जालौन: कालपी की हैंडमेड पेपर इंडस्ट्री; GI टैग के बाद भी संघर्ष, 200 से घटकर बचीं सिर्फ 60 इकाइयां

जालौन: कालपी की हैंडमेड पेपर इंडस्ट्री; GI टैग के बाद भी संघर्ष, 200 से घटकर बचीं सिर्फ 60 इकाइयां
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जालौन: कपड़े की कतरन से तैयार होती लुगदी, पानी में आकार लेती कागज की शीट, फिर प्रेसिंग और धूप में सुखाने की प्रक्रिया... कालपी का हस्तनिर्मित कागज आज भी इसी पारंपरिक हुनर से तैयार हो रहा है. फाइल कवर से लेकर डायरी, लिफाफे, कैरी बैग और डिजाइन पेपर तक यहां तैयार किए जाते हैं. इस कारोबार को GI टैग से पहचान भी मिल चुकी है, लेकिन बाजार की चुनौती ने उद्योग की रफ्तार जरूर धीमी कर दी है. पेश है जालौन से संवाददाता अमित कुमार शुक्ल की स्पेशल रिपोर्ट: घटती इकाइयों ने बढ़ाई उद्योगपतियों की चिंता: उद्योग से जुड़े नरेंद्र तिवारी ने बताया कि एक दौर में कालपी में हस्तनिर्मित कागज की करीब 200 इकाइयां संचालित होती थीं. अब करीब 60 इकाइयां ही चल रही हैं. दूसरी ओर उपायुक्त उद्योग धर्मेंद्र भास्कर ने बताया कि उनके विभागीय रिकॉर्ड में हस्तनिर्मित कागज की कोई इकाई बंद दर्ज नहीं है. इकाइयों की संख्या को लेकर सामने आ रही यह अलग-अलग तस्वीर इस पारंपरिक उद्योग की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए अहम है. कच्चे माल से तैयार होती है बारीक शीट: कालपी में हस्तनिर्मित कागज बनाने के लिए कपड़े की कतरन और दूसरे रेशेदार कच्चे माल का इस्तेमाल किया जाता है. कतरन को मशीन में डालकर लुगदी तैयार की जाती है. इसके बाद पानी और लुगदी से शीट बनाई जाती है. प्रेसिंग, सुखाने, कटिंग और फिनिशिंग के बाद कागज को अलग-अलग उत्पादों में बदला जाता है. मौसम की मार से प्रभावित होता है काम: इकाइयों में कच्चे माल का स्टॉक, पुरानी मशीनें और तैयार-अधबनी कागज की शीट इस पारंपरिक प्रक्रिया की तस्वीर दिखाती हैं. बारिश के मौसम में खुले में कागज सुखाना मुश्किल हो जाता है. धूप कम मिलने से तैयार शीट के सूखने में समय लगता है और उत्पादन की रफ्तार घट जाती है. अन्नपूर्णा एंटरप्राइजेज के संचालक विनीत गुप्ता ने बताया कि उनकी इकाई में पहले करीब 20 से 25 लोग काम करते थे, अब करीब 12 कर्मचारी रह गए हैं. बढ़ती लागत और मशीन निर्मित कागज की चुनौती: इनमें करीब छह महिलाएं और छह पुरुष हैं. विनीत गुप्ता ने बताया कि बारिश में कागज सुखाने का काम प्रभावित होता है. कच्चे माल, बिजली और मजदूरी की लागत बढ़ी है, जबकि हस्तनिर्मित कागज की बिक्री पहले की तुलना में कम हुई है. उन्होंने बताया कि मिल से तैयार होने वाले कागज की तुलना में हस्तनिर्मित कागज महंगा पड़ता है, जिससे बाजार में प्रतिस्पर्धा मुश्किल हो रही है. विदेशों तक पहुंचता है कालपी का हस्तनिर्मित कागज: कालपी का हस्तनिर्मित कागज देश के अलग-अलग बाजारों में पहुंचता है. यहां तैयार कागज और इससे बने उत्पादों की विदेशी बाजारों तक भी सप्लाई हो रही है. उपायुक्त उद्योग धर्मेंद्र भास्कर ने बताया कि कालपी के हस्तनिर्मित कागज की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सप्लाई कई देशों तक होती है. उन्होंने इंग्लैंड, जापान, जर्मनी, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और सऊदी अरब समेत अन्य देशों में इसकी पहुंच की जानकारी दी. मांग के अनुसार बदले गए उत्पाद और डिजाइन: विदेशी बाजार से जुड़े कारोबारियों के लिए GI टैग के बाद नए खरीदारों और ऑर्डर की संभावनाएं भी बढ़ी हैं. अब कारोबारियों के सामने चुनौती इस बाजार को लगातार बनाए रखने और उसका सीधा लाभ स्थानीय इकाइयों तक पहुंचाने की है. कालपी में समय के साथ हस्तनिर्मित कागज के उत्पादों में भी बदलाव आया है. पहले सामान्य कागज और फाइल कवर की मांग प्रमुख थी, जबकि अब डिजाइन और विशेष उपयोग वाले कागज की मांग बढ़ी है. सरकारी विभागों में प्राथमिकता देने की उठी मांग: कारीगर सुरेंद्र ने बताया कि वह करीब आठ साल से इस काम से जुड़े हैं. उन्होंने बताया कि पहले एक-दो तरह के कागज का काम होता था, लेकिन अब अलग-अलग डिजाइन और वैरायटी तैयार की जा रही हैं. यहां फाइल कवर, लेटर पैड, निमंत्रण पत्र, कैरी बैग, डायरी, लिफाफे, फाइल बोर्ड और सजावटी कागज जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं. कागज कारोबारी राकेश कुमार गुप्ता ने बताया कि हस्तनिर्मित कागज के सामने सबसे बड़ी चुनौती मिल से बनने वाले कागज की है. बिजली दरों में राहत की कारोबारियों ने की अपील: मशीन से बड़ी मात्रा में उत्पादन होने के कारण मिल का कागज सस्ता पड़ता है, जबकि हस्तनिर्मित कागज में श्रम और दूसरी लागत अधिक आती है. राकेश कुमार गुप्ता ने बताया कि अभी बाजार में मांग काफी कम है. उन्होंने बिजली की दरों में राहत देने की मांग की, ताकि उत्पादन लागत कम हो और कालपी का हस्तनिर्मित कागज प्रतिस्पर्धा में टिक सके. उत्तर प्रदेश पेपर एसोसिएशन के अध्यक्ष नरेंद्र तिवारी ने बताया कि कालपी में हस्तनिर्मित कागज का काम करीब एक सदी पुराना है. महिलाओं को मिल रहा है रोजगार का अवसर: उन्होंने बताया कि एक समय यहां 150 से 200 तक इकाइयां संचालित होती थीं और बड़ी संख्या में लोगों की रोजी-रोटी इससे जुड़ी थी. नरेंद्र तिवारी ने बताया कि पहले सरकारी विभागों की खरीद से उद्योग को बड़ा बाजार मिलता था. अब सरकार को फाइल कवर, लिफाफे, कैरी बैग, डायरी, कार्ड और फाइल बोर्ड जैसे उत्पादों की खरीद में हस्तनिर्मित कागज को प्राथमिकता देनी चाहिए. उन्होंने सरकारी खरीद में हस्तनिर्मित कागज के लिए निश्चित हिस्सेदारी तय करने की मांग की है. महंगाई के कारण युवाओं का मोहभंग: कालपी के हस्तनिर्मित कागज उद्योग में महिलाएं भी बड़ी संख्या में अलग-अलग कामों से जुड़ी हैं. छंटाई, फिनिशिंग और तैयार उत्पादों से जुड़े काम में महिलाओं की भागीदारी दिखाई देती है. कई महिला श्रमिकों ने सामाजिक और पारिवारिक कारणों से अपना नाम और चेहरा सार्वजनिक नहीं करने की इच्छा जताई. मैजान ने बताया कि कागज के काम से मिलने वाली कमाई परिवार की जरूरतों में मदद करती है. कम मजदूरी से पलायन कर रहे हैं मजदूर: हस्तनिर्मित कागज का काम कई परिवारों में पीढ़ियों से चला आ रहा है, लेकिन अब नई पीढ़ी के सामने कमाई का सवाल खड़ा है. कृष्ण कुमार ने बताया कि उनके परिवार में पीढ़ियों से हस्तनिर्मित कागज का काम होता आया है और उन्होंने भी यही काम सीखा. उन्होंने बताया कि महंगाई बढ़ने और कागज की बिक्री कम होने से आमदनी पर्याप्त नहीं हो पा रही है. काम मंदा होने से मजदूर दूसरे कामों की ओर जा रहे हैं. जीआई टैग से मिली पहचान: कागज उद्योग में काम करने वाले जाहिद अहमद ने बताया कि स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलने से काम की तलाश में बाहर नहीं जाना पड़ता. उन्होंने बताया कि वेतन कम होने के कारण युवाओं की दिलचस्पी इस काम में घट रही है. उनके अनुसार दूसरे शहरों में 18 से 25 हजार रुपये तक कमाई के अवसर मिल जाते हैं, जबकि यहां शुरुआती कमाई करीब 8 से 12 हजार रुपये के आसपास रहती है. कालपी के हस्तनिर्मित कागज को वर्ष 2023 में GI टैग मिला. ODOP योजना के तहत मिल रही है मदद: इससे उत्पाद को भौगोलिक पहचान मिली और अधिकृत उपयोगकर्ताओं को इसकी पहचान के साथ बाजार में जाने का अवसर मिला. GI पंजीकरण के आधिकारिक रिकॉर्ड में काल्पी हैंडमेड पेपर दर्ज है. आवेदन संख्या 733 के तहत इसका पंजीकरण हुआ और प्रमाणपत्र 14 जून 2023 को जारी किया गया. आधिकारिक सूची में अधिकृत उपयोगकर्ता भी दर्ज हैं. प्रशिक्षण और IIT कानपुर का लिया जा रहा सहयोग: धर्मेंद्र भास्कर ने बताया कि GI से जुड़े कारोबारियों को व्यापार मेलों, स्टॉल और बायर सेलर मीट के जरिए बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है. उन्होंने बताया कि कुछ इकाइयों को बड़े ऑर्डर भी मिले हैं. वहीं कारोबारियों ने बताया कि GI टैग से पहचान जरूर मजबूत हुई है, लेकिन लगातार बिक्री और पर्याप्त ऑर्डर मिलने पर ही इसका पूरा फायदा दिखाई देगा. कालपी का हस्तनिर्मित कागज जालौन के ODOP उत्पादों में शामिल है. आउटलेट और स्टॉल के जरिए प्रमोशन की कोशिश: धर्मेंद्र भास्कर ने बताया कि ODOP मार्जिन मनी योजना के तहत करीब 45 से 50 लोगों को लाभ मिला है और इससे लगभग 200 रोजगार सृजित हुए हैं. उन्होंने बताया कि हस्तनिर्मित कागज के लिए अलग से प्रशिक्षण की प्रक्रिया चल रही है और इसके लिए विभाग ने प्रशिक्षण लक्ष्य मांगा है. जिलाधिकारी राजेंद्र प्रताप पांडेय ने बताया कि हस्तनिर्मित कागज को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने पर काम किया जा रहा है. इसके लिए IIT कानपुर की प्रोफेसर रीता सिंह और उद्योग से जुड़े लोगों के साथ प्रशिक्षण, गुणवत्ता सुधार और बाजार की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है. हुनर को जिंदा रखने के लिए बाजार बढ़ाना जरूरी: उन्होंने बताया कि बाहर से आने वाले लोगों को कालपी के इस उत्पाद और इसकी निर्माण प्रक्रिया की जानकारी देने के लिए दो स्थानों पर आउटलेट/स्टॉल तैयार किए जा रहे हैं. जिलाधिकारी ने बताया कि जिला प्रशासन की कोशिश है कि ODOP के तहत हस्तनिर्मित कागज उद्योग को हर संभव सहयोग मिले. कालपी में हस्तनिर्मित कागज बनाने का हुनर आज भी जिंदा है. कपड़े की कतरन से तैयार होती लुगदी, हाथों से बनती शीट, रंग-बिरंगे डिजाइन और फिनिशिंग का काम इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है. रोजगार का भरोसा कायम करने की चुनौती: GI टैग से पहचान मिली है, ODOP के जरिए सहायता पहुंच रही है और विदेशी बाजार तक पहुंच भी बनी हुई है. लेकिन कारोबारियों के सामने बिक्री, बढ़ती लागत और सस्ते मशीन निर्मित कागज से प्रतिस्पर्धा की चुनौती है. वहीं कम आमदनी के कारण युवाओं का इस काम से दूर होना उद्योग के भविष्य का सवाल भी खड़ा कर रहा है. कालपी का हस्तनिर्मित कागज पीढ़ियों के हुनर और हजारों लोगों की आजीविका से जुड़ा है. अब इस पारंपरिक कारोबार के सामने चुनौती है कि बाजार कैसे बढ़े, लागत कैसे घटे और इस हुनर से जुड़ी अगली पीढ़ी को रोजगार का भरोसा कैसे मिले. यह भी पढ़ें- सावधान! हाईवे पर Google Maps के भरोसे न छोड़ें जिंदगी

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