प्रयागराज : यूपी बार कौंसिल ने सेंट्रल बार एसोसिएशन लखनऊ के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और महामंत्री अवनीश दीक्षित के खिलाफ बड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उनका अधिवक्ता पंजीकरण तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है. साथ ही दोनों पदाधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि अधिवक्ता अधिनियम 1961 की धारा 35 के तहत उनका पंजीकरण हमेशा के लिए निरस्त क्यों न कर दिया जाए.
यूपी बार कौंसिल की मंगलवार को आयोजित वर्चुअल आपात बैठक में पूर्व अध्यक्ष व सदस्य देवेंद्र मिश्र नगरहा के प्रस्ताव पर विचार किया गया. बैठक में सामने आया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के आदेश के क्रम में बार कौंसिल ने गत 23 अगस्त को प्रस्ताव पारित किया था. इसके तहत सेंट्रल बार एसोसिएशन लखनऊ का चुनाव कराने के लिए पूर्व गठित एल्डर्स कमेटी को अधिकृत किया गया था.
चुनाव निष्पक्ष संपन्न कराने के लिए बार कौंसिल के पांच सदस्यों श्रीनाथ त्रिपाठी, इमरान माबूद खान, मधुसूदन त्रिपाठी, देवेंद्र मिश्र नगरहा और श्रीश कुमार मेहरोत्रा को पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया था. सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और महामंत्री ने अपने सदन में प्रस्ताव रखकर बार कौंसिल के इस आधिकारिक निर्णय को खारिज कर दिया था.
कौंसिल ने इस कृत्य को पूर्णतः असंवैधानिक और बार कौंसिल की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला माना. साथ ही अधिवक्ता अधिनियम 1961 की धारा 35 के तहत व्यावसायिक कदाचरण की श्रेणी में मानते हुए बहुमत से दोनों पदाधिकारियों का पंजीकरण निलंबित करने का निर्णय लिया. इस पूरे प्रकरण की सुनवाई बार कौंसिल के अध्यक्ष शिवकिशोर गौड़ और प्रतिनिधि सदस्य श्रीनाथ त्रिपाठी की अनुशासन समिति को सौंपी गई है. यह समिति सुनवाई पूरी कर आगे का अंतिम आदेश करेगी.
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