पंकज कुमार जाट की फेसबुक वाल से साभार
किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में विपक्ष की भूमिका 'फूफा जी' जैसी उपहासजनक शब्दावली या अपमान की नहीं, बल्कि सत्ता को निरंकुश होने से रोकने वाले एक मजबूत स्तंभ की होती है
वर्ष 1947 से 2014 के बीच लाल किले की प्राचीर से दिए गए 67 स्वतंत्रता दिवस भाषणों का ऐतिहासिक रिकॉर्ड इस बात का प्रमाण है कि तत्कालीन प्रधानमंत्रियों ने देश के सामने योजनाओं के शिलान्यास, नीतिगत दिशा और बजटीय रियायतों की रूपरेखा रखी।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने वर्ष 1947 से 1964 के बीच अपने 17 स्वतंत्रता दिवस संबोधनों में भाखड़ा नांगल (1948) और IIT/AIIMS (1951-1956) जैसी बुनियादी संस्थाओं की नींव रखी।
वर्ष 1952 के प्रथम चुनाव के बाद संसद में विपक्ष की सीटें मात्र 20-25% थीं, फिर भी नेहरू ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी, डॉ. बी.आर. अंबेडकर और राममनोहर लोहिया जैसे घोर विरोधी नेताओं को साथ बैठाया;
1962 में चीन युद्ध के समय अटल बिहारी वाजपेयी के पत्र पर 2 दिन का विशेष संसद सत्र बुलाकर 125 से अधिक सांसदों की तीखी आलोचना का सामना किया।
इसके बाद इंदिरा गांधी के 16 वर्षों के कार्यकाल (1966-1977, 1980-1984) में 1969 में 14 प्रमुख बैंकों का राष्ट्रीयकरण और 1971 के हरित क्रांति विजन के समय विपक्षी नेताओं के साथ 30 से अधिक औपचारिक सर्वदलीय बैठकें की गईं।
राजीव गांधी ने 1984-1989 के बीच पंचायती राज (64वां संविधान संशोधन 1989) और टेलीकॉम क्रांति के लिए लालकृष्ण आडवाणी और नाथूराम मिर्धा जैसे विपक्षी नेताओं से 12 से ज्यादा बार बंद कमरे में सलाह ली।
2004 से 2014 के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह ने 100 दिन का मनरेगा कानून (2005) और सूचना का अधिकार (RTI 2005) लागू करते समय संसद में विपक्ष की 40 से अधिक आपत्तियों और संशोधनों को स्वीकार किया। यह वह दौर था जब सत्ता विपक्ष को नीचा दिखाने के बजाय लोकतंत्र का आवश्यक अंग मानकर काम करती थी।
दूसरी ओर, 2024-2026 के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जन-संवाद और युवा आयोजनों का स्तर तीखे कटाक्षों और अमर्यादित भाषा तक सीमित हो चुका है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा युवाओं और Gen-Z के कार्यक्रमों में विपक्षी दलों को 'फूफा जी' और सवाल उठाने वाले आंदोलित छात्रों व पत्रकारों को 'दिमागी नक्सली' या 'आंदोलनजीवी' कहना लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार है।
जब देश में युवा रोजगार की मांग करते हैं, तो उन्हें नीतिगत जवाब के स्थान पर जुमले दिए जाते हैं।
गुजरात के केवड़िया में 31 अक्टूबर 2018 को 182 मीटर ऊंची 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' का उद्घाटन किया गया, जिसकी कुल निर्माण लागत ₹2,989 करोड़ रुपये (लगभग $400 मिलियन डॉलर) थी।
इस विशालकाय प्रतिमा के लिए 6 से अधिक गांवों की 1,200 एकड़ उपजाऊ आदिवासी कृषि भूमि का अधिग्रहण किया गया, जिससे 73 से अधिक स्थानीय परिवार विस्थापित हुए और नर्मदा नदी के डूब क्षेत्र में 10,000 से अधिक पेड़ काटे गए।
इसके रखरखाव और दैनिक संचालन पर गुजरात सरकार सालाना ₹25 से ₹35 करोड़ रुपये खर्च करती है, जबकि प्रतिवर्ष प्राप्त होने वाले टिकट राजस्व से यह लागत भी मुश्किल से निकल पाती है।
यदि ₹2,989 करोड़ रुपये की इस भारी-भरकम राशि का उपयोग बुनियादी ढांचे में किया जाता, तो देश में 5,000 बिस्तरों वाले 3 विश्वस्तरीय 'सरदार पटेल एम्स (AIIMS)' अस्पताल और 15 आधुनिक शोध संस्थान बनाए जा सकते थे।
स्वयं सरदार पटेल ने 1948 में गांधीजी की हत्या के बाद 4 फरवरी 1948 को संघ पर प्रतिबंध लगाते समय अपने ऐतिहासिक पत्र में स्पष्ट लिखा था कि देश को व्यक्तिगत मूर्तियों या आडंबर की नहीं, बल्कि संस्थागत ईमानदारी की जरूरत है।
इतना ही नहीं, 24 फरवरी 2021 को अहमदाबाद के ऐतिहासिक 'मोटेरा स्टेडियम' (जो 1982 से सरदार पटेल के नाम पर था) का नाम बदलकर रातों-रात 'नरेंद्र मोदी स्टेडियम' कर दिया गया, जो सरदार पटेल की विरासत के प्रति वर्तमान सत्ता के दिखावे और दोहरे चरित्र को उजागर करता है।
वर्तमान सरकार जिस यूनीफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) को केवल अपनी निजी उपलब्धि बताकर पेश करती है, उसका ढांचा वास्तव में 2008 में डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) की स्थापना के साथ शुरू हुआ था।
2012-2016 के भुगतान विज़न दस्तावेज के तहत ₹1,200 करोड़ रुपये के प्रारंभिक कोष से एनपीसीआई ने यूपीआई की तकनीक तैयार की थी, जिसे 11 अप्रैल 2016 को औपचारिक रूप से लॉन्च किया गया।
लेकिन प्रचार के इस होड़ में डिजिटल सुरक्षा को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। गृह मंत्रालय के नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की रिपोर्टों के अनुसार, भारत में वर्ष 2023-2024 में साइबर वित्तीय धोखाधड़ी के आंकड़े डरावने स्तर पर पहुंच गए हैं।
आज देश में रोजाना लगभग ₹206 करोड़ रुपये से अधिक का यूपीआई और डिजिटल वित्तीय फ्रॉड हो रहा है। हर महीने आम नागरिकों, बुजुर्गों और बेरोजगार युवाओं के खातों से औसतन ₹2,600 करोड़ रुपये का वित्तीय फ्रॉड हो रहा है।
2023 में दर्ज 15.5 लाख से अधिक साइबर शिकायतों में से 75% मामले अकेले यूपीआई और ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी से जुड़े थे। सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने के बजाय केवल प्रचार और इवेंट मैनेजमेंट में व्यस्त सरकार की नाकामी के कारण देश की गरीब जनता की गाढ़ी कमाई साइबर ठगों की जेब में जा रही है।
वर्तमान में देश की लोकतांत्रिक प्रणाली और अर्थव्यवस्था का ढांचा केवल 2-3 व्यक्तियों और उनके पसंदीदा कॉर्पोरेट मित्रों के हाथों की कठपुतली बन चुका है। गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जोड़ी तथा आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के इशारों पर देश की केंद्रीय एजेंसियां (ED, CBI, IT) काम कर रही हैं।
2014 से 2024 के बीच ईडी द्वारा दर्ज 5,297 मामलों में से 95% से अधिक मामले विपक्षी नेताओं के खिलाफ दर्ज किए गए, जबकि सत्ताधारी दल में शामिल होते ही 25 से अधिक नेताओं के खिलाफ जांच ठंडे बस्ते में डाल दी गई।
दूसरी ओर, देश की राष्ट्रीय संपत्तियों को कौड़ियों के भाव दो कॉर्पोरेट घरानों को सौंपा जा रहा है। हिंडनबर्ग रिपोर्ट और सार्वजनिक वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, 2014 से 2024 के बीच अडानी समूह की संपत्ति में 1,400% से अधिक की वृद्धि हुई।
देश के 8 प्रमुख हवाई अड्डे, 13 समुद्री बंदरगाह, 30% से अधिक बिजली उत्पादन और कोयला खदानों का नियंत्रण अकेले एक-दो उद्योगपतियों के पास केंद्रित कर दिया गया है।
जब छात्र 2019-2024 के दौरान RRB-NTPC और SSC परीक्षाओं के पेपर लीक होने पर सड़कों पर उतरते हैं, तो उन पर लाठियां बरसाई जाती हैं और उन्हें 'दिमागी नक्सली' कहा जाता है। 6 इंच का दावा करने वाली सत्ता अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए टीवी कैमरों के सामने आकर रोना-धोना और भावनात्मक कार्ड खेलना शुरू कर देती है।
यदि लोकतंत्र में निर्णय लेने की पूरी शक्ति केवल दो उद्योगपतियों और दो नेताओं के पास ही रखनी है, तो फिर चुनाव का ढोंग क्यों रचा जा रहा है?
आज भारत की जनता को यह समझना होगा कि जुमलों, विज्ञापनों और भावनात्मक भाषणों के पीछे देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने और वित्तीय सुरक्षा को भारी नुकसान पहुंचाया जा चुका है।
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