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न्यूयॉर्क में मोहन भागवत के 'सर्वधर्म समभाव' पर भारत में 'अख़लाक' का साया! अरुण कुमार त्रिपाठी का विश्लेषण 'Akhlaq' ka Aina: Arun Kumar Tripathi's Critical Take on Mohan Bhagwat's 'Sarvdharm Sambhav'

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दयाशंकर मिश्र की पुस्तक 'अख़लाक' के जरिए मॉब लिंचिंग और मोहन भागवत के 'सर्वधर्म समभाव' के दावों की पड़ताल करता लेखक अरुण कुमार त्रिपाठी का विश्लेषण। अपने मित्र लेखक पत्रकार और मीडिया आलोचक दयाशंकर मिश्र की किताब 'अख़लाक' का हम श्लेष अलंकार में प्रयोग करना चाहते हैं। अख़लाक का एक अर्थ होता है सदाचार, शिष्टाचार, नैतिकता और अच्छा आचरण। अख़लाक का दूसरा संदर्भ है राजधानी दिल्ली से सटे दादरी के बिसाहड़ा गांव में गोमांस रखने के आरोप में 28 सितंबर 2015 को 'मॉब लिंचिंग' के शिकार हुए अख़लाक का। सदाचार, नैतिकता और अच्छे आचरण का संदर्भ भारत की उस संस्कृति के लिए लिया जा सकता है जिसे उदात्त बताया जाता है और जिसके बारे में 'एकत्व का समारोह' करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत अमेरिका, कनाडा और ग्रेट ब्रिटेन की धरती पर अपने उद्बोधन कर रहे हैं। जिस संस्कृति का गुणगान करते हुए वे कहते हैं कि जो ऐसा कहता है कि भारत में मुसलमान नहीं रह सकते वह हिन्दू है ही नहीं। भारत की संस्कृति तो मूल रूप से बहुलता का सम्मान करने वाली है। क्योंकि यहाँ विविधता में एकता है। हालाँकि उनकी इस बात पर परदेश में सभी यकीन नहीं करते और न्यूयॉर्क व लंदन में कार्यक्रम रद्द करने की मांग करने से लेकर सभास्थल पर विरोध जताने पहुंच जाते हैं। अख़लाक का एक अर्थ वह भी है जिसे पाकिस्तानी शायर कतील शिफाई कुछ इस तरह से स्पष्ट करते हैः— हम हैं अख़लाक के बाज़ार में बिकने वाले, कीमतें देखकर खरीदार पलट जाते हैं। अगर भारतीय संस्कृति अख़लाक के अच्छे अर्थ वाली रही होती तो उसका समारोह मनाने के लिए दुनिया भर में घूमने की जरूरत न पड़ती, बल्कि दुनिया खुद ही उसे देखने यहां आती। अगर हम वैसे रहे होते तो शायद गुलाम भी न हुए होते। या अगर गुलाम न होते तो शायद हम वैसे न होते। मीडिया आलोचक दयाशंकर मिश्र की किताब 'अख़लाक' का हम श्लेष अलंकार में प्रयोग करना चाहते हैं। अख़लाक का एक अर्थ होता है सदाचार, शिष्टाचार, नैतिकता और अच्छा आचरण। अख़लाक का दूसरा संदर्भ है राजधानी दिल्ली से सटे दादरी के बिसाहड़ा गांव में गोमांस रखने के आरोप में 28 सितंबर 2015 को 'मॉब लिंचिंग' के शिकार हुए अख़लाक का। सदाचार, नैतिकता और अच्छे आचरण का संदर्भ भारत की उस संस्कृति के लिए लिया जा सकता है जिसे उदात्त बताया जाता है और जिसके बारे में 'एकत्व का समारोह' करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत अमेरिका, कनाडा और ग्रेट ब्रिटेन की धरती पर अपने उद्बोधन कर रहे हैं। जिस संस्कृति का गुणगान करते हुए वे कहते हैं कि जो ऐसा कहता है कि भारत में मुसलमान नहीं रह सकते वह हिन्दू है ही नहीं। भारत की संस्कृति तो मूल रूप से बहुलता का सम्मान करने वाली है। क्योंकि यहाँ विविधता में एकता है। हालाँकि उनकी इस बात पर परदेश में सभी यकीन नहीं करते और न्यूयॉर्क व लंदन में कार्यक्रम रद्द करने की मांग करने से लेकर सभास्थल पर विरोध जताने पहुंच जाते हैं। अख़लाक का एक अर्थ वह भी है जिसे पाकिस्तानी शायर कतील शिफाई कुछ इस तरह से स्पष्ट करते हैः— अख़लाक की परिघटना अब देशव्यापी! अख़लाक की यह परिघटना अलग अलग रूपों में अब देशव्यापी हो चुकी है। लेखक ने इस किताब में दस्तावेजीकरण के माध्यम से ऐसा ही प्रमाणित करने का प्रयास किया है। कहीं स्कूलों में बच्चों की पिटाई हो रही है, कहीं ट्रेनों में हमले हो रहे हैं कहीं शिवाजी और गणेश जी की प्रतिमा के आगे नाक रगड़वाई जा रही है तो कहीं 'जय श्रीराम' बुलवाने के लिए पीटा जा रहा है तो कहीं गरबा में आ जाने पर रस्सी से पेड़ से बांधकर पीटा जा रहा है तो कहीं गाड़ी से बांधकर खींचा जा रहा है तो कहीं बुलडोजर मस्जिद गिरा रहे हैं तो कहीं प्रधानमंत्री आवास की योजना के तहत बने घर तबाह कर रहे हैं। कहीं स्वतंत्र भारद्वाज जैसे नौजवान किसी का सिर फोड़कर अपने को कानून से ऊपर बता रहे हैं। वह दृश्य कुछ इस प्रकार है, ' अख़लाक के घर में जंग खाती सिटकनी से एक टूटा हुआ ताला अपनी मजबूती के भ्रम के साथ लटका हुआ है। घर की हिफ़ाज़त तालों से ज्यादा जालों के जिम्मे है। 28 सितंबर 2025 को दस साल बीत चुके हैं। घर अब खालीपन से बीरानगी की ओर बढ़ रहा है। दीवारों से झड़ गए प्लास्टर पर पीपल उग गए हैं। ...बिसाहड़ा में कोई बात करने को राज़ी नहीं है। सब कहते हैं पुरानी बात है। भूल जाओ। कोई किसी से कुछ कहता नहीं लेकिन फिर भी लगता है कि हर कोई दूसरे पर नज़र रख रहा है। ...बहुत कुरेदने पर घर के भीतर से एक बुजुर्ग महिला इतना ही बोली—गाय का मांस खाना कहां का धर्म है? लेकिन गाय का मांस मिला तो नहीं, और गाय का मांस था तो पुलिस क्यों नहीं बुलाई? किसी पर हमला करना ठीक है क्या? 'यह धर्म का मामला है। आस्था की बात है।' अचानक भीतर से एक रौबदार आवाज में यह कहते हुए उसकी बहू ने दरवाजा बंद कर लिया।' लेकिन अख़लाक हमारी संस्कृति का अपवाद नहीं एक परिघटना (फिनोमेना) बनता जा रहा है। इसीलिए दयाशंकर मिश्र ने उससे एक ऐसी राजनीतिक परिघटना का नामकरण किया है जो पिछले डेढ़ दो दशकों में हमारे लोकतंत्र, समाज और संस्कृति का आईना बनता गया है। हत्या के दस साल बाद अख़लाक के बिसाहड़ा गांव का दृश्य जम्हूरियत में यकीन करने वाले किसी भी व्यक्ति को भयावह लग सकता है। जिस अमेरिका में जाकर मोहन भागवत जी अपने संगठन के शताब्दी वर्ष में एकत्व का समारोह मना रहे हैं वहां यह प्रक्रिया अट्ठारहवीं, उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में चल रही थी। लिंचिंग किसी व्यक्ति की सार्वजनिक रूप से हत्या है जिसमें कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती। अमेरिका में लिंचिंग अमेरिका में ये हत्याएँ उस भीड़ द्वारा की जाती थीं जो कानून के राज को मानने को तैयार नहीं थी। यह हथियार दक्षिण अमेरिका में अश्वेतों को आतंकित, नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल होता था। अमेरिका में गृहयुद्ध (1861-1865) के पहले भी लिंचिंग होती थी और उस समय गुलामी के विरोधी जुआरी और घोड़ा चुराने वालों पर इस हथियार का प्रयोग होता था। गृह युद्ध के बाद पुनर्निर्माण काल में अश्वेत यानी काले अमेरिकियों के विरुद्ध इसका व्यापक प्रयोग हुआ। हालांकि सबसे पहले दक्षिण पश्चिम वर्जीनिया में 1780 में कर्नल चार्ल्स लिंच ने 75 कैदियों के साथ इस घटना को अंजाम दिया था। उन्हें काले अखरोट के पेड़ से बांधकार पीट पीट कर मार डाला गया। उन्हीं कर्नल लिंच के नाम से इस क्रूरता का नाम लिंचिंग या माब लिंचिंग पड़ा। 'पुस्तक में दर्ज देश भर के मामलों से एक पैटर्न उभरता है जिसे देखकर समझा जा सकता है कि लिचिंग न सिर्फ अपने आप में जघन्य है बल्कि किसी भी विविधता वाले देश पर सीधा हमला है।' ऐसा मशहूर फिल्मकार आनंद पटवर्धन का कहना है। संविधान को सबसे ज्यादा विचलित करने वाला दृश्य मॉब लिंचिंग है। नागरिकों के न्याय, बराबरी और बंधुता पर सबसे बड़े हमले हुए हैं। लेकिन ये हमले हर चुनावी विजय के बाद बढ़ जाते हैं और बढ़ जाते हैं तब भी जब कोई प्रतिरोध का स्वर ज्यादा तेजी से उभरता है। पश्चिम बंगाल में जादवपुर विश्वविद्यालय में संघ समर्थक संगठन 'दिमागी नक्सलों' पर सर्जिकल स्ट्राइक कर रहे हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री ने लाल किले से ऐसा करने का आह्वान किया है। वहां उन ईसाई घरों पर भी हमले हो रहे हैं जो अपने निजी स्थलों पर प्रार्थना आयोजित करते हैं। विपक्षी राजनेताओं पर हमले तो आम हो चले हैं। अमेरिका में ये हत्याएँ उस भीड़ द्वारा की जाती थीं जो कानून के राज को मानने को तैयार नहीं थी। यह हथियार दक्षिण अमेरिका में अश्वेतों को आतंकित, नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल होता था। अमेरिका में गृहयुद्ध (1861-1865) के पहले भी लिंचिंग होती थी और उस समय गुलामी के विरोधी जुआरी और घोड़ा चुराने वालों पर इस हथियार का प्रयोग होता था। गृह युद्ध के बाद पुनर्निर्माण काल में अश्वेत यानी काले अमेरिकियों के विरुद्ध इसका व्यापक प्रयोग हुआ। हालांकि सबसे पहले दक्षिण पश्चिम वर्जीनिया में 1780 में कर्नल चार्ल्स लिंच ने 75 कैदियों के साथ इस घटना को अंजाम दिया था। उन्हें काले अखरोट के पेड़ से बांधकार पीट पीट कर मार डाला गया। उन्हीं कर्नल लिंच के नाम से इस क्रूरता का नाम लिंचिंग या माब लिंचिंग पड़ा। हम जब भी कहीं सज संवर कर निकलते हैं कि किसी सभा और समारोह में अपनी सुंदर कहानियों को प्रस्तुत करेंगे और दुनिया से एक ऊर्जावान रिश्ता बनाने का आनंद लेंगे तब हम आईना देखकर निकलते हैं। ताकि लोग कहीं हमारे चेहरे पर आधी बनी हुई दाढ़ी या बिखरे हुए बाल या फिर कुर्ते या शर्ट पर पड़े हुए दाग देखकर हंसे नहीं। आज हमारी सभ्यता और संस्कृति को अख़लाक जैसी परिघटनाओं का विस्तार आईना दिखाता है। ऐसे आईने को देखकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति पहले अपनी साज सज्जा ठीक करेगा तब बाहर जाकर अपना प्रदर्शन करेगा। लेकिन हमारी सरकार और उसके पितृ संगठन के प्रमुख तो बिना आईना देखे ही बाहर जाकर प्रवचन दे आते हैं। और जब कोई आलोचना करता है तो घिसा पिटा जवाब तैयार रहता है कि बाहर के लोग और विपक्षी दल हमारी तरक्की देखकर जल जाते हैं। तरक्की जब निजी स्वार्थ और काम वासना से प्रेरित होती है तो उसका वही हाल होता है जैसा कि नारद मोह में हुआ था। नारद ने सुंदर राजकुमारी से विवाह के लिए विष्णु का रूप मांगा और विष्णु ने उन्हें बंदर का रूप दे दिया। भारत को अगर अपने समाज को तरक्की करने के लिए अमेरिका की लिंचिंग और कू क्लक्स क्लानन से ही प्रेरणा लेनी थी तो अपनी संस्कृति को महान बताने की क्या ज़रूरत थी। आजकल भारत में विऔपनिवेशीकरण का अध्ययन तेजी से हो रहा है। लेकिन कोई यह कहने को तैयार नहीं हो रहा है कि सांप्रदायिकता और मॉब लिंचिंग जैसी समस्या को पाल पोस कर बड़ा करने में औपनिवेशिक सत्ता का बड़ा योगदान है। वह सत्ता आप को समस्या में उलझी हुई देखना चाहती है पर यह नहीं चाहती कि आपकी समस्याएं उनके दरवाजे पर पहुंचें।
न्यूयॉर्क में मोहन भागवत के 'सर्वधर्म समभाव' पर भारत में 'अख़लाक' का साया! अरुण कुमार त्रिपाठी का विश्लेषण 'Akhlaq' ka Aina: Arun Kumar Tripathi's Critical Take on Mohan Bhagwat's 'Sarvdharm Sambhav'
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