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बदलते मौसम चक्र में राहत की उम्मीद, अल नीनो के असर को संतुलित कर सकती है अटलांटिक नीना

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प्रकृति ने अपने भीतर न जाने कितने ऐसे रहस्य छिपा रखे हैं, जिनकी परतें विज्ञान धीरे-धीरे खोल रहा है। जब भी कोई नई प्राकृतिक घटना सामने आती है, मनुष्य को अपने सीमित ज्ञान का एहसास होता है। भू-विज्ञान, मौसम विज्ञान और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ जानना, समझना और सीखना बाकी है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच मौसम की अनिश्चितता ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ाई है। ऐसे समय में जब अल नीनो के कारण कमजोर और अनियमित मानसून की आशंका जताई जा रही थी कि इसी बीच अटलांटिक नीना की सक्रियता ने कुछ राहत की उम्मीद जगाई। अटलांटिक नीनो और नीना अपेक्षाकृत नई समझी जाने वाली जलवायु घटनाएं हैं। प्रारंभ में इनके अस्तित्व ने वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया था। इनके स्वरूप और प्रभावों का अध्ययन करने पर पता चला कि इनका संबंध वैश्विक जलवायु और बढ़ते तापमान से भी है। हालांकि इनके नाम प्रशांत महासागर में होने वाली 'अल-नीनो' और 'ला-नीना' से मिलते-जुलते हैं, लेकिन दोनों को एक ही मानना उचित नहीं है। अटलांटिक नीनो और नीना भू-मध्यरेखीय अटलांटिक महासागर में होने वाली परस्पर विपरीत जलवायु घटनाएं हैं। अटलांटिक नीनो की स्थिति तब बनती है, जब भू-मध्यरेखीय अटलांटिक का समुद्री जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसके विपरीत, अटलांटिक नीना के दौरान समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से कम हो जाता है। अटलांटिक नीनो के समय पूर्वी हवाएं कमजोर पड़ती हैं, जबकि अटलांटिक नीना में ये हवाएं अपेक्षाकृत मजबूत हो जाती हैं। तेज हवाएं समुद्र की गहराई से ठंडे पानी को ऊपर लाने में मदद करती हैं। इन दोनों घटनाओं का वर्षा और मौसम पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अटलांटिक नीनो उष्णकटिबंधीय अटलांटिक क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों में वर्षा बढ़ा सकता है। इसके विपरीत, अटलांटिक नीना की स्थिति में वर्षा का स्वरूप बदल जाता है। अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में कम वर्षा और गिनी की खाड़ी के आसपास अपेक्षाकृत अधिक वर्षा जैसी स्थितियों के पीछे समुद्री तापमान और वायुमंडलीय परिसंचरण में होने वाले बदलाव महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिकों के लिए यह तथ्य विशेष रूप से अहम रहा कि वैश्विक ताप लगातार बढ़ने के बावजूद कभी-कभी अटलांटिक और पूर्वी प्रशांत महासागर के भू-मध्यरेखीय क्षेत्रों में एक साथ ठंडक दिखाई देती है। ऐसी स्थिति का संबंध ला नीना और अटलांटिक नीना जैसी घटनाओं से हो सकता है। ये दोनों घटनाएं समुद्र और वायुमंडल के बीच होने वाली जटिल पारस्परिक क्रिया को समझने में महत्त्वपूर्ण संकेत देती हैं। जुलाई और अगस्त 2024 में उत्तरी अटलांटिक महासागर में लंबे समय से जारी असाधारण गर्मी के बीच भू-मध्यरेखीय अटलांटिक क्षेत्र में ठंडक दिखाई दी। यह स्थिति इसलिए भी उल्लेखनीय थी, क्योंकि जून के प्रारंभ में समुद्र की सतह का तापमान काफी अधिक था। इसके बाद अटलांटिक नीना के विकसित होने के संकेत मिलने लगे। इसी अवधि में पूर्वी प्रशांत महासागर में भू-मध्यरेखा के निकट समुद्री जल भी ठंडा हो रहा था। प्रशांत क्षेत्र में ला नीना के विकसित होने की संभावना सामान्य तौर पर अक्तूबर या नवंबर के आसपास मानी जा रही थी, लेकिन इसके संकेत अपेक्षाकृत पहले दिखाई देने लगे। इन घटनाओं को समझने के लिए वैज्ञानिक वायुमंडलीय परिसंचरण के कई संकेतकों का अध्ययन करते हैं। इनमें 'वेग विभव' भी महत्त्वपूर्ण है। इसके माध्यम से यह समझने में सहायता मिलती है कि बड़े क्षेत्र में वायु कहां ऊपर उठ रही है और कहां नीचे उतर रही है। नीचे उतरती वायु सामान्यत: वातावरण को स्थिर बनाती है। इससे बादलों का निर्माण और उष्णकटिबंधीय तूफानों की गतिविधि कम हो सकती है। इसके विपरीत, ऊपर उठती वायु अधिक बादल और वर्षा के साथ उष्णकटिबंधीय तूफानी गतिविधियों को बढ़ावा दे सकती है। समुद्र की सतह का तापमान और वायुमंडलीय दबाव इन प्रक्रियाओं से गहराई से जुड़े होते हैं। पिछले चार दशकों के आंकड़ों का अध्ययन करने पर यह संकेत मिला है कि अटलांटिक नीना की सक्रियता के दौरान अपेक्षाकृत उच्च वायुदाब चक्रवातों की संख्या और उनके तट तक पहुंचने की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है। इसके विपरीत, अटलांटिक नीनो अफ्रीकी पूर्वी तरंग गतिविधि और निम्नस्तरीय चक्रवाती परिसंचरण को मजबूत करता है। ऐसी परिस्थितियां केप वर्डे द्वीपसमूह के आसपास गहरे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में शक्तिशाली तूफानों के विकसित होने की संभावना बढ़ाती हैं। अटलांटिक नीना का प्रभाव केवल तत्काल मौसम तक सीमित नहीं रहता। पिछले चार दशकों के अध्ययन यह संकेत देते हैं कि गर्मियों में अटलांटिक की समुद्री स्थितियां आगे आने वाली सर्दियों के मौसम को भी प्रभावित कर सकती हैं। ग्रीष्मकालीन अटलांटिक नीनो के बाद कनाडा और उत्तरी संयुक्त राज्य अमेरिका के ऊपर निम्न वायुदाब की स्थिति बनने की संभावना देखी गई है। इससे ऊपरी वायुमंडल में बहने वाली जेट धाराओं की तीव्रता प्रभावित हो सकती है। जेट धाराएं ऊपरी वायुमंडल में पश्चिम से पूर्व की ओर बहने वाली तेज और संकरी वायु धाराएं हैं। सामान्यत: ये लगभग 20,000 से 50,000 फुट की ऊंचाई पर पाई जाती हैं और इनकी गति 120 से 240 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे अधिक हो सकती है। ध्रुवीय ठंडी हवा और विषुवतीय गर्म हवा के बीच तापमान तथा वायुदाब में अंतर इनके निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। पृथ्वी के घूर्णन के कारण इन हवाओं की दिशा पश्चिम से पूर्व की ओर मुड़ जाती है। जेट धाराएं ठंडी और गर्म वायु राशियों को अलग रखने के साथ-साथ मौसम प्रणालियों, तूफानों और चक्रवातों के निर्माण को भी प्रभावित करती हैं। अब सबसे अहम प्रश्न यह है कि सक्रिय अटलांटिक नीना आने वाले समय में क्या प्रभाव डाल सकती है। समुद्र की सतह के तापमान में गिरावट से विकसित यह जलवायु स्थिति प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकती है। इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि मानसून निश्चित रूप से सामान्य या अत्यधिक अच्छा होगा, लेकिन ये परिस्थितियां कमजोर मानसून की आशंका को कुछ कम कर सकती हैं। भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में वर्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कहीं अत्यधिक वर्षा हो रही है, तो कहीं लंबे समय तक वर्षा का अभाव बना रहता है। ऐसे में अटलांटिक महासागर की गतिविधियों का अध्ययन और अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है। अटलांटिक नीना की सक्रियता यदि अपेक्षित रूप से प्रभावी रहती है, तो वह ला नीना के कारण उत्पन्न होने वाले कुछ प्रतिकूल प्रभावों को कम कर सकती है। परिणामस्वरूप भारत में मानसून की सक्रियता बढ़ने और वर्षा में तेजी की संभावना बन सकती है। समुद्र का तापमान, वायुमंडलीय परिसंचरण, जेट धाराएं, वैश्विक तापमान और अन्य अनेक कारक मिलकर मानसून और तूफानों का स्वरूप तय करते हैं। इसलिए अटलांटिक नीना को मानसून के लिए एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यदि इसकी सक्रियता बनी रहती है, तो अल नीनो के प्रभाव के बावजूद वर्षा की कमी कुछ हद तक पूरी होने की उम्मीद की जा सकती है।
बदलते मौसम चक्र में राहत की उम्मीद, अल नीनो के असर को संतुलित कर सकती है अटलांटिक नीना
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