'मे आई कम इन', यह सुनते ही एचआर पर्सन ने अपनी डेस्क से नजर उठाई और सिर हिला दिया। कैंडिडेट अंदर आया, कुर्सी में धंसकर बैठा और सीधे बैठने की कोशिश किए बिना ही बैठा रहा। एचआर पर्सन कुछ सेकंड इंतजार करती रहीं कि वह एयरपॉड्स निकाले। जब उसने ऐसा नहीं किया तो उन्होंने एयरपॉड्स निकालने को कहा और पूछा कि उसे कैशियर की नौकरी क्यों सही लगती है?
उसने कहा कि 'यह पार्ट-टाइम जॉब है और मैं फ्री टाइम में जो करना चाहता हूं, उसके हिसाब से ठीक है। मैं अपने दोस्तों के साथ बाहर जा सकता हूं, छुट्टियों पर जा सकता हूं और ऐसी दूसरी चीजें कर सकता हूं।' उसके जवाब, टोन और बॉडी लैंग्वेज ने पूरे सिलेक्शन पैनल को एक साफ संदेश दे दिया था: वह ऐसा व्यक्ति नहीं होगा, जो शुक्रवार की रात बाहर घूमने के बाद शनिवार सुबह तैयार होकर काम पर पहुंच जाए।
अगर उसकी सोशल लाइफ में बाधा आई तो शायद काम ही पहली चीज होगी, जिसे वह त्याग देगा। अगला कैंडिडेट अलग था। उसने अपने अपीरियंस, गंभीरता और धैर्य से पैनल को इम्प्रेस किया। जब तक उसे नहीं बोला गया, उसने बैठने का इंतजार किया और फिर सीधा होकर बैठा, सुनने के लिए तैयार। उसे शॉर्टलिस्ट कर लिया गया और पॉइंट ऑफ सेल (पीओएस) काउंटर पर काम कर रहे युवा कैशियरों को आब्जर्व करने के लिए दो घंटे दिए गए। उसका टेस्ट एक खाली काउंटर से शुरू हुआ।
बिल 1272 रुपए का था। कस्टमर बनी एचआर पर्सन ने उसे 500-500 रुपए के तीन नोट दिए। कैश ड्रॉअर में अलग-अलग कीमत के नोट थे, लेकिन सिर्फ 10 रुपए तक के। साथ ही 1 रुपए के दो सिक्के भी थे। मशीन ने उसे 228 रुपए लौटाने को कहा। वह हिचकिचाया। पहले उसने कस्टमर से कहा कि उसके पास छुट्टे नहीं हैं। कस्टमर ने उसे 1-1 रुपए के दो सिक्के दिए और 230 रुपए लौटाने का सुझाव दिया।
लेकिन कैंडिडेट ने मना कर दिया और कहा कि मशीन साफ तौर पर 228 रुपए दिखा रही है। वह अपना काउंटर बंद कर दूसरे काउंटर पर गया, छुट्टे लिए और बिल्कुल सही रकम लौटाई। इस पूरी प्रक्रिया में करीब चार मिनट लगे और इस दौरान कतार में पांच और ग्राहक बढ़ गए। एचआर टीम ने उसे एक हफ्ते की ट्रेनिंग पर भेजने का निर्णय किया- कैश संभालने की नहीं, बल्कि भीड़ संभालने की। दोनों कैंडिडेट तकनीकी रूप से सक्षम थे।
लेकिन जो चीज दोनों को अलग करती थी, वह था काम के प्रति उनका रवैया। रविवार दोपहर महाराष्ट्र के जलगांव स्थित जैन इरिगेशन के कार्यालय में जब मेरी मुलाकात कंपनी के चारों प्रमोटर भाइयों—अशोक जैन, अनिल जैन, अजित जैन और अतुल जैन—से हुई, और मैंने उन्हें ये उदाहरण सुनाए तो उनका भी यही मानना था कि समाज जिस तरह से जेन-जी को नकारात्मक रूप में पेश कर रहा है, वे वास्तव में उतने बुरे नहीं हैं।
उनका कहना था कि जेन-जी के युवा अलग तरह से सोचते हैं, कुछ खास मूल्य-व्यवस्था को महत्व देते हैं और अपनी बात खुलकर व्यक्त करते हैं। शायद यही वजह है कि समाज उनके बारे में कई तरह की धारणाएं बना लेता है। अनिल जैन ने कहा, ' जेन-जी को संभालने के लिए हमें सबसे पहले अपने भीतर नेतृत्व क्षमता विकसित करनी होगी।' कोई आश्चर्य नहीं कि आप सभी ने वो सुना होगा, जो पिछले हफ्ते बिल गेट्स ने फ्यूचर टेक्नोलॉजी के बारे में कहा।
टेक्नोलॉजी फोरकास्टर के तौर पर उनका रिकॉर्ड काफी अच्छा रहा है। इसलिए उनकी बात पर आपको ध्यान देना चाहिए। उन्होंने भविष्यवाणी की कि आने वाले वर्षों में सिर्फ कुछ जातियों या दिव्यांग लोगों को ही जॉब रिजर्वेशन नहीं दिया जाएगा, बल्कि पूरी मानव प्रजाति ये रिजर्वेशन मांग सकती है, क्योंकि रोबोट और एआई मशीनों की बाढ़ हमारे जॉब छीन सकती है- शायद पहले कैंडिडेट की लापरवाही के कारण या दूसरे की गणितीय समझ की कमी के कारण।
लेकिन मध्य प्रदेश के ब्यावरा के 21 वर्षीय बीएससी स्टूडेंट सुरेंद्र सिंह चौधरी जैसे लोग भी हैं, जिन्हें अपने दरवाजे पर ही जॉब ऑफर मिलते हैं। सात महीनों तक उन्होंने अकेले ही प्रदूषित अजनार नदी की सफाई की। शायद इसलिये उन्हें नीदरलैंड्स से जॉब ऑफर मिलने की खबरें आ रही हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि हमें सुरेंद्र जैसे कमिटेड एंप्लॉयी क्यों नहीं मिलते?
मैं हमेशा रिजेक्टेड एंप्लॉयीज का इंटरव्यू करता हूं, ताकि उनका व्यवहार समझ सकूं। उन्हें नहीं लगता है कि उन्हें इतना वेतन मिल रहा कि वे अपना घर खरीदने के बारे में सोच सकें। आर्थिक अस्थिरता, कॉस्ट ऑफ लिविंग और और सोशल मीडिया पर लगातार दूसरों से तुलना करना उन्हें जीवन को काम के लिए वैसे समर्पित करने के प्रति हतोत्साहित करता है, जैसे उनके पैरेंट्स ने किया था।
फंडा यह है कि अगर आप जेन-जी के बिहेवियर पैटर्न समझेंगे तो आप उन्हें उनके व्यवहार के कारण रिजेक्ट नहीं करेंगे, जैसा कि मैंने पहले उम्मीदवार को जॉब ऑफर की थी।
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