Opinion: फिर विवादित बयान, फिर राजकुमार भाटी... अखिलेश यादव की चुप्पी सपा नेताओं को क्यों बना रही बेलगाम
राजकुमार भाटी ने कुछ दिन पहले ही ब्राह्मणों को लेकर अभद्र टिप्पणी की थी. ब्राह्मणों की तुलना उन्होंने वेश्या से की थी. इसके बाद विरोध भी हुआ, लेकिन अखिलेश यादव चुप रहे. इसके बाद भाटी ने गुर्जर महिलाओं को लेकर अभद्र टिप्पणी की, लेकिन तब भी अखिलेश चुप रहे.
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राजकुमार भाटी ने 2009 में सक्रिय राजनीति में आते हुए समाजवादी पार्टी की सदस्यता ली थी. (ANI)
अमिताभ सत्यम् | समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी का जाट समाज को लेकर दिया गया ताजा विवादित बयान एक बार फिर सपा की राजनीतिक भाषा उसके पार्टी कल्चर और उसके नेतृत्व की भूमिका पर सवाल खड़े करता है. यह पहला मौका नहीं है, जब भाटी की भाषा को लेकर विवाद हुआ हो. इससे पहले भी वह ब्राह्मणों को लेकर टिप्पणी और गुर्जर महिलाओं को लेकर दिए गए विवादित बयान के कारण सुर्खियों में रह चुके हैं. लेकिन, हर बार सबसे बड़ा सवाल भाटी के बयान से आगे जाकर अखिलेश यादव की चुप्पी पर खड़ा होता है.
किसी भी राजनीतिक दल में नेताओं की भाषा केवल उनकी निजी जिम्मेदारी नहीं होती.पार्टी का नेतृत्व यह तय करता है कि सार्वजनिक जीवन में किस तरह की भाषा स्वीकार्य है. किस तरह की भाषा पर कार्रवाई होगी. जब विवादित बयान देने वाले नेता को लगातार राजनीतिक संरक्षण मिलता है, तो मैसेज सिर्फ उस नेता तक नहीं जाता, बल्कि पूरी पार्टी तक जाता है.
यही वजह है कि राजकुमार भाटी का मामला सिर्फ एक नेता के बयान का मामला नहीं रह गया है. सवाल यह है कि अगर बार-बार विवादित बयान देने के बावजूद पार्टी नेतृत्व कार्रवाई नहीं करता, तो फिर पार्टी के नेताओं को मर्यादा में रहने की जरूरत क्यों महसूस होगी?
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पहले बयान, फिर विवाद और फिर भी कोई लगाम नहीं
भाटी के मामले में यही पैटर्न बार-बार दिखाई देता है. बयान सामने आता है, विवाद बढ़ता है, संबंधित समाज में नाराजगी होती है और फिर कुछ समय बाद मामला ठंडा पड़ जाता है. लेकिन, पार्टी नेतृत्व की ओर से ऐसी स्पष्ट कार्रवाई दिखाई नहीं देती जो भविष्य के लिए कोई संदेश दे.
जब नेतृत्व की तरफ से लगाम नहीं होती, तो बेलगाम भाषा धीरे-धीरे राजनीतिक शैली बन जाती है. राजनीति में शब्द हथियार जरूर हो सकते हैं, लेकिन जब वही हथियार समाजों और समुदायों के सम्मान पर चोट करने लगें, तो नेतृत्व की जिम्मेदारी शुरू होती है.
पहले ब्राह्मण फिर गुर्जर, लेकिन अखिलेश से मिली तारीफ
राजकुमार भाटी ने कुछ दिन पहले ही ब्राह्मणों को लेकर अभद्र टिप्पणी की थी. ब्राह्मणों की तुलना उन्होंने वेश्या से की थी. इसके बाद विरोध भी हुआ, लेकिन अखिलेश यादव चुप रहे. इसके बाद भाटी ने गुर्जर महिलाओं को लेकर अभद्र टिप्पणी की, लेकिन तब भी अखिलेश चुप रहे. उन्होंने भाटी पर एक्शन लेने के बजाय लखनऊ बुलाकर भाटी की पीठ थपथपाई.
जाट समाज को लेकर लगातार बयान क्यों?
इस पूरे घटनाक्रम का एक और पहलू है. जाट समाज को लेकर समाजवादी पार्टी के नेताओं की ओर से लगातार बयान सामने आ रहे हैं. पहले अखिलेश यादव, फिर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और अब राजकुमार भाटी. ऐसे में इसे महज अलग-अलग नेताओं की व्यक्तिगत टिप्पणियां कहकर नजरअंदाज करना मुश्किल है.
राजनीतिक दलों की पहचान केवल उनके घोषणापत्र से नहीं बनती. उनकी पहचान इस बात से भी बनती है कि वे समाज के अलग-अलग वर्गों के प्रति किस भाषा और किस राजनीतिक रवैये का इस्तेमाल करते हैं.
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अखिलेश की चुप्पी ही सबसे बड़ा सवाल
अखिलेश यादव विपक्ष के बड़े नेता हैं और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी. इसलिए उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि अपनी पार्टी की राजनीतिक भाषा और मर्यादा तय करने की भी है.
अगर किसी नेता के बार-बार विवादित बयानों के बावजूद नेतृत्व चुप रहता है, तो यह चुप्पी धीरे-धीरे मौन समर्थन जैसी दिखाई देने लगती है. फिर सवाल उठता है कि क्या सपा में नेताओं के लिए कोई राजनीतिक अनुशासन बचा है?
अखिलेश यादव को तय करना होगा कि समाज को जोड़ने वाली राजनीति करनी है या ऐसी बयानबाजी को जगह देनी है जो समाजों के बीच दूरी बढ़ाती है, क्योंकि बेलगाम बयान देने वाला नेता अकेला जिम्मेदार नहीं होता; उसे बेलगाम छोड़ देने वाला नेतृत्व भी सवालों के घेरे में आता है. यही सवाल आज राजकुमार भाटी से ज्यादा अखिलेश यादव से पूछा जाना चाहिए.
(डिस्क्लेमर: IIT कानपुर के पूर्व छात्र अमिताभ सत्यम ने अमेरिका के Fisher Collge of Business से MBA की शिक्षा हासिल की है. अमेरिका में Shearson Lehman Brothers और CableVision में काम किया. भारत में IBM, Reliance, SAP और Siemens में उच्च पदों पर अपनी सेवाएं दी हैं.)
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