नोएडा की जमीन अब रियल एस्टेट कंपनियों के लिए जंग का मैदान बन गई है. इसकी ताजा मिसाल सेक्टर 108 में देखने को मिली. 12.5 एकड़ की एक प्राइम लैंड के लिए बोली लगनी शुरू हुई तो मामला 1,800 करोड़ रुपये के पार जा पहुंचा. इस मुकाबले में DLF समेत कई बड़े डेवलपर्स मैदान में थे, लेकिन आखिर में M3M India ने बाजी मार ली. कंपनी ने इस 12.5 एकड़ जमीन के लिए 1,839 करोड़ रुपये की सबसे ऊंची बोली लगाई. खास बात यह है कि नोएडा अथॉरिटी ने इस जमीन की शुरुआती बोली कीमत महज 835 करोड़ रुपये रखी थी. यानी M3M ने शुरुआती कीमत से दोगुने से भी ज्यादा रकम लगाने का फैसला किया.
12.5 एकड़ जमीन के लिए 1839 करोड़ रुपये यानी करीब 147 करोड़ रुपये प्रति एकड़. स्टांप ड्यूटी और दूसरे सरकारी शुल्क जोड़ने के बाद M3M का कुल खर्च करीब 2,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. यानी नोएडा की इस जमीन पर कंपनी ने ऐसा दांव लगाया है, जिसे देखकर दिल्ली-एनसीआर के रियल एस्टेट बाजार में जमीन की कीमतों को लेकर चल रही होड़ का अंदाजा लगाया जा सकता है.
पांच प्लॉट, 3,300 करोड़ से ज्यादा की कमाई
इस नीलामी की खास बात यह भी है कि देश के बड़े रियल एस्टेट नामों में शामिल DLF भी इस जमीन को हासिल करने की दौड़ में था. लेकिन अंतिम मुकाबले में M3M की बोली सबसे आगे निकल गई.
यह सौदा इसलिए भी अहम है क्योंकि नोएडा में बड़े और अच्छी लोकेशन वाले जमीन के टुकड़े सीमित हैं. ऐसे में डेवलपर्स इन जमीनों को हासिल करने के लिए भारी प्रीमियम देने से भी पीछे नहीं हट रहे.
नोएडा अथॉरिटी ने इस नीलामी में कुल पांच जमीन के टुकड़े रखे थे. इनसे अथॉरिटी को कुल मिलाकर 3,300 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम मिली.
M3M पहले भी लगा चुका है बड़ा दांव
M3M के लिए नोएडा में यह पहली बड़ी बाजी नहीं है. जनवरी 2025 में कंपनी ने 23,570 वर्ग मीटर का कमर्शियल प्लॉट 400 करोड़ रुपये से ज्यादा में हासिल किया था. वहीं Max Estates ने भी 41,835 वर्ग मीटर के एक प्लॉट के लिए 700 करोड़ रुपये से ज्यादा की बोली लगाई थी.
कंपनियां क्यों टूट पड़ रहीं
असल सवाल यही है. जब एक जमीन की शुरुआती कीमत 835 करोड़ रुपये हो और बोली 1,839 करोड़ रुपये तक पहुंच जाए, तो कंपनियां इतना बड़ा जोखिम क्यों ले रही हैं? इसका जवाब है लोकेशन और भविष्य की कमाई. दिल्ली-एनसीआर में प्राइम जमीन सीमित है, जबकि कमर्शियल और प्रीमियम रियल एस्टेट की मांग बनी हुई है. डेवलपर्स को उम्मीद है कि ऐसी जगहों पर आने वाले प्रोजेक्ट से लंबे समय में इस भारी जमीन लागत की भरपाई की जा सकेगी.
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