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लोकतंत्र के लिए जागरूक जनता ज़रूरी

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कस्बों-देगात में खस्ता हाल सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी अपने स्कूलों की अव्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ उठाने लगे हैं। उनमें स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों से सवाल पूछने की हिम्मत आ गई है। प्रसन्नता तो इस बात की है कि अब ऐसी चेतना प्राथमिक पाठशालाओं के बच्चों तक में पैदा हो गई है। … राजस्थान के एक माध्यमिक विद्यालय की छात्राओं ने तो विद्यालय के गेट पर ताला ही डाल दिया और धरने पर बैठ गईं। उनका कहना था कि जबतक उनकी मांगे पूरी नहीं हो जाती , स्कूल का ताला नहीं खुलेगा। जब से 'जेन-ज़ी' ने जंतर मंतर पर नीट पेपर लीक के खिलाफ सफल धरने का आयोजन किया है, तब से पूरे देश के विद्यार्थियों में अभूतपूर्व नवचेतना का उदय हुआ है। आज देश भर के ग्रामीण अंचलों के खस्ता हाल सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी अपने स्कूलों की अव्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ उठाने लगे हैं। उनमें स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों से सवाल पूछने की हिम्मत आ गई है। प्रसन्नता तो इस बात की है कि अब ऐसी चेतना प्राथमिक पाठशालाओं के बच्चों तक में पैदा हो गई है। वे अपने स्कूल की जरजर या नदारद इमारत, शौचालयों का अभाव, शिक्षकों की संख्या में भारी कमी, स्कूल से मिलने वाले भोजन की खराब क्वालिटी, स्कूल तक पहुँचने वाले मार्गों की दुर्दशा, जैसे गंभीर मुद्दों पर खुलकर और संगठित होकर सवाल पूछने लगे हैं। राजस्थान के एक माध्यमिक विद्यालय की छात्राओं ने तो विद्यालय के गेट पर ताला ही डाल दिया और धरने पर बैठ गईं। उनका कहना था कि जबतक उनकी मांगे पूरी नहीं हो जाती, स्कूल का ताला नहीं खुलेगा। देश भर में पनप रही इस नई प्रवृत्ति से प्रशासन और सत्तारूढ़ दल हक्के-बक्के हो गए हैं। उन्हें जवाब देते नहीं बन रहा। सोशल मीडिया पर ऐसे दर्जनों वीडियो रोज़ वायरल हो रहे हैं जिनमें ये घटनाक्रम प्रमुखता से दिखाए जा रहे हैं। सबसे रोचक बात यह है कि इस तरह विरोध के स्वर उठाने वाले छात्र किसी राजनैतिक दल के बहकावे में आ कर ये कदम नहीं उठा रहे। राजनैतिक दल और उनके कार्यकर्ता तो ख़ुद इस नई परिस्थिति से बेचैन हैं। क्योंकि आजतक जनता और शासन के बीच बिचौलिये की उनकी आत्मघोषित भूमिका अब निरर्थक होती जा रही है। यही हाल मीडिया का भी है। जो मीडिया सरकारों की चाटुकारिता या उनका प्रचारक बन कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर रहा था वो अचानक यह महसूस कर रहा है कि आम जनता की दृष्टि में अब उनकी कोई अहमियत नहीं बची। एक और रोचक तथ्य यह है कि ऐसी जागृति केवल भाजपा शासित राज्यों में आई हो, ये बात नहीं है। जिन राज्यों में कांग्रेस या अन्य दलों की सरकारें हैं वहाँ के छात्र भी शिक्षा व्यवस्था की खामियों को लेकर अब मुखर हो गए हैं। कुछ पत्रकार तो हमेशा ही अपना कर्तव्य निष्ठा से निभाते आए हैं। इस माहौल से उत्साहित हो कर जब उन्होंने कुछ राज्यों में विद्यालयों की दुर्दशा पर रिपोर्टिंग की तो उससे घबराकर वहाँ के मुख्यमंत्रियों ने ऐसे पत्रकारों के विरुद्ध पुलिस की दंडात्मक कार्यवाही शुरू करवा दी। मज़े की बात यह है कि ऐसा करने वालों में वो मुख्यमंत्री भी हैं जो दिन-रात सैंकड़ों करोड़ रुपया अपने प्रचार-प्रसार पर खर्च करके अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटते हैं। दरअसल ऐसे मुख्यमंत्री, चाहे किसी भी दल के क्यों न हों, इस मुग़ालते में थे कि उनका आक्रामक प्रचार, उनके शासन की कमज़ोरियों को ढक लेगा। जब मीडिया ही मैनेज हो गया तो उनकी सरकारों की कमज़ोरियाँ आम जनता तक कौन पहुँचाएगा? लेकिन अब पासा पलट गया। मीडिया तो मैनेज हो गया, लेकिन टेक्नोलॉजी का फ़ायदा उठा कर अब हर छात्र एक रिपोर्टर बन चुका है। वो एक स्मार्ट फ़ोन से ज़मीनी हक़ीक़त दिखाकर, सरकार के झूठे दावों की पोल खोल रहा है। ये तो एक तरह का ऐसा सैलाब है जिसे काबू कर पाना अब किसी भी दल की सरकार के लिए नामुमकिन होगा। दो-चार पत्रकारों पर तो दंडात्मक कार्यवाही की जा सकती है लेकिन जब विद्यालयों के सैंकड़ों छात्र हकीकत बयान करने लगें तो उन पर दंडात्मक कार्यवाही नहीं की जा सकती। अगर किसी मूर्ख नेता ने अहंकारवश ऐसा करने का दुस्साहस किया तो वो वोट बैंक को खो देगा। क्योंकि बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य को लेकर हर माता-पिता चिंतित रहता है। जब वो देखेंगे कि उनके बच्चों को स्कूलों में बुनियादी सुविधा मिलना तो दूर उल्टा उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने पर पुलिस की दंडात्मक कार्यवाही को झेलना पड़ रहा है तो उनका पारा भी सातवें आसमान पर चढ़ेगा। ऐसे हालातों को क़ाबू कर पाना किसी भी मंत्री या सरकार के लिए असंभव होगा। ये तो एक शुरुआत है, जो लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए बहुत ज़रूरी है। लेकिन इसका दायरा अब और बढ़ना चाहिए। हर आम नागरिक को अपने परिवेश पर कड़ी नज़र रखनी चाहिए। अगर उनके घर के सामने सड़क टूटी पड़ी है या उसमें पानी भर रहा है, या उनके इर्दगिर्द कूड़े के अम्बार लगे हैं तो उन्हें उसकी फ़ोटो खींच कर फ़ौरन सोशल मीडिया पर वायरल कर देना चाहिए। जिससे स्थानीय प्रशासन हरकत में आए और जनता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करे। जब हर नागरिक ऐसा करना शुरू कर देगा तो भ्रष्ट अधिकारियों या राजनेताओं पर भारी दबाव पड़ेगा। उन्हें मजबूरन जनता की परेशानियों का निदान करना होगा। जब एक ही इलाक़े के दर्जनों या सैंकड़ों लोग एक सी समस्याओं का खुलासा करेंगे तो फिर उन सबका सामूहिक दमन करना किसी भी प्रांतीय सरकार या स्थानीय निकायों को करना मुश्किल होगा। इससे अपना लोकतंत्र मजबूत बनेगा और नेताओं और अधिकारियों में ज़िम्मेदारियों की भावना विकसित होगी। जो आज़ादी मिलने के दो दशक बाद से ही लुप्त होना शुरू हो गई थी। आज तो हालत ये हो गई है कि जो नेता या अफसर जितना ज़्यादा भ्रष्ट होता है वो उतनी ही दबंगई दिखाता है। उसे अभी तक ये गलतफहमी है कि उससे कोई सवाल नहीं कर सकता। जो राजनेता, मुख्यमंत्री, मंत्री, सच्चे और ईमानदार हैं और यह चाहते हैं कि विकास कार्यों के लिए आवंटित धन का सदुपयोग हो वो जनता की इस पहल का स्वागत करेंगे, क्योंकि ऐसा करने से उन्हें अपने प्रांत के बारे में ज़मीनी हकीकत बिना किसी लाग-लपेट के नियमित मिलने लगेगी। ऐसे में वे अपने प्रशासन को कड़े निर्देश देकर जनता की समस्याओं का हल करवा पाएंगे। Tags : Democracy Published Sep 7, 2026 Categorized as Columnist Tagged Democracy By विनीत नारायण वरिष्ठ पत्रकार और समाजसेवी। जनसत्ता में रिपोर्टिंग अनुभव के बाद संस्थापक-संपादक, कालचक्र न्यूज। न्यूज चैनलों पूर्व वीडियों पत्रकारिता में विनीत नारायण की भ्रष्टाचार विरोधी पत्रकारिता में वह हवाला कांड उद्घाटित हुआ जिसकी संसद से सुप्रीम कोर्ट सभी तरफ चर्चा हुई। नया इंडिया में नियमित लेखन। साथ ही ब्रज फाउंडेशन से ब्रज क्षेत्र के संरक्षण-संवर्द्धन के विभिन्न समाज सेवी कार्यक्रमों को चलाते हुए। के संरक्षक करता हैं। View all of विनीत नारायण's posts. 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