पेपर लीक और छात्रों के मुद्दे पर इन दिनों उत्तर प्रदेश की सियासत गरम है. विपक्षी दल इसे सरकार को घेरने के लिए बड़े राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं. अखिलेश यादव भी लगातार पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं.
लेकिन जब कोई नेता युवाओं के हितों की बात करता है, तो उसके सवालों के साथ उसका अपना रिकॉर्ड भी सामने आता है. इसलिए आज जब अखिलेश सरकार से जवाब मांग रहे हैं, तो उनसे भी यह पूछना जरूरी है कि जब उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार थी, तब पेपर लीक, भर्ती विवाद और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों से सरकार कैसे निपटती थी?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि युवाओं का भविष्य किसी भी राजनीतिक दल के लिए सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं होना चाहिए. इसके लिए सरकार और विपक्ष दोनों को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए. सरकार को व्यवस्था पारदर्शी बनानी चाहिए तो विपक्ष को इसे राजनीतिक हथियार बनाने से बचना चाहिए.
अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए भर्ती आयोगों और परीक्षाओं को लेकर लगातार विवाद और शिकायतें सामने आती रहीं. सपा सरकार के कार्यकाल में पहली बार उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की पीसीएस परीक्षा का पेपर लीक हुआ था. कई अन्य भर्ती परीक्षाओं की प्रक्रिया और निष्पक्षता पर भी सवाल उठे.
उस दौर में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि आयोग को लेकर 'यादव आयोग' तक कहा गया. कई आयोगों में नियुक्तियों और अलग-अलग भर्तियों को लेकर भी सवाल उठे.
सबसे बड़ा सवाल यह था कि जब छात्र अपनी शिकायतों को लेकर सड़कों पर उतरे, तब सरकार का रवैया क्या था? कई मौकों पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई हुई. आज अखिलेश यादव प्रदर्शनकारी छात्रों से संवाद और उनकी बात सुनने की वकालत करते हैं, लेकिन उनके मुख्यमंत्री रहते छात्र आंदोलनों के दौरान लाठीचार्ज तक हुआ.
यहां इस बात को समझना सबसे जरूरी है. आज भले ही सपा और अखिलेश पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं पर सवाल उठा रहे हैं. लेकिन एक समय था जब सपा ने नकल को खुद संस्थागत बनाया था. सपा ने अपनी घोषणा पत्र में नकल विरोधी कानून को वापस लेने की बात कही थी. सरकार बनने पर इसे वापस भी ले लिया था. नकल को आधिकारिक बनाया था.
आलम ये था कि सपा राज में बोर्ड परीक्षाओं में सीढ़ियां लगाकर नकल होती थी. परीक्षा में पास कराने के नाम पर ठेके लिए जाते थे. सरकार ऐसे लोगों पर कोई एक्शन नहीं लेती थी बल्कि मंचों से प्रोत्साहित करती थी. इसलिए इनके हौसले बुलंद होते थे. इसका असर भर्ती परीक्षाओं तक था. तब बिना पैसा और कनेक्शन के कोई परीक्षा नहीं होती थी. पूरा सिंडिकेट चलता था. परीक्षा में पास कराने के नाम पर पूरा तंत्र काम करता था.
अखिलेश यादव के नकल को लेकर दिए गए पुराने बयान भी आज की बहस में चर्चा का विषय बनते हैं. तब अखिलेश यादव ने कहा था कि नकल करना कोई गंभीर बात नहीं है. सब नकल करते हैं. सोचिए अगर किसी पार्टी का मुखिया इस तरह का विचार रखता हो तो फिर सवाल उठना लाजिमी है.
यहीं से अखिलेश की मौजूदा राजनीति पर भी सवाल उठता है. जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के दौरान उनकी सक्रियता दिखाई दी. लेकिन झारखंड में पेपर लीक और छात्रों के प्रदर्शन जैसे मुद्दों पर वैसी ही राजनीतिक सक्रियता क्यों नहीं दिखाई दी?
अगर लड़ाई वास्तव में छात्रों के भविष्य और परीक्षा व्यवस्था की है, तो उसका पैमाना हर राज्य और हर सरकार के लिए एक जैसा होना चाहिए. राजनीतिक सुविधा के हिसाब से किसी मुद्दे पर मुखर होना और दूसरे मामले में चुप रहना उस आंदोलन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है.
अखिलेश यादव की CJP नेताओं से बंद कमरे में मुलाकात भी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी. सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि सीजेपी खुद को राजनीति से अलग मानता है. लेकिन चुनाव से ठीक पहले अखिलेश से मुलाकात ने सवाल खड़े किए. क्योंकि यही सीजेपी विपक्षी राज्यों में सक्रिय नहीं दिखती है.
उसपर आरोप भी लगते हैं कि सीजेपी के पीछे आप और अखिलेश यादव जैसे नेता हैं. युवाओं की ऊर्जा को आंदोलन के नाम पर इस्तेमाल करके राजनीतिक अराजकता का माहौल बनाना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल खड़ा करता है.
अखिलेश यादव विपक्ष में हैं और सरकार से सवाल पूछना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है. लेकिन राजनीति में सवाल एकतरफा नहीं चलते. जो नेता आज जवाब मांग रहा है, उसे अपने कार्यकाल के सवालों का जवाब देने के लिए भी तैयार रहना होगा. पेपर लीक, भर्ती विवाद, नकल, शिक्षा व्यवस्था और छात्र आंदोलनों को लेकर सपा सरकार का रिकॉर्ड इसलिए चर्चा में आता है क्योंकि अखिलेश आज इन्हीं मुद्दों को अपनी राजनीति का हिस्सा बना रहे हैं.
युवाओं का भविष्य किसी राजनीतिक प्रयोग का मैदान नहीं हो सकता. अगर पेपर लीक के खिलाफ लड़ाई वास्तव में सिद्धांतों की है, तो उसके मानदंड सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए समान होने चाहिए. वरना सवाल यही रहेगा- क्या यह लड़ाई छात्रों के भविष्य की है, या छात्रों के मुद्दों के सहारे 2027 के लिए राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की?
डॉ. अभय पाण्डेय
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)
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