था. हालांकि, कई घटनाओं में विरोध और आलोचना की सीमा पार कर पत्रकारों को धमकाने, धक्का देने और शारीरिक रूप से परेशान करने की स्थिति भी बनी. पत्रकारों पर हिंसा को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता. प्रदर्शनकारियों की मुख्य शिकायत थी कि मुख्यधारा के मीडिया ने जनता की आवाज उठाना बंद कर दिया है और वह सत्ता के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है. उनके अनुसार, पिछले वर्षों में टेलीविजन चैनलों ने प्रश्नपत्र लीक, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, बेरोजगारी, महंगाई और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर सरकार से पर्याप्त सवाल नहीं पूछे. इसके उलट, कई चैनलों पर रोजाना सांप्रदायिक बहस और उत्तेजक स्टूडियो कार्यक्रमों को प्रमुखता दी जाती है. प्रदर्शनकारियों का मानना था कि जिन मुद्दों से युवाओं की शिक्षा और भविष्य सीधे प्रभावित होते हैं, उन पर मीडिया उतनी गंभीरता नहीं दिखाता. आंदोलन की छात्र नेता नेहा बोरा ने कहा कि गोदी मीडिया और आईटी सेल के जरिए सरकार का फैलाया गया नफरत का माहौल लोगों के घरों, व्हाट्सऐप समूहों और निजी जीवन तक पहुंच गया है. उनके अनुसार, मीडिया ने सरकार को सवालों से ऊपर रखने की कोशिश की है. उन्होंने यह भी कहा कि जमीन पर काम करने वाले कई पत्रकार ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं. इसलिए प्रदर्शनकारियों से अपील की गई थी कि वे पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार न करें. लेकिन उनके मुताबिक, मुख्यधारा के मीडिया का बड़ा हिस्सा बीजेपी के प्रचार तंत्र जैसा काम करता दिखाई देता है. प्रदर्शनकारियों के गुस्से को उन खबरों और टिप्पणियों ने भी बढ़ाया, जिनमें सीजेपी आंदोलन को विदेशी साजिश, राष्ट्रविरोधी गतिविधि या सुरक्षा खतरे के रूप में पेश किया गया. कुछ टीवी एंकरों और राजनीतिक समर्थकों ने आंदोलन को चीन, अमेरिका, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अन्य ताकतों से जोड़ने की कोशिश की. इससे प्रदर्शनकारियों को लगा कि उनकी वास्तविक मांगों को समझने के बजाय उनकी छवि खराब की जा रही है. ऑल्ट न्यूज़ के अनुसार, यह अविश्वास केवल सीजेपी आंदोलन तक सीमित नहीं है. भारत-पाकिस्तान सैन्य तनाव के दौरान कई चैनलों पर पुराने, असंबंधित और झूठे वीडियो को वास्तविक युद्ध कवरेज के रूप में दिखाने के आरोप लगे. किसान आंदोलन के दौरान भी कई चैनलों ने किसानों और उनके नेताओं के खिलाफ भ्रामक दावों को बढ़ावा दिया. मुख्यधारा के मीडिया पर सांप्रदायिक बहसों को सामान्य बनाने का आरोप भी लंबे समय से लगता रहा है. कई प्राइम-टाइम कार्यक्रमों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ उत्तेजक भाषा और ध्रुवीकरण को जगह दी जाती है. इससे समाचार और प्रचार के बीच की सीमा धुंधली होती दिखाई देती है. मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल केवल रिपोर्टिंग की सामग्री से नहीं, बल्कि उसके स्वामित्व और आर्थिक ढांचे से भी जुड़े हैं. कई बड़े मीडिया संस्थान बड़े कारोबारी समूहों के स्वामित्व में हैं, जिनके सरकार से करीबी संबंध हैं. टेलीविजन पत्रकारिता महंगी होने के कारण सरकारी विज्ञापनों और बड़े कॉरपोरेट विज्ञापनदाताओं पर निर्भर रहती है. इससे सत्ता के खिलाफ स्वतंत्र और आक्रामक पत्रकारिता की गुंजाइश सीमित हो सकती है. सरकार के पक्ष में झुकाव हमेशा किसी स्पष्ट निर्देश के रूप में सामने नहीं आता. यह संपादकीय चयन में दिखाई देता है—विपक्ष शासित राज्यों की छोटी घटनाओं को बड़ी खबर बनाना, जबकि केंद्र या बीजेपी शासित राज्यों की गंभीर घटनाओं को कम महत्व देना. इसी तरह, विपक्ष से जुड़ी मामूली विवादित घटनाओं को व्यापक कवरेज मिलती है, जबकि सत्तारूढ़ दल को असहज करने वाले बड़े मुद्दे दब जाते हैं. पत्रकारों को बिना डर और दबाव के काम करने का अधिकार है. किसी रिपोर्टिंग से असहमति होने पर शारीरिक हमला या धमकी स्वीकार्य नहीं हो सकती. लेकिन पत्रकारों पर हुए हमलों की निंदा करते हुए उन कारणों की जांच से भी बचा नहीं जा सकता, जिन्होंने जनता के एक हिस्से में इतना गहरा अविश्वास पैदा किया है. 'गोदी मीडिया हाय-हाय' के नारे केवल कैमरे के सामने खड़े पत्रकारों के खिलाफ नहीं थे. वे उन संस्थानों के खिलाफ थे, जिन पर प्रदर्शनकारियों को लगता है कि उन्होंने सत्ता से सवाल पूछने की अपनी जिम्मेदारी छोड़ दी है. यह धारणा पूरी तरह सही है या नहीं, इस पर बहस हो सकती है. लेकिन दिल्ली के प्रदर्शन यह जरूर दिखाते हैं कि युवाओं और मुख्यधारा के टेलीविजन मीडिया के बीच भरोसे की खाई गहरी हो चुकी है. यह खाई एक-दो घटनाओं से पैदा नहीं हुई और इसे भरने के लिए मीडिया संस्थानों को केवल पत्रकारों की सुरक्षा नहीं, बल्कि अपनी रिपोर्टिंग, स्वामित्व, संपादकीय स्वतंत्रता और जवाबदेही पर भी गंभीरता से विचार करना होगा. अपील: आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं 'हरकारा'...शोर कम, रोशनी ज्यादा.व्हाट्सएपपर,लिंक्डइनपर,इंस्टापर,फेसबुकपर,यूट्यूबपर,स्पोटीफाईपर ,ट्विटर / एक्सऔरब्लू स्काईपर.

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