जबलपुर: हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस विवेक रूसिया तथा जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि "प्रोबेशन अवधि में भी कर्मचारी शत-प्रतिशत वेतन के हकदार हैं. जब कर्मचारी से पूरा काम लिया जा रहा है तो उसे भर्ती नियमों के अनुसार निर्धारित पूरा वेतन देने से वंचित नहीं किया जा सकता" युगलपीठ ने 25 नवंबर 2019 के बाद नियुक्त संबंधित कर्मचारियों को प्रोबेशन अवधि के काम के लिए पूर्ण वेतन देने के निर्देश दिए हैं.
राज्य सरकार के 25 नवंबर 2019 के आदेश को चुनौती
स्कूल शिक्षा तथा आदिवासी विभाग में शिक्षक आनंद कुमार मिश्रा सहित एक हजार याचिकाकर्ताओं की तरफ से सरकार के उस नियम को चुनौती दी गयी थी, जिसके तहत प्रोबेशन अवधि में प्रथम वर्ष में 70 प्रतिशत, दूसरे वर्ष में 80 प्रतिशत तथा तीसरे साल में 90 प्रतिशत मानदेय देने का निर्णय लिया गया था.
संविधान के अनुच्छेद 12 और 14 का उल्लंघन
याचिकाकर्ताओं की तरफ से कहा गया था कि पीसीसी की माध्यम नियुक्त अधिकारियों को प्रारंभ से पूरा वेतन दिया जाता है. ईएसबी के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों को प्रथम तीन साल में कम वेतन दिया जाता है, जो समानता के अधिकार के विपरीत है. यह संविधान के अनुच्छेद 12 और 14 का उल्लंघन है. सरकार ने यह व्यवस्था 25 नवंबर 2019 के मेमो के जरिए लागू की थी.
युगलपीठ ने आदेश में क्या कहा ?
युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि "कर्मचारी के विरुद्ध कदाचार या गलत आचरण साबित होने पर नियमानुसार दंड दिया जा सकता है, लेकिन निर्धारित पे-स्केल से नीचे वेतन नहीं किया जा सकता. नियमों के तहत इंक्रीमेंट रोकने या कर्मचारी को निचले पे-स्केल में भेजने जैसी कार्रवाई संभव है, लेकिन न्यूनतम निर्धारित वेतन से कम भुगतान का प्रावधान नहीं है. मंत्रिपरिषद का ऐसा निर्णय कानून की कसौटी पर टिकने योग्य नहीं है."
ये भी पढ़ें:
युगलपीठ ने राज्य सरकार की व्यवस्था को असंवैधानिक ठहराते हुए 25 नवंबर 2019 के आदेश को निरस्त कर दिया. याचिकाकर्ताओं की तरफ से अधिवक्ता राहुल दिवाकर ने पैरवी की.
(0)Comments