सिद्धार्थनगर। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु, सिद्धार्थनगर के वनस्पति विज्ञान विभाग द्वारा जनपद की महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर मझौली सागर को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई है। विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आशुतोष कुमार वर्मा के नेतृत्व में शोधार्थी अनामिका सिंह एवं हर्षित सिंह के सहयोग से मझौली सागर का विस्तृत वैज्ञानिक एवं जैव-विविधतापरक अध्ययन किया गया है।
इस अध्ययन के आधार पर तैयार (RIS) एवं विस्तृत प्रस्ताव आज विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. अश्वनी कुमार के माध्यम से जिलाधिकारी, सिद्धार्थनगर को प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर डॉ आशुतोष कुमार श्रीवास्तव डॉक्टर अंकित तथा डॉ. आशुतोष कुमार वर्मा एवं उनकी शोध-अध्ययन टीम भी उपस्थित रही।
डॉ. आशुतोष कुमार वर्मा ने बताया कि मझौली सागर का अध्ययन केवल जलाशय के रूप में नहीं, बल्कि इसके संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र और जैव-विविधता को ध्यान में रखकर किया गया है। अध्ययन के दौरान यहां 145 पौधों की प्रजातियों, 122 पक्षी प्रजातियों तथा 39 मछली प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की गई है। इनमें कई प्रजातियां संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने बताया कि मझौली सागर में वर्षभर जल का संचयन बना रहता है, जिसके कारण यहां एक विशिष्ट जलीय एवं स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र विकसित हुआ है। यही निरंतर जल उपलब्धता यहां विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों, पक्षियों, मछलियों तथा अन्य जीव-जंतुओं के लिए अनुकूल प्राकृतिक वातावरण तैयार करती है।
रामसर साइट क्यों कहा जाता है डॉ. वर्मा ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों के संरक्षण एवं उनके विवेकपूर्ण उपयोग के लिए वर्ष 1971 में ईरान के रामसर शहर में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। इसी सम्मेलन के नाम पर अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों को 'रामसर साइट' कहा जाता है। किसी आर्द्रभूमि को रामसर साइट के रूप में मान्यता मिलने से उसके संरक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन और सतत विकास को अंतरराष्ट्रीय महत्व प्राप्त होता है।
उन्होंने बताया कि मझौली सागर का वैज्ञानिक अध्ययन इसी दृष्टि से किया गया है कि इसकी जैव-विविधता, प्राकृतिक विशेषताओं और संरक्षण की संभावनाओं को वैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत किया जा सके। विश्वविद्यालय द्वारा तैयार (RIS) में मझौली सागर की विशेषताओं और संभावनाओं का विस्तृत विवरण दिया गया है।
कुलपति प्रो. कविता शाह ने रामसर साइट के संबंध में कहा कि कहा कि मझौली सागर सिद्धार्थनगर की प्राकृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां पाई जाने वाली पौधों, पक्षियों और मछलियों की विविध प्रजातियां इसके समृद्ध पारिस्थितिक महत्व को दर्शाती हैं। विश्वविद्यालय का प्रयास है कि इस प्राकृतिक संपदा का संरक्षण वैज्ञानिक आधार पर किया जाए और इसे शोध एवं शिक्षा से जोड़ा जाए। मझौली सागर को रामसर साइट के रूप में विकसित करने से इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने की संभावना है।
इसके साथ ही यहां पक्षी अभयारण्य, बर्ड-वॉचिंग और इको-टूरिज्म की व्यापक संभावनाएं विकसित हो सकती हैं। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा। विश्वविद्यालय इस कार्य में जिला प्रशासन एवं शासन के साथ पूर्ण सहयोग के लिए तत्पर है। हमारा उद्देश्य केवल किसी औपचारिक दर्जे तक सीमित नहीं है, बल्कि मझौली सागर का दीर्घकालिक संरक्षण और सतत विकास सुनिश्चित करना है। हमें विश्वास है कि आने वाले समय में मझौली सागर सिद्धार्थनगर की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
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