Opinion: छात्र आंदोलन से यूपी चुनाव तक, नए विपक्षी मोर्चे का संकेत देते सपा-आप और CJP
यूपी विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव की पार्टी, आम आदमी पार्टी (आप) और कॉकरोच पार्टी (CJP) की बढ़ती नजदीकी ने चर्चा तेज कर दी है. चलिए समझते हैं अखिलेश यादव की रणनीति के बारे में...
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जंतर-मंतर के प्रदर्शन के बाद, CJP की गतिविधियों ने इस सवाल को और गहरा कर दिया.
डॉ. विनम्र सेन सिंह । यूपी के 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी खेमे में कुछ नया पकता नजर आ रहा है. कांग्रेस से सीट बंटवारे को लेकर खींचतान के बीच अखिलेश यादव की पार्टी सपा आम आदमी पार्टी (आप) और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के साथ बढ़ती नजदीकी ने नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है. जंतर-मंतर के छात्र प्रदर्शन से शुरू हुई यह नजदीकी अब लखनऊ तक पहुंच गई. ऐसे में अब सवाल यह है कि क्या यूपी चुनाव के लिए सपा, आप और CJP किसी नए राजनीतिक समीकरण की जमीन तैयार कर रहे हैं?
जंतर-मंतर से लखनऊ तक बदलती तस्वीर
जंतर-मंतर के प्रदर्शन के बाद, CJP की गतिविधियों ने इस सवाल को और गहरा कर दिया. कॉकरोच पार्टी पहले यह दावा करती रही कि उसका मकसद छात्रों के मुद्दे उठाना है और वह किसी राजनीतिक दल से जुड़ी हुई नहीं है. लेकिन झारखंड में प्रदर्शन के दौरान उसके रवैये और फिर बीजेपी शासित राज्यों में लगातार मुद्दे उठाने के तरीके ने इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए. ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या छात्र मुद्दों का मंच अब धीरे-धीरे राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने का जरिया बन रहा है?
इसके बाद, CJP नेता आशुतोष राका की सपा प्रमुख अखिलेश यादव से लखनऊ में मुलाकात और फिर आप सांसद संजय सिंह की लखनऊ में यूपी चुनाव को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इस पूरी चर्चा को और हवा दे दी है. अब तस्वीर धीरे-धीरे साफ होती दिखाई दे रही है कि यूपी चुनाव के लिए CJP, आप और सपा के बीच एक संभावित गठजोड़ आकार ले रहा है. अगर ऐसा है, तो इसकी पटकथा शायद आज नहीं, काफी पहले से लिखी जा रही थी.
कांग्रेस से खींचतान के बीच सपा ने तैयार किया नया प्लान
सपा के लिए यह प्रयोग केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक राजनीतिक मजबूरी भी हो सकता है. सपा और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर तनातनी जारी है. कांग्रेस के नेता लगातार सपा पर निशाना साध रहे हैं और दोनों दलों के बीच अविश्वास कम होने के बजाय बढ़ता दिखाई दे रहा है. ऐसे में सपा के सामने AAP एक विकल्प के तौर पर नजर आती है. खासकर तब, जब छोटे सहयोगी दल भी इस समय सपा के साथ पूरी तरह सहज दिखाई नहीं दे रहे हैं.
आप नेता संजय सिंह भी पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश में लगातार सक्रिय दिखाई दे रहे हैं. अखिलेश यादव के साथ वह कई मौकों पर नजर आ चुके हैं. ऐसे में उनकी यूपी में बढ़ती सक्रियता को केवल सामान्य राजनीतिक गतिविधि मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है.
यहां एक और बात समझनी होगी. CJP पर यह आरोप पहले से लगते रहे हैं कि वह आम आदमी पार्टी की सहयोगी है. ऐसे में इस संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता कि सपा, आप और CJP लंबे समय से उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए किसी साझा राजनीतिक स्पेस की तलाश में जुटे हों.
यह कदम अखिलेश की पार्टी के लिए जोखिम से खाली नहीं
राजनीति में हर नया गठजोड़ अपने साथ अवसर ही नहीं, जोखिम भी लेकर आता है. सपा-आप-CJP का यह संभावित समीकरण कागज पर भले ही दिलचस्प दिखाई दे, लेकिन चुनावी मैदान में इसकी असली परीक्षा संगठन, वोट ट्रांसफर और सामाजिक स्वीकार्यता के स्तर पर होगी.
सवाल यह भी है कि CJP के छात्र आंदोलन के जरिए जुटाया गया समर्थन क्या चुनावी वोट में बदल पाएगा? क्या आप उत्तर प्रदेश में अपने सीमित संगठनात्मक आधार को वास्तविक चुनावी प्रभाव में बदल सकेगी? और सबसे महत्वपूर्ण क्या सपा अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार से बाहर इस नए प्रयोग के जरिए कोई अतिरिक्त वोट जोड़ पाएगी?
सबसे असहज स्थिति CJP के लिए हो सकती है. क्योंकि जिस संगठन ने खुद को छात्रों के मुद्दों तक सीमित रखने और किसी राजनीतिक दल से दूरी बनाए रखने की छवि के साथ आगे बढ़ाया था, उसकी राजनीतिक मंशा अब सवालों के घेरे में आती दिखाई दे रही है. अगर छात्रों के बीच यह धारणा मजबूत होती है कि उनके मुद्दों को राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया गया, तो इसका नुकसान सिर्फ CJP तक सीमित नहीं रहेगा. सपा और आप को भी इसका राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ सकता है.
सबसे बड़ा सवाल- छात्र आंदोलन या चुनावी नैरेटिव?
आखिर सवाल तो उठेंगे ही- क्या छात्रों के मुद्दों को वास्तव में छात्रों की आवाज बनाने के लिए उठाया गया था, या फिर उन्हें 2027 की चुनावी राजनीति के लिए एक राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने के साधन के तौर पर इस्तेमाल किया गया? यही सवाल इस पूरे संभावित गठजोड़ की सबसे बड़ी परीक्षा भी होगा.
(डॉ. विनम्र सेन सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. वह समसामयिक और सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं.)
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