इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दावा किया है कि सात अक्टूबर, 2023 को जब हमास ने इजराइल के एक म्यूजिक फेस्टिवल पर हमला किया, 1200 से अधिक नागरिकों को मार डाला और 200 से ज्यादा नागरिकों को बंधक बना लिया, तो सुरक्षा अधिकारियों ने उन्हें जगाया नहीं.इससे पहले नेतन्याहू ने कहा था कि उन्होंने उन्हें अलर्ट नहीं किया, लेकिन अब उनका कहना है कि सुरक्षाकर्मियों ने जान-बूझकर ऐसा नहीं किया.
उन्होंने दावा किया: "वे जानते थे कि इजराइल के प्रधानमंत्री के तौर पर, मैं तुरंत पूरी सेना को अलर्ट पर रखने का आदेश दे देता."नेतन्याहू का तर्क था कि सुरक्षा अधिकारियों को हमास के हमले का अंदाजा था, लेकिन उन्हें लगा कि ऐसा नहीं होगा.और उन्होंने उन्हें इसलिए नहीं बताया क्योंकि वह तुरंत कार्रवाई करते, जिससे हमास के हमले का खतरा बढ़ सकता था.नेतन्याहू की पत्नी सारा ने भी यही बात दोहराई है.
उन्होंने कहा कि इजराइली डिफेंस फोर्सेज (आईडीएफ) के पूर्व डिप्टी चीफ यायर गोलान—जो अब डेमोक्रेट्स पार्टी के प्रमुख के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं—ने नेतन्याहू को फोन नहीं किया, जबकि इजराइली इंटेलिजेंस को हमास के हमले का अंदाजा हो गया था.इसका मतलब यह निकाला जा रहा है कि यह नेतन्याहू की राजनीतिक विश्वसनीयता को कम करने की कोशिश थी.गोलान ने चेतावनी दी कि वह सारा पर मुकदमा करेंगे, और सारा ने भी जवाबी मुकदमा करने की धमकी दी है.प्रधानमंत्री और उनकी पत्नी के मीडिया बयानों से जाहिर है कि हलचल मची है, क्योंकि इजराइल में 27 अक्टूबर को संसदीय चुनाव होने वाले हैं.
सात अक्टूबर की सुरक्षा चूक को लेकर नेतन्याहू को कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है, हालांकि गाजा में हुई जंग को लेकर उन्हें काफी समर्थन मिला है. इस जंग में महिलाओं और बच्चों समेत 70,000 से अधिक आम नागरिक मारे गए. इजराइली लोग नेतन्याहू से इस बात पर भी नाराज़ थे कि वह बंधकों को छुड़ाने में नाकाम रहे, और इजराइल में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए.
यह सब तब हुआ जब नेतन्याहू ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नापसंदगी (जिसमें अमेरिकी यूनिवर्सिटी कैंपस में छात्रों का विरोध भी शामिल था) के बावजूद गाजा में लगातार और जबरदस्त जंग जारी रखी.नेतन्याहू के दावों से आईडीएफ और सरकार के बीच करीबी रिश्तों में दरार का पता चलता है. सरकार का नेतृत्व अक्सर नेतन्याहू की लिकुड जैसी दक्षिणपंथी पार्टियां करती रही हैं.
गाजा युद्ध के दौरान मतभेद भी सामने आए. यह युद्ध 10 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता से हुए संघर्ष-विराम (सीज़फायर) के साथ खत्म हुआ, जो युद्ध शुरू होने के दो साल बाद हुआ था.
कई शीर्ष रक्षा प्रमुखों का तर्क था कि बिना किसी स्पष्ट योजना के गाजा में युद्ध करना नुकसानदेह साबित हुआ, लेकिन उन्होंने युद्ध जारी रखने के नेतन्याहू सरकार के निर्देशों का उल्लंघन नहीं किया.
नेतन्याहू ने कहा कि जनरल उन्हें "पागल" (उन्होंने अरबी शब्द 'मजनू' का इस्तेमाल किया) समझते हैं – जिसका मतलब है कि वह हमास पर हमला करने में हिचकिचाएंगे नहीं, जबकि रक्षा बल अगर हो सके तो इससे बचना चाहेंगे.नेतन्याहू ने स्पष्ट किया कि रक्षा प्रमुख ने उनके साथ "धोखा" नहीं किया, लेकिन यह निश्चित रूप से एक "विफलता, बहुत बड़ी विफलता" थी.
उन्होंने आगे बताया, "यह सब हमले से पहले की रात और सुबह हुआ, जब सारे संकेत मौजूद थे," और उन्होंने (सुरक्षा प्रमुखों ने) फैसला किया – इस डर से कि...7 अक्टूबर को हमास के हमले में 1,139 इजराइली मारे गए थे, और यह घटना इजराइल में आम चुनावों का मुख्य मुद्दा बनी हुई है.
आलोचकों ने नेतन्याहू पर आरोप लगाया है कि उन्होंने 7 अक्टूबर से पहले हमास के बारे में मिली चेतावनियों को नजरअंदाज किया.इजराइल के पूर्व जनरल स्टाफ प्रमुख गादी आइजेनकोट के चुनाव अभियान का एक बड़ा हिस्सा 7 अक्टूबर से पहले हुई सुरक्षा चूक की स्वतंत्र जाँच की मांग पर केंद्रित है.सभी बयानों और स्पष्टीकरणों के ज़रिए, नेतन्याहू अपना और अपनी राजनीतिक साख का बचाव कर रहे हैं.वह गाजा में अपनी कार्रवाई को भी सही ठहरा रहे हैं और तर्क दे रहे हैं कि हमास से निपटने का यही एकमात्र तरीका है.
यूरोप और अमेरिका में इजराइल के दोस्तों के अलावा, खुद इजराइल के भीतर भी हर कोई—यहां तक कि सेना के जनरल भी—इस बात से सहमत नहीं है कि इजराइल को 7 अक्टूबर के बाद शुरू की गई सैन्य कार्रवाई को जारी रखने की जरूरत है.
नेतन्याहू को एक कठिन चुनावी लड़ाई का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उन पर भ्रष्टाचार का मुकदमा भी चल रहा है. अगर वह चुनाव हार जाते हैं, तो यह मुकदमा मुख्य मुद्दा बन जाएगा. एक गहरी साजिश की थ्योरी, जिसे अक्सर खुलकर नहीं कहा जाता, यह है कि नेतन्याहू ने खुद हमास को मजबूत किया और हमास की उग्रवादी गतिविधियों से फायदा उठाया. इससे उन्हें फिलिस्तीन के साथ शांति स्थापित न करने और 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (दो-देश समाधान) को न मानने का एक मजबूत बहाना मिल गया.नेतन्याहू हमास की मौजूदगी का हवाला देकर कह सकते हैं कि फिलिस्तीन के साथ शांति संभव नहीं है क्योंकि वहां हमास मौजूद है.
एक पुरानी थ्योरी यह भी है कि इजराइल ने ही हमास को बढ़ावा दिया था ताकि यासर अराफात और उनके संगठन 'फतह' की साख गिराई जा सके, क्योंकि वे ओस्लो शांति समझौते के लिए राजी हो गए थे.सबसे बड़ी बात यह है कि बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी पत्नी सारा चुनाव से पहले मीडिया इंटरव्यू में जो बात फैला रहे हैं, वह यह है कि 7 अक्टूबर का हमला नेतन्याहू की नाकामी नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों की नाकामी थी.
उनका कहना है कि सुरक्षा बल उन्हें समय रहते आगाह करने में नाकाम रहे, वरना वे तुरंत कार्रवाई करके हमास के हमले को शुरू में ही कुचल सकते थे.इसमें कोई शक नहीं कि यह एक बहुत माहिर राजनेता की दलील है, लेकिन हो सकता है कि यह भरोसे की कसौटी पर खरा न उतरे, क्योंकि नेतन्याहू को एक ऐसे राजनेता के तौर पर देखा जाता है जो हमेशा किसी दुश्मन से उलझे रहना चाहता है, चाहे वह हमास हो या ईरान.
सत्ता में बने रहने के लिए उन्हें एक दुश्मन की जरूरत होती है, और वे फिलिस्तीन या ईरान के साथ किसी भी शांति समझौते से बचेंगे क्योंकि यह उनकी आक्रामक राजनीति के अनुकूल नहीं है.और इससे भी गंभीर बात यह है कि नेतन्याहू दंपत्ति की दलीलें रक्षा बलों और सत्ता में बैठे राजनेता के बीच की खतरनाक दरार को उजागर करती हैं.सवाल यह है कि क्या वह राजनेता, जिसे हालात को अपने पक्ष में मोड़ने और सत्ता में वापसी करने में महारत हासिल है, एक और अप्रत्याशित जीत हासिल कर पाएगा ?
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