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जयप र

Rising Gdp Alone Doesnt Brings Prosperity Depts Rate Is Important Too

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राष्ट्रीय राजधानी का आइटीओ। यहां से दीनदयाल मार्ग गुजरता है। जैसे ही शाम ढलती है और रात का अंधेरा छाने लगता है, सौ से अधिक लोग फुटपाथ को अपना बिस्तर बना लेते हैं। इसी दीनदयाल मार्ग पर देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के राष्ट्रीय मुख्यालय हैं। नीतियां बनाने वाले अधिकारी दिन-रात इस रास्ते से गुजरते हैं। एक ही सडक़ पर सत्ता, व्यवस्था और बेघर जिंदगी की ये तस्वीरें साथ-साथ दिखाई देती हैं। यह सिर्फ दिल्ली की एक सडक़ की तस्वीर नहीं है। यह उस सवाल की भी तस्वीर है, जो आज देश की अर्थव्यवस्था के बड़े आंकड़ों के बीच खड़ा है, क्या आर्थिक विकास का असर उस आदमी तक भी पहुंच रहा है, जो रात फुटपाथ पर गुजारने को मजबूर है?इसी बीच, भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक अच्छी खबर आई है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में देश की अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। पिछले साल इसी तिमाही में विकास दर 6.9 प्रतिशत थी। आंकड़ा मजबूत है और आर्थिक गतिविधियों में तेजी का संकेत देता है। लेकिन अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर केवल जीडीपी की दर से नहीं समझी जा सकती। इसी तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि 31 मार्च 2026 तक केंद्र सरकार की कुल देनदारियां बढक़र 201.17 लाख करोड़ रुपए हो गई हैं। एक साल पहले यह करीब 185.95 लाख करोड़ रुपए थीं। 2014-15 में केंद्र की कुल देनदारियां करीब 64.11 लाख करोड़ रुपए थीं, यानी एक दशक में यह रकम तीन गुना से भी अधिक हो गई।यहीं से असली सवाल पैदा होता है। देश की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है और सरकार का कर्ज भी बढ़ रहा है। क्या तेज विकास दर बढ़ते कर्ज की चिंता को खत्म कर देती है? शायद नहीं। कर्ज अपने आप में बुरा नहीं होता, लेकिन यह जरूर देखा जाना चाहिए कि कर्ज लेकर किया गया खर्च देश की अर्थव्यवस्था और लोगों की जिंदगी में कितना सुधार ला रहा है। आखिरकार आर्थिक विकास का अंतिम उद्देश्य केवल आंकड़ों को बड़ा करना नहीं, बल्कि लोगों के जीवन को बेहतर बनाना है।सबसे पहले 7.8 प्रतिशत की विकास दर को समझना जरूरी है। अप्रेल से जून 2026 के बीच वास्तविक जीडीपी में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में तेजी रही। वित्तीय सेवाओं, रियल एस्टेट, आइटी और प्रोफेशनल सर्विसेज में 12.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। मैन्युफैक्चरिंग में 9.2 प्रतिशत की वृद्धि रही। पूरे सर्विस सेक्टर की वृद्धि 10 प्रतिशत रही, जबकि व्यापार, होटल, परिवहन और संचार से जुड़े क्षेत्र 8.5 प्रतिशत बढ़े। घरेलू खपत में 7.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। निवेश और पूंजी निर्माण को दर्शाने वाला ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन भी 11.9 प्रतिशत बढ़ा। कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों की वृद्धि 3.6 प्रतिशत रही। ये आंकड़े अर्थव्यवस्था की गति जरूर बताते हैं, लेकिन इनसे यह पता नहीं चलता कि इस वृद्धि का फायदा समाज के किस हिस्से को कितना मिला। जीडीपी पूरे देश की आर्थिक गतिविधियों का आंकड़ा है। यह किसी परिवार की आमदनी, किसी मजदूर की मजदूरी या किसी युवा को मिली नौकरी का सीधा हिसाब नहीं देती। इसलिए 7.8 प्रतिशत की विकास दर अच्छी खबर जरूर है, लेकिन इसे आम आदमी की आर्थिक स्थिति का पूरा आईना मान लेना सही नहीं होगा।दूसरी तरफ, 201.17 लाख करोड़ रुपए की केंद्र सरकार की कुल देनदारियां भी गंभीर चर्चा का विषय हैं। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह भारत का कुल कर्ज नहीं है। यह केंद्र सरकार की कुल देनदारियां हैं। राज्यों का कर्ज इसमें शामिल नहीं है। इसलिए 201 लाख करोड़ रुपए को पूरे देश का कर्ज बताना गलत होगा। लेकिन इतनी बड़ी रकम और पिछले वर्षों में इसमें हुई तेज बढ़ोतरी को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। कर्ज को समझने के लिए उसकी तुलना अर्थव्यवस्था के आकार से की जाती है। केंद्र सरकार का डेब्ट टू जीडीपी रेश्यो वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 58.2 प्रतिशत रहा। केंद्र और राज्यों को मिलाकर सामान्य सरकारी कर्ज करीब 81 प्रतिशत के आसपास है। इसलिए केवल 201 लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा देखकर भारत को आर्थिक संकट में बताना सही नहीं होगा, लेकिन बढ़ते कर्ज को लेकर सवाल उठाना भी जरूरी है। खासकर तब, जब सरकार को हर साल पुराने कर्ज पर बड़ी रकम ब्याज के रूप में चुकानी पड़ रही हो।यहीं कर्ज का सबसे बड़ा दबाव सामने आता है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में केंद्र की नेट रेवेन्यू रिसिप्ट्स का करीब 36.8 प्रतिशत हिस्सा ब्याज भुगतान में चला गया। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार 2025-26 में केंद्र सरकार ने करीब 12.43 लाख करोड़ रुपए ब्याज के रूप में चुकाए। 2026-27 के बजट में ब्याज भुगतान के लिए करीब 14.04 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। यह रकम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि सरकार का बजट असीमित नहीं होता। पुराने कर्ज पर ब्याज चुकाने में जितना अधिक पैसा जाएगा, दूसरी प्राथमिकताओं के लिए उतनी ही गुंजाइश सीमित हो सकती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, ग्रामीण विकास और सार्वजनिक सुविधाओं पर खर्च के लिए उपलब्ध संसाधनों पर इसका असर पड़ सकता है। इसलिए सरकारी कर्ज केवल सरकारी खातों का मामला नहीं है। उसका संबंध भविष्य के बजट और अंतत: आम नागरिक से भी है।हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि सरकार का हर कर्ज सीधे जनता की जेब से निकलता है। सरकार की आय टैक्स और दूसरे स्रोतों से आती है और कर्ज का इस्तेमाल अलग-अलग कामों में होता है। लेकिन कर्ज पर ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी भविष्य के बजट पर रहती है। इसलिए असली सवाल यह होना चाहिए कि सरकार ने जितना कर्ज लिया, उससे कितनी उत्पादन क्षमता बढ़ी, कितने रोजगार पैदा हुए और लोगों की आमदनी में कितना सुधार हुआ।सरकारी कर्ज को सीधे महंगाई का कारण बताना भी सही नहीं होगा। महंगाई पर तेल की कीमत, खाद्य उत्पादन, मौसम, वैश्विक बाजार, मांग और सप्लाई जैसे कई कारण असर डालते हैं। इसी तरह सरकारी उधारी का यह अर्थ भी नहीं है कि बैंकों के पास आम आदमी को कर्ज देने के लिए पैसा खत्म हो गया। लेकिन बहुत अधिक सरकारी उधारी लंबे समय में ब्याज दरों और वित्तीय बाजार पर दबाव डाल सकती है। इसलिए कर्ज कितना है, इसके साथ यह भी देखना जरूरी है कि उसकी लागत कितनी है।भारत का बाहरी कर्ज भी बढ़ा है। मार्च 2026 के अंत में भारत का एक्सटर्नल डेब्ट 762.8 अरब डॉलर था, जो पिछले वर्ष की तुलना में 26.3 अरब डॉलर अधिक है। इसका जीडीपी से अनुपात 20.8 प्रतिशत रहा। लेकिन यहां भी एक जरूरी अंतर समझना होगा। 762.8 अरब डॉलर केवल केंद्र सरकार का विदेशी कर्ज नहीं है। इसमें सरकारी और गैर-सरकारी दोनों तरह का बाहरी कर्ज शामिल होता है। इसलिए इस पूरी रकम को सरकार का विदेशी कर्ज बताना गलत होगा। भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति को समझने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार, चालू खाते का घाटा, कर्ज की अवधि और कर्ज किस मुद्रा में है, इन सभी पहलुओं को साथ देखना पड़ता है।अब सवाल वापस उसी फुटपाथ पर लौटता है, जहां से बात शुरू हुई थी। 7.8 प्रतिशत की विकास दर का उस व्यक्ति के जीवन में क्या अर्थ है, जो रात सडक़ किनारे सोता है? यही वह सवाल है, जिसे आर्थिक आंकड़ों के बीच अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। क्या युवाओं को पर्याप्त और अच्छी नौकरियां मिल रही हैं? क्या छोटे दुकानदार और छोटे कारोबारी अपनी आमदनी में बढ़ोतरी महसूस कर रहे हैं? क्या किसान की वास्तविक आय बढ़ी है? क्या मजदूरी महंगाई की रफ्तार से आगे बढ़ रही है? क्या परिवार अपनी आमदनी में से पहले की तुलना में ज्यादा बचत कर पा रहे हैं? क्या महंगाई के बाद भी लोगों की खरीदने की क्षमता बढ़ी है? इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि विकास की वास्तविक पहुंच कितनी व्यापक है।केवल जीडीपी के आंकड़े से यह मान लेना कि अर्थव्यवस्था का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंच रहा है, जल्दबाजी होगी। दूसरी तरफ यह कहना भी सही नहीं होगा कि विकास का लाभ केवल कुछ लोगों को मिला है और बाकी पूरा समाज पीछे चला गया है। इसके लिए रोजगार, वास्तविक वेतन, खपत, बचत और आय के बंटवारे के आंकड़ों को साथ देखना होगा। आर्थिक विकास का असली मूल्यांकन तभी होगा, जब उसका असर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई दे।भारत आज किसी बड़े आर्थिक संकट की स्थिति में नहीं है। इसलिए 201.17 लाख करोड़ रुपए की देनदारियों को देखकर आर्थिक तबाही की भविष्यवाणी करना भी सही नहीं होगा। लेकिन लगातार बढ़ते कर्ज को सामान्य मानकर छोड़ देना भी समझदारी नहीं होगी। आर्थिक विकास और वित्तीय अनुशासन, दोनों को साथ लेकर चलना होगा। आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि विकास की रफ्तार बनी रहे, लेकिन कर्ज का बोझ बेकाबू न हो। सरकार के खर्च का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितना पैसा खर्च हुआ, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि उससे क्या हासिल हुआ। कितने रोजगार बने, उत्पादन कितना बढ़ा, लोगों की आय कितनी बढ़ी और सार्वजनिक सुविधाओं में कितना सुधार आया, इन सवालों के जवाब भी आर्थिक आंकड़ों का हिस्सा होने चाहिए। आखिरकार अर्थव्यवस्था केवल जीडीपी, लाखों करोड़ रुपए के बजट और विकास दर का नाम नहीं है। अर्थव्यवस्था उस परिवार का नाम भी है, जिसकी आमदनी नहीं बढ़ी, लेकिन खर्च बढ़ गया। उस युवा का नाम भी है, जिसे डिग्री तो मिली, लेकिन स्थायी रोजगार नहीं मिला। उस छोटे दुकानदार का नाम भी है, जिसकी बिक्री बढऩे के बजाय लागत बढ़ गई। उस किसान का नाम भी है, जिसकी फसल बढ़ी, लेकिन वास्तविक कमाई नहीं बढ़ी। और उस व्यक्ति का भी, जो देश की राजधानी में सत्ता के बड़े-बड़े दफ्तरों के बीच फुटपाथ को अपना बिस्तर बनाने को मजबूर है।इसलिए 7.8 प्रतिशत की विकास दर निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। 201.17 लाख करोड़ रुपए की सरकारी देनदारियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। दोनों आंकड़ों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने के बजाय यह देखना होगा कि आर्थिक विकास का लाभ कितनी दूर तक पहुंच रहा है और बढ़ते कर्ज का बोझ कितना टिकाऊ है। विकास की असली कसौटी यही है कि आंकड़े ऊपर जाएं तो लोगों की आमदनी भी ऊपर जाए, रोजगार बढ़े, बचत बढ़े और जीवन में आर्थिक सुरक्षा आए। आखिर आंकड़ों की चमक तभी सार्थक है, जब उसका उजाला उस फुटपाथ तक भी पहुंचे, जहां रात होने पर कोई अपना बिस्तर बिछाता है।
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