Kalpana mishra: रीवा राजनीति जब संवेदनाओं का सौदा करने लगे और राजनीति की रोटियां सेंकने के चक्कर में इंसानी दर्द का मजाक बनने लगे, तो सवाल पूछना बेहद लाजिमी हो जाता है। रीवा के संजय गांधी अस्पताल में हुई प्रसूता कल्पना मिश्रा और उनके नवजात शिशु की दर्दनाक मौत के मामले ने पूरे मध्य प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। एक तरफ पीड़ित पिता अपनी दिवंगत बेटी और मासूम पोते को न्याय दिलाने के लिए 2 तारीख से सड़क पर, चौराहे की धूप और धूल में बिना अन्न-जल ग्रहण किए अनशन पर बैठे हैं, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी और उसकी महिला कार्यकर्ताओं का जो असली चाल, चेहरा और चरित्र सामने आया है, उसने हर संवेदनशील नागरिक का सिर शर्म से झुका दिया है। एक तरफ ढोंग, दूसरी तरफ जश्न का माहौल!
रीवा में कांग्रेस नेताओं की कथनी और करनी का यह विरोधाभास किसी का भी खून खौला देने के लिए काफी है दिन में सहानुभूति का नाटक कांग्रेस की महिला नेत्री और कार्यकर्ता अनशन स्थल पर जाती हैं, लाचार पिता के साथ बैठकर कैमरे के सामने आंसू बहाती हैं और सरकार व अस्पताल प्रशासन के खिलाफ घड़ियाली आंसू बहाकर न्याय की मांग करने का ढोंग रचती हैं।
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लेकिन जैसे ही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के रीवा आगमन पर डिनर की टेबल सजती है, सारा दुख और पीड़ा एक पल में हवा हो जाती है। वही महिला कार्यकर्ता जो दिन में अनशन का नाटक कर रही थीं, दिग्विजय सिंह के स्वागत में ठहाके लगाते हुए और हंसते-गाते हुए मांगलिक गीत गाती हुई नजर आती हैं। क्या यही है कांग्रेस की राजनीति और संवेदना?
कहाँ गया वो पिता का दर्द एक असहाय पिता अपनी मृत बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए कड़कती सड़क पर आमरण अनशन कर रहा है, उसकी सांसें टूट रही हैं, और दूसरी तरफ उसकी तथाकथित 'हमदर्द' कांग्रेस की महिला नेत्री वीआईपी नेताओं के सामने डिनर का लुत्फ उठाते हुए गीत गा रही हैं।
क्या यह पीड़िता का अपमान नहीं है? जिस घटना ने पूरे शहर में मातम फैला रखा है, जिस बेटी की मौत पर पूरा रीवा आक्रोशित है, उस दर्दनाक हादसे के बीच कांग्रेसियों के लिए यह जश्न मनाने और मंगलगान गाने का मौका कैसे बन गया?
सिर्फ राजनीतिक माइलेज की भूख इस शर्मनाक कृत्य से स्पष्ट है कि कांग्रेस पार्टी को न तो कल्पना मिश्रा की मौत का कोई मलाल है और न ही उसके बुजुर्ग पिता के आंसुओं की कोई परवाह। उनके लिए यह दुखद हादसा केवल और केवल एक 'राजनीतिक इवेंट' था, जिसका इस्तेमाल वे सिर्फ अपना चेहरा चमकाने और वीआईपी नेताओं को खुश करने के लिए कर रहे थे। शर्म आनी चाहिए ऐसी दोहरी राजनीति करने वालों को!
यह राजनीति का सबसे निचला स्तर है। अगर कांग्रेस पार्टी और उसकी महिला कार्यकर्ताओं में जरा सी भी नैतिकता और संवेदनशीलता बची होती, तो वे उस पीड़ित परिवार के प्रति एकजुटता दिखाते हुए ऐसे किसी भी जश्न या स्वागत समारोह से दूर रहतीं।
सड़क पर भूख-प्यास से तड़पते पिता के आंसुओं का सौदा करके वीआईपी डिनर में मंगलगान गाने वाली इन महिला कार्यकर्ताओं और कांग्रेसी नेताओं को जनता कभी माफ नहीं करेगी। यह घटना कांग्रेस के उस खोखलेपन को पूरी तरह उजागर करती है, जहां आम जनता का दर्द सिर्फ और सिर्फ एक चुनावी मुद्दा होता है, और नेताओं की खातिरदारी सबसे पहला धर्म। ऐसी दोहरी और संवेदनहीन राजनीति करने वाले चेहरों को वाकई शर्म आनी चाहिए!
अमर मिश्रा 'हरित प्रवाह' समाचार पत्र के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार हैं। इन्हें डिजिटल मीडिया और समाचार संपादन का लंबा अनुभव है।
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