हाल ही में हमने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर साइन करते देखा. यह समझौता कहता है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों देशों पर हमला माना जाएगा. हालांकि, यह समझौता नया है, लेकिन इस नए गठजोड़ का ऐतिहासिक आधार पहले से मौजूद है.
तुर्की और पाकिस्तान दोनों सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (CENTO) के सदस्य थे, जो 1955 के बगदाद पैक्ट के बाद बना था. CENTO ने तुर्की, पाकिस्तान, ईरान, इराक और यूनाइटेड किंगडम को एक रणनीतिक सुरक्षा घेरे में जोड़ा था, जो मिडिल ईस्ट से लेकर दक्षिण एशिया तक फैला हुआ था. इसलिए, मक्का समझौता उसी जानी-पहचानी भू-राजनीतिक स्थिति को फिर से सामने लाता है, लेकिन एक बड़े अंतर के साथ. CENTO पश्चिमी देशों की अगुवाई वाले शीत युद्ध के सुरक्षा ढांचे का हिस्सा था, जबकि मक्का समझौता क्षेत्रीय स्तर पर बनाया जा रहा है. इस लिहाज से यह समझौता फिर से बनाया गया CENTO नहीं है, लेकिन इसकी रणनीतिक सोच वही है, भले ही भू-राजनीतिक परिस्थितियां अलग हों.
भौगोलिक रूप से देखें तो मक्का समझौता वही रणनीतिक भूगोल बनाता है जो CENTO ने बनाया था. तुर्की पश्चिमी सैन्य आधार बनता है, जिसके पास NATO की दूसरी सबसे बड़ी स्थायी सेना और मजबूत घरेलू रक्षा उद्योग है. सऊदी अरब अपनी आर्थिक और राजनीतिक ताकत के साथ खाड़ी क्षेत्र का केंद्र बनता है, जबकि पाकिस्तान पूर्वी मोर्चा बनाता है और उसके पास मुस्लिम दुनिया का एकमात्र परमाणु हथियारों का जखीरा है. तीनों देशों के पास मिलाकर करीब 14 लाख सक्रिय सैन्यकर्मी, हजारों विमान और टैंक और सैकड़ों नौसैनिक संसाधन हैं. इससे पहले किसी भी खाड़ी-दक्षिण एशिया समझौते में इतनी बड़ी सैन्य ताकत एक साथ नहीं आई है.
पहले पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच 2025 में हुए समझौते जैसे द्विपक्षीय समझौते ज्यादा दोस्ती वाले समझौतों की तरह थे. लेकिन मक्का समझौता साफ तौर पर तीन देशों के बीच है और यह किसी प्रतीकात्मक दोस्ती समझौते के बजाय आपसी रक्षा संधि जैसा है. खास बात यह है कि समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देशों ने इसे 'किसी भी भाईचारे वाले देश के लिए खुला बताया है जो इसमें शामिल होना चाहता है'. यही खुला रास्ता इसे सिर्फ एक क्षेत्रीय समझौते से आगे ले जाता है और इसका असर ज्यादा बड़ा हो सकता है, खासकर तब जब बांग्लादेश ने इसमें शामिल होने में दिलचस्पी दिखाई है.
और यही बात इसे भारत के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण बनाती है, यानी इस गठजोड़ के और पूर्व की ओर फैलने की संभावना. अगर बांग्लादेश आखिरकार इसमें शामिल हो जाता है, तो यह रणनीतिक दायरा पाकिस्तान पर खत्म नहीं होगा, बल्कि बंगाल की खाड़ी और भारत के पूर्वी पड़ोस तक पहुंच सकता है. हालांकि, समझौते में जानबूझकर किसी दुश्मन का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन इसे सिर्फ मासूम अस्पष्टता नहीं समझना चाहिए. बल्कि यह समझना चाहिए कि तीनों देशों के सामने अलग-अलग खतरे हैं. उदाहरण के लिए, सऊदी अरब ईरान को लेकर अभी भी काफी चिंतित है, जबकि तुर्की के इजरायल के साथ रिश्ते लगातार टकराव वाले होते जा रहे हैं और उसकी महत्वाकांक्षा उसके आसपास के इलाकों से भी आगे जाती है. इसका उदाहरण अंकारा की एशिया अगेन पहल है, जिसे एशिया में तुर्की की राजनीतिक, आर्थिक और रक्षा भागीदारी बढ़ाने के लिए शुरू किया गया था. और सबसे साफ तौर पर, पाकिस्तान अभी भी खुद को भारत के खिलाफ खड़ा करता है.
इस संदर्भ में, भारत के लिए इस समझौते का असर तब तेजी से बदल गया जब बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने कहा कि ढाका बांग्लादेश की 'बांग्लादेश फर्स्ट' नीति के तहत सऊदी-पाकिस्तान-तुर्की रक्षा ढांचे में शामिल होने के लिए तैयार है. रिपोर्टों के मुताबिक, इसके बाद सऊदी अरब ने अनौपचारिक तौर पर बांग्लादेश को मक्का समझौते में शामिल होने का न्योता दिया. बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने कहा, 'अगर वे बांग्लादेश को समझौते में शामिल करने की इच्छा जाहिर करते हैं, तो हम निश्चित तौर पर इस पर सकारात्मक तरीके से विचार करेंगे'.
यहां चिंता मुख्य रूप से पारंपरिक सैन्य खतरे को लेकर नहीं है. 1971 का सबक अभी भी कायम है, जब पाकिस्तान उस समय के पूर्वी पाकिस्तान में भारत के बीच होने की वजह से सैन्य अभियान जारी नहीं रख सका था. दूसरी तरफ, असली चिंता ज्यादा बारीक पहलुओं में है. शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से बांग्लादेश और पाकिस्तान के रिश्तों में सुरक्षा के स्तर पर बड़ा बदलाव आया है. इस बढ़ते रिश्ते का एक पहला बड़ा संकेत तब मिला जब ढाका ने पहले पाकिस्तानी सामान की सभी खेपों की अनिवार्य फिजिकल जांच हटा दी, जिससे दोनों देशों के बीच सामान की आवाजाही काफी आसान हो गई. पाकिस्तान की ISI और बांग्लादेश की DGFI के बीच सीधे संपर्क भी फिर से शुरू हो गए हैं. इसके साथ ही बड़े स्तर पर सैन्य संपर्क, ट्रेनिंग में सहयोग और संयुक्त सैन्य अभ्यास में भागीदारी भी बढ़ी है. हथियारों की प्रणालियों, ड्रोन और रडार के मामले में बांग्लादेश का सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि तुर्की के साथ भी सहयोग दिखाता है कि दोनों के बीच संस्थागत स्तर पर नजदीकी बढ़ी है. यह भारत और बांग्लादेश के पहले से तनावपूर्ण रिश्तों के ऊपर एक और परत जोड़ती है.
इस राजनीतिक रूप से तनावपूर्ण माहौल में, अगर बांग्लादेश औपचारिक तौर पर मक्का ढांचे में शामिल होता है, तो भारत के सामने स्वाभाविक रूप से ऐसी स्थिति होगी, जिसमें पाकिस्तान के साथ जुड़ा सुरक्षा ढांचा उसकी पूर्वी सीमाओं पर मौजूद होगा. नई दिल्ली दशकों से ऐसी स्थिति से बचती आई है.
हालांकि, मक्का समझौता शायद पाकिस्तान के लिए उतना बड़ा फायदा नहीं हो, जितना वह सोच रहा है. पाकिस्तान को इसमें प्रतिष्ठा, तुर्की के साथ संभावित हथियार सौदों और मिडिल ईस्ट के सुरक्षा ढांचे में अपनी मजबूत आवाज की उम्मीद दिख रही है. लेकिन संयुक्त रक्षा वाला प्रावधान यह भी कहता है कि अगर सऊदी अरब या तुर्की पर हमला होता है, तो पाकिस्तान से खुफिया जानकारी, लॉजिस्टिक्स, गोला-बारूद या यहां तक कि सैन्य बल देने की उम्मीद की जा सकती है. इससे पाकिस्तान के सामने ऐसे मोर्चे खुल जाएंगे, जिन्हें उसने अब तक अपनी सुरक्षा रणनीति में शामिल नहीं किया है. इनमें ईरान या ईरान समर्थित समूहों से जुड़ा टकराव, यमन में हूती विद्रोहियों के साथ फिर से संघर्ष या सीरिया और पूरे मिडिल ईस्ट में तुर्की के सुरक्षा हितों से पैदा होने वाला संकट शामिल है.
पाकिस्तान के लिए समस्या रणनीतिक क्षमता से ज्यादा फैल जाने की होगी, क्योंकि उसकी सेना पहले से ही काफी हद तक भारत पर केंद्रित है और साथ ही उसे अपनी पश्चिमी सीमा पर अस्थिरता और आतंकवाद से भी निपटना पड़ रहा है. इसके अलावा, सऊदी अरब और तुर्की अब पाकिस्तान से, खासकर उसकी बड़ी सैन्य ताकत और परमाणु शक्ति की वजह से, किसी संकट में सिर्फ प्रतीकात्मक समर्थन से ज्यादा योगदान की उम्मीद कर सकते हैं. जिस समझौते से पाकिस्तान अपनी रणनीतिक ताकत बढ़ने की उम्मीद कर रहा है, वही वास्तव में उसकी ताकत को कम कर सकता है. इसके अलावा, इस समझौते से पाकिस्तान को वह एक चीज मिलने की संभावना कम है, जिसे उसकी सुरक्षा व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से सबसे ज्यादा चाहती रही है. भारत के साथ टकराव की स्थिति में किसी बाहरी ताकत का समर्थन.
फिलहाल, मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर काम चल रहा है. इसके असली असर और इसके अंदर की जिम्मेदारियों की अभी तक कोई परीक्षा नहीं हुई है. लेकिन भारत को इसके दायरे, नए सदस्यों को शामिल होने के न्योते और बांग्लादेश वाले फैक्टर के मेल को लेकर सतर्क रहना होगा. क्योंकि अगर बांग्लादेश इसमें शामिल होता है, तो पूर्वी भूमध्यसागर से शुरू होने वाला यह गठजोड़ खाड़ी और पाकिस्तान से होते हुए बंगाल की खाड़ी तक फैल जाएगा. ऐसे में भारत को अब सिर्फ इस्लामाबाद पर नहीं, बल्कि रियाद, अंकारा और ढाका पर भी एक साथ नजर रखनी होगी, बजाय इसके कि इन्हें अलग-अलग रणनीतिक मोर्चों के रूप में देखा जाए. यही भूगोल इस समझौते की कमजोरी बन सकता है.
CENTO ने दिखाया था कि अलग-अलग दुश्मनों, प्राथमिकताओं और खतरों को समझने वाले देशों को एक साझा सुरक्षा छतरी के नीचे रखने से अपने आप रणनीतिक एकजुटता नहीं आ जाती. इसलिए पाकिस्तान के लिए बांग्लादेश का शामिल होना भारत के चारों ओर एक असाधारण रणनीतिक दायरा पूरा करने जैसा लग सकता है, लेकिन संभावना यह भी है कि इससे सैन्य जिम्मेदारियों का ऐसा दायरा बढ़ जाए, जिसे इस्लामाबाद के लिए आगे चलकर पूरा करना मुश्किल हो सकता है.
रामी निरंजन देसाई, इंडिया फ़ाउंडेशन, नई दिल्ली में डिस्टिंग्विश्ड फ़ेलो हैं. वह @ramindesai पर ट्वीट करती हैं. विचार निजी हैं.
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