नई दिल्लीः विदेश मंत्री एस. जयशंकर की शुक्रवार को पोलैंड यात्रा ऐसे समय में शुरू हुई है, जब रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्षों और अपनी रणनीतिक निर्भरताओं को कम व अलग करने के वैश्विक प्रयासों के बीच, यूरोप भू-राजनीतिक और आर्थिक शक्ति के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर रहा है.
इसलिए, वारसॉ (पोलैंड की राजधानी) में पोलैंड के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री राडोस्लाव सिकोर्स्की के साथ उनकी बातचीत केवल भारत-पोलैंड रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने तक सीमित नहीं रही. इस बातचीत ने एक तेजी से बदलती बहुध्रुवीय दुनिया में यूरोपीय संघ को एक महत्वपूर्ण शक्ति मानकर, उसके साथ अपने संबंधों को और गहरा करने के भारत के बड़े प्रयासों को रेखांकित किया.
विदेश मंत्री की इस यात्रा ने पोलैंड को भारत की यूरोपीय रणनीति के एक बड़े ढांचे में रख दिया है. यानी, पोलैंड अब भारत के लिए केवल एक द्विपक्षीय भागीदार नहीं है, बल्कि यूरोपीय संघ के भीतर एक प्रभावशाली आवाज बन चुका है. जिसे, नई दिल्ली अब उभरती वैश्विक व्यवस्था में एक अलग शक्ति के रूप में देखती है.
एक दिन पहले उनकी यूक्रेन यात्रा के बाद हुए इस संवाद ने भारत की कूटनीति को यूरोप के सुरक्षा संकट, भारत-यूरोपीय संघ के आर्थिक संबंधों और दुनिया भर में सप्लाई चेन को अधिक सुरक्षित और विविधतापूर्ण बनाने के प्रयासों के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है.
सिकोर्स्की के साथ अपनी बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा कि दोनों पक्षों ने उस कार्य योजना की समीक्षा की, जिस पर दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वारसॉ यात्रा के दौरान सहमति बनी थी.
उन्होंने कहा, "हमें जो प्रोग्रेस रिपोर्ट मिली वह बेहद मजबूत थी. यह व्यापार और निवेश में बढ़ोतरी, गहरे रक्षा सहयोग, खनन और ऊर्जा जैसे पारंपरिक क्षेत्रों में विस्तार के साथ-साथ अंतरिक्ष, डिजिटल, एआई और इनोवेशन में उभरती नई संभावनाओं को दर्शाती है."
उन्होंने आगे कहा, "जहां तक द्विपक्षीय तंत्र का सवाल है, हमारी फॉरेन ऑफिस कंसल्टेशन्स की बैठक हाल ही में हुई है, संयुक्त आयोग की बैठक हो चुकी है और जैसा कि आपने उप-प्रधानमंत्री से सुना, डिफेंस वर्किंग ग्रुप की बैठक भी जल्द ही होने वाली है. हम साइबर सुरक्षा, स्पेस, क्लीन कोल, क्लासीफाइड इन्फॉर्मेशन और क्रिटिकल मिनरल्स सहित कई अन्य क्षेत्रों में समझौतों पर काम कर रहे हैं. मुझे पूरा भरोसा है कि ये समझौते हमारे संबंधों को और अधिक मजबूती और गहराई देंगे."
लेकिन, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि जयशंकर ने भारत-यूरोपीय संघ के संबंधों को बढ़ावा देने में पोलैंड की भूमिका के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने कहा, "पिछले कुछ वर्षों में, यूरोपीय संघ के साथ भारत के संबंध बहुत स्पष्ट रूप से गहरे हुए हैं."
उन्होंने आगे कहा, "इसका सबसे मुख्य हिस्सा निश्चित रूप से मुक्त व्यापार समझौता (FTA) है, जिसे यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने 'सभी समझौतों की जननी' कहा था. यह दोनों पक्षों के लिए आर्थिक अवसरों के विशाल रास्ते खोलेगा. यूरोपीय संघ के एक प्रमुख सदस्य के रूप में, पोलैंड को स्वाभाविक रूप से इस प्रक्रिया में लाभ होगा. इसलिए, उप-प्रधानमंत्री और मैंने इस बात पर चर्चा की कि हम इस नए परिदृश्य का सबसे अच्छा लाभ कैसे उठा सकते हैं. इसके लिए दोनों तरफ से तेज़ी से अनुवर्ती कार्रवाई करने की आवश्यकता होगी और हम इस संबंध में एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं."
विदेश मंत्री ने कहा कि दुनिया अब तेजी से बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रही है, जहां सभी देश अपने जोखिमों को कम करने और निर्भरताओं को अलग-अलग जगहों पर बांटने पर ध्यान दे रहे हैं. उन्होंने कहा, "भारत यूरोपीय संघ को एक महत्वपूर्ण शक्ति मानता है और हमारे बढ़ते संबंध दुनिया में हो रहे इस बड़े बदलाव का एक खास हिस्सा हैं. हमें पूरा भरोसा है कि यूरोपीय संघ के भीतर पोलैंड की आवाज और उसका प्रभाव इस बदलाव को और बढ़ावा देगा."
जयशंकर की इस यात्रा ने यह साबित कर दिया है कि भारत-पोलैंड के संबंध अब केवल पारंपरिक रूप से अच्छे रहने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह रिश्ता अब एक बड़े रणनीतिक सहयोग में बदल रहा है.
अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री मोदी की पोलैंड यात्रा- जो 45 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली पोलैंड यात्रा थी, इस रिश्ते के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुई. इस दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया और साल 2024-28 के लिए एक पांच वर्षीय कार्य योजना को मंजूरी दी.
अब उस तैयार ढांचे को सहयोग के व्यावहारिक क्षेत्रों में बदला जा रहा है. कार्य योजना के "रिपोर्ट कार्ड" पर जयशंकर का आकलन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. उन्होंने बढ़ते व्यापार और निवेश, गहरे रक्षा सहयोग और खनन व ऊर्जा क्षेत्रों में विस्तार की ओर इशारा किया. इसके साथ ही उन्होंने अंतरिक्ष, डिजिटल टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इनोवेशन जैसे उभरते हुए क्षेत्रों का भी जिक्र किया.
यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद से पोलैंड का भू-राजनीतिक महत्व बहुत तेजी से बढ़ा है. NATO के पूर्वी छोर पर स्थित होने और यूक्रेन व बेलारूस के साथ सीमाएं साझा करने के कारण, पोलैंड यूरोप के सबसे प्रभावशाली सुरक्षा देशों में से एक बन गया है.
वारसॉ (पोलैंड) अपनी सैन्य शक्ति का भी बड़े पैमाने पर विस्तार कर रहा है. पोलैंड द्वारा 2026 में मूल रक्षा पर लगभग 53 बिलियन यूरो खर्च करने की उम्मीद है, जो कि उसके सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 4.7 प्रतिशत है. इसके साथ ही उसकी सेना में जवानों की संख्या बढ़कर 2,20,000 से अधिक हो गई है.
घरेलू रक्षा उत्पादन और सुरक्षित सप्लाई चेन पर पोलैंड का यह जोर, भारत के तेज़ी से बढ़ते रक्षा-औद्योगिक क्षेत्र के साथ सहयोग के नए अवसर पैदा करता है. यह स्थिति भारत-पोलैंड साझेदारी के रक्षा हिस्से को एक नया रणनीतिक संदर्भ देती है.
जयशंकर की वारसॉ यात्रा का असल और बड़ा महत्व यूरोपीय संघ के साथ भारत के लगातार बढ़ रहे रणनीतिक जुड़ाव में छिपा है. जयशंकर ने स्पष्ट रूप से यूरोपीय संघ को इस उभरती हुई बहुध्रुवीय दुनिया का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बताया और यूरोपीय ब्लॉक की दिशा को प्रभावित करने की पोलैंड की क्षमता को रेखांकित किया. यह यूरोप के भीतर पोलैंड के बढ़ते प्रभाव और वजन की एक बेहद सोची-समझी और सटीक स्वीकारोक्ति है.
साल 2026 में भारत और यूरोपीय संघ के संबंधों में एक बहुत बड़ा बदलाव आया है. दोनों पक्षों के बीच भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते के लिए बातचीत 27 जनवरी 2026 को पूरी हो चुकी है. जबकि दोनों पक्षों ने व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद के माध्यम से भी अपना सहयोग जारी रखा है. यूरोपीय संघ भारत को एक महत्वपूर्ण व्यापार और निवेश भागीदार मानता है, जिसके साथ साल 2025 में द्विपक्षीय वस्तुओं का व्यापार 118 बिलियन यूरो तक पहुंच गया था.
शायद इस यात्रा का सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील पहलू यूक्रेन संघर्ष था. जयशंकर कीव (यूक्रेन की राजधानी) की यात्रा के ठीक बाद पोलैंड गए थे, जिसने वारसॉ को एक विशेष रूप से महत्वपूर्ण पड़ाव बना दिया. पोलैंड की यूक्रेन से भौगोलिक निकटता और कीव के लिए उसके कड़े समर्थन का मतलब है कि वारसॉ में इस युद्ध को मुख्य रूप से यूरोपीय सुरक्षा और रूस से मिलने वाले कथित खतरे के नजरिए से देखा जाता है.
भारत का रुख अलग है. नई दिल्ली, मॉस्को और कीव दोनों के साथ संबंध बनाए रखता है. लगातार यह तर्क देता रहा है कि संघर्ष को समाप्त करने के लिए बातचीत और कूटनीति आवश्यक हैं.
इस महीने की शुरुआत में बिश्केक में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ एक बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान को जयशंकर द्वारा दोहराया जाना कि "अंतहीन युद्ध को युद्ध के अंत का रास्ता देना चाहिए"- भारत के पुराने रुख की पुष्टि और इसे एक महत्वपूर्ण यूरोपीय वार्ताकार तक सीधे पहुंचाने का एक प्रयास था. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि युद्ध से कोई विजेता नहीं निकलता और हर एक अतिरिक्त दिन मानवीय और आर्थिक रूप से भारी कीमत लेकर आता है.
इसका महत्व यह है कि भारत यूक्रेन को लेकर अपने मतभेदों को व्यापक भारत-यूरोप संबंधों में बाधा बनने देने के बजाय, अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और यूरोप की सुरक्षा चिंताओं के बीच की दूरी को पाटने का लगातार प्रयास कर रहा है.
कीव के बाद वारसॉ की उनकी यात्रा ने भारत को यह दिखाने का अवसर भी दिया कि उसका कूटनीतिक जुड़ाव संघर्ष के किसी एक पक्ष तक ही सीमित नहीं है. रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ और नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक 'इमेजिनइंडिया' के अध्यक्ष रॉबिंदर नाथ सचदेव ने कहा कि वे पोलैंड के साथ भारत के जुड़ाव को यूरोपीय संघ (EU) के बजाय पूरे यूरोपीय महाद्वीप के नजरिए से अधिक देखते हैं.
सचदेव ने ईटीवी भारत से कहा, "पोलैंड यूरोप के भीतर एक आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में उभर रहा है. इसके साथ ही, वह यूरोपीय संघ और नाटो (NATO) दोनों के भीतर उनकी नीतियों को भी प्रभावित कर रहा है." उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके पीछे की वजह यह है कि रूस-यूक्रेन युद्ध में, पश्चिमी यूरोपीय देशों की तुलना में पूर्वी यूरोपीय देश अधिक आक्रामक और सक्रिय हैं.
सचदेव ने कहा, "पूर्वी यूरोपीय देश या पूर्वी नाटो ब्लॉक खुद को अधिक खतरे में महसूस करते हैं. वे रक्षा क्षेत्र में बहुत अधिक निवेश कर रहे हैं और सक्रिय रूप से अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ा रहे हैं. पश्चिमी ब्लॉक और पूर्वी यूरोपीय देशों के बीच एक खींचतान चल रही है और इनमें से पोलैंड शायद इस रुख का सबसे बड़ा समर्थक है."
उन्होंने आगे कहा कि भारत के लिए समग्र संबंधों को मजबूत करने के अलावा, यूरोपीय देशों के साथ व्यक्तिगत रूप से जुड़ना भी महत्वपूर्ण है. सचदेव ने कहा, "इन सभी देशों के साथ हम वर्तमान के मुकाबले कहीं अधिक काम कर सकते हैं, जिसमें वैज्ञानिक आदान-प्रदान, व्यापार, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और ऐसी तमाम चीजें शामिल हैं. भारत के यूरोपीय जुड़ाव में पोलैंड एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर रहा है."
कुल मिलाकर देखें तो जयशंकर की वारसॉ यात्रा को भारत की यूरोपीय रणनीति में हो रहे एक बड़े और नए बदलाव के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है. नई दिल्ली का संदेश अब बिल्कुल साफ है: यूरोप भारत के लिए सिर्फ एक आर्थिक साझेदार नहीं है; बल्कि यह इस बहुध्रुवीय दुनिया में लगातार मजबूत होता एक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्तंभ भी है.
इस रणनीति के भीतर पोलैंड एक बेहद दिलचस्प और मजबूत स्थिति में है. वह एक साथ कई भूमिकाएं निभा रहा है. वह यूरोप की सुरक्षा के मामले में अग्रिम मोर्चे पर खड़ा देश है. नाटो (NATO) का सदस्य है. यूरोपीय संघ का एक प्रभावशाली देश है. एक उभरती हुई सैन्य व औद्योगिक शक्ति है. साथ ही एक ऐसा देश भी है जिसके साथ भारत का पुराना कोई विवाद या कड़वाहट भरा इतिहास नहीं रहा है. यह अनोखा तालमेल दोनों देशों के संबंधों में विकास की अपार संभावनाओं को रास्ता देता है.
इसके साथ ही, इस यात्रा का समय भी बेहद महत्वपूर्ण है. यूक्रेन युद्ध के कारण जहां पूरा यूरोप अपने सुरक्षा ढांचे की नए सिरे से समीक्षा कर रहा है, वहीं अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा, सप्लाई चेन में आ रही रुकावटों और वैश्विक व्यापार की अनिश्चितताओं के बीच भारत भी अपनी रणनीतिक साझेदारियों को विविधता देने का प्रयास कर रहा है.
इस प्रकार, जयशंकर की वारसॉ यात्रा ने एक साथ तीन बड़े उद्देश्यों को पूरा किया. पहला- भारत-पोलैंड रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना, दूसरा- यूरोपीय संघ (EU) के एक उभरते हुए प्रभावशाली सदस्य के माध्यम से उसके साथ भारत के जुड़ाव को गति देना और तीसरा- यूरोप व पूरी दुनिया की व्यवस्था को बदल रहे बड़े संघर्षों पर भारत के कूटनीतिक दृष्टिकोण को सीधे सामने रखना.
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