चेक बाउंस केस में राजपाल यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, सरेंडर पर रोक लेकिन 5 करोड़ जमा करने का आदेश

चेक बाउंस केस में राजपाल यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, सरेंडर पर रोक लेकिन 5 करोड़ जमा करने का आदेश
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नई दिल्ली, 8 सितंबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अभिनेता और कॉमेडियन राजपाल यादव और उनकी पत्नी की याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई। इस याचिका में दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें कई चेक बाउंस मामलों में उनकी सजा को बरकरार रखा गया था। कोर्ट ने उन्हें 5 करोड़ रुपए जमा करने की शर्त पर सरेंडर करने से छूट दे दी। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की बेंच (जिसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे) ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) का जिक्र होने के बाद उन्हें सुनवाई के लिए स्वीकार किया और सशर्त नोटिस जारी किया, जिसका जवाब 15 सितंबर तक देना था। सीजेआई कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने अपने आदेश में कहा, 'मौखिक रूप से ज़िक्र किए जाने पर, स्पेशल लीव पिटीशन को सुनवाई के लिए स्वीकार किया जाता है।' सुप्रीम कोर्ट ने आगे निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को सरेंडर करने से छूट दी जाएगी, बशर्ते वे बुधवार तक शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री में 5 करोड़ रुपए जमा करें। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया, 'याचिकाकर्ताओं द्वारा कल तक इस अदालत की रजिस्ट्री में 5 करोड़ रुपए जमा करने की शर्त पर, उन्हें सरेंडर करने से छूट दी जाती है।' ये एसएलपी राजपाल यादव और उनकी पत्नी ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देते हुए दायर की हैं, जिसमें 'नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट' के तहत चेक बाउंस होने के सात मामलों में उनकी सजा को बरकरार रखा गया था। दिल्ली हाई कोर्ट ने 10 जुलाई को राजपाल यादव की सजा को बरकरार रखा था, लेकिन सात मामलों में से प्रत्येक में उनकी सजा को छह महीने से घटाकर तीन महीने की साधारण कैद कर दिया था। कोर्ट ने हर मामले में जुर्माना भी 1.60 करोड़ रुपए से घटाकर 1.05 करोड़ रुपए कर दिया था और सभी मुख्य सजाओं को एक साथ चलाने का निर्देश दिया था। हाई कोर्ट ने कार्यवाही के दौरान शिकायतकर्ता मेसर्स मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को अभिनेता द्वारा पहले ही किए गए भुगतान को ध्यान में रखा था। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर याचिकाओं में तर्क दिया गया कि हाई कोर्ट पार्टियों के बीच बाद में हुए उस सहमति समझौते पर विचार करने में विफल रहा, जिसके तहत कथित तौर पर पहले दिए गए सिक्योरिटी चेक वापस किए जाने थे और नए चेक जारी किए जाने थे। याचिकाकर्ताओं ने मेसर्स गिम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम मनोज गोयल मामले में शीर्ष अदालत के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि पार्टियों के बीच बाद में हुए समझौते से मूल शिकायत की कार्यवाही समाप्त हो जानी चाहिए थी और संबंधित चेक अब वैध नहीं थे। याचिका के अनुसार, राजपाल यादव द्वारा बनाई जा रही एक फिल्म के संबंध में पार्टियों के बीच चार समझौते हुए थे, क्योंकि पहले के समझौते तय समय सीमा के भीतर पूरे नहीं हो पाए थे। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि चौथे समझौते (जिसे 21 अप्रैल, 2013 का सहमति समझौता भी कहा जाता है) के तहत, पिछले समझौते में जारी किए गए आठ सिक्योरिटी चेक वापस किए जाने थे और 10 करोड़ रुपए के चार नए चेक जारी किए गए थे। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि प्रतिवादी ने आठ सिक्योरिटी चेक वापस नहीं किए और इसके बजाय, उनमें से सात चेक बाउंस होने के बाद कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालतों ने बाद में हुए सहमति समझौते के असर और इस दलील पर विचार नहीं किया कि जिन चेक के आधार पर शिकायतें की गई थीं, वे अब लागू करने योग्य नहीं थे। इससे पहले, दिल्ली हाई कोर्ट ने अभिनेता और उनकी पत्नी द्वारा दायर रिवीजन याचिकाओं को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि सजा को चुनौती देने में 1,894 दिनों की बहुत ज्यादा देरी हुई है और निचली अदालतों के फैसलों में दखल देने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि आपसी समझौते के लिए कई बार मौके और रियायतें दिए जाने के बावजूद, राजपाल यादव कोर्ट के सामने दिए गए वादों को पूरा करने में नाकाम रहे। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा था, 'यह कहने की जरूरत नहीं है कि अगर कोई मुकदमेबाज कोर्ट में दिए गए कई वादों को मानने के बजाय जेल जाने का रास्ता चुनता है, तो यह पूरी तरह से उसकी पसंद है। कानून कोई ऐसी स्क्रिप्ट नहीं है जिसे किसी अभिनेता की मर्ज़ी से दोबारा लिखा जा सके, और न ही रणनीति बदलने के साथ कानूनी स्थिति बदली जा सकती है, चाहे मुकदमेबाज़ कोई भी हो। अदालतें तय कानूनी सिद्धांतों और अपने सामने मौजूद रिकॉर्ड के आधार पर फैसला करती हैं।' हाई कोर्ट ने सात मामलों में से हर एक में जुर्माना घटाकर 1.05 करोड़ रुपए कर दिया था, जो कुल मिलाकर 7.35 करोड़ रुपए होता है। हर मामले में जुर्माने की रकम में से 1,04,75,000 रुपये मेसर्स मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को देने का निर्देश दिया गया था, जबकि 25,000 रुपये राज्य सरकार को जमा करने थे। हाई कोर्ट ने बदली हुई सजा को दो महीने के लिए रोक भी दिया था ताकि याचिकाकर्ता कानून के तहत उपलब्ध उपायों का लाभ उठा सकें।

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