दिल्ली में इन दिनों खूब चर्चा हो रही है राजनीतिक पंडितों के बीच भारतीय जनता पार्टी की नई रणनीति को लेकर। कहा जा रहा है कि जंतर मंतर पर काकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बाद पार्टी के आला नेताओं को एहसास होने लगा है कि अहंकार को त्याग कर उनको विनम्रता लानी होगी अपने तौर-तरीकों में। रणनीति के बदले जाने का पहला उदाहरण तब देखने को मिला, जब प्रधानमंत्री ने अपनी बातें कहनी शुरू की इंस्टाग्राम पर अपनी सेल्फी रीलें डाल कर। पिछले सप्ताह वाली रील में मोदी दिखे यह कहते हुए कि आर्थिक वृद्धि अब 7.8 फीसद पर है और इस बात से पूरा देश खुशी से झूम रहा है।
उन्होंने इस बात का श्रेय खुद नहीं लिया, जैसे अक्सर लेते हैं, तो लोगों को इसमें विनम्रता के आसार दिखे। प्रधानमंत्री की समस्या यह है कि उन्होंने पूरे एक दशक से अपने आपको एक ऐसे राजनेता के रूप में पेश किया है जिसको अंग्रेजी में 'स्ट्रांगमैन' कहते हैं और हिंदी में 'बाहुबली'। इस छवि को कायम रखने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने सोशल मीडिया पर अपनी ट्रोल सेना का इस्तेमाल किया है अभी तक।
अब लगता है कि इन कागजी योद्धाओं को पीछे हटा कर प्रधानमंत्री और उनके मंत्री खुद सामने रहेंगे। इस नई रणनीति के तहत इंस्टाग्राम पर मोदी दिखे हैं कई बार रीलों के जरिए आम लोगों से बातें करते हुए। इंस्टाग्राम को चुना गया है, क्योंकि माना जाता है कि जेन-जी के लिए यही सबसे बड़ा मीडिया है।
इंस्टाग्राम पर दिख तो रहे हैं प्रधानमंत्री और अपनी रीलों में थोड़े विनम्र तरीके से पेश आने की कोशिश भी कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इतना काफी है देश की इस नई पीढ़ी के क्रांतिकारी युवाओं के दिलों को छूने के लिए? इस सवाल का जवाब है कि अभी तक ऐसा होता नहीं दिख रहा है। मोदी की हर रील को तोड़-मरोड़ कर उनका मजाक बनाया जा रहा है।
जैसे जंतर-मंतर पर किया गया था और जिनमें मोदी की अंग्रेजी और उनकी विदेशी यात्राओं का खूब मजाक उड़ाया गया था। कहने का मतलब है मेरा कि देश के युवाओं पर अभी तक इंकलाब का असर इस कदर है कि वे प्रधानमंत्री की बातें सुनने को तैयार नहीं हैं। ऊपर से ये ऐसे हैं कि किसी से नहीं डरते हैं। जो डरते थे, उनका भी डर दूर हो गया जंतर मंतर के बाद।
हर क्रांति में कोई मुद्दा या कोई व्यक्ति केंद्रित होता है और इस क्रांति में लगता है मुद्दे तो हैं ही, लेकिन साथ में निशाने पर रहे हैं मोदी खुद। जब उनकी मीडिया टीम ने इसको देखा, तो पहली सलाह शायद उनकी थी प्रधानमंत्री को कि अपनी बाहुबली वाली छवि न बदलें, इसलिए इंस्टाग्राम पर अपनी पहली रील में उन्होंने कहा था कि वे उन बच्चियों को माफ करते हैं, जिन्होंने उनको और उनकी दिवंगत माताजी को गालियां दी थीं। इस रील के फौरन बाद आवाजें उठने लगीं कि माफी तो मोदी को मांगनी चाहिए उन विद्यार्थियों से जिन पर पैलेट गन चलाई गई थी।
इसके बाद मोदी ने अपना अंदाज बदला और भारतीय जनता पार्टी ने अपनी टीम बदली। नई टीम में स्मृति ईरानी और राम माधव हैं जो हैं तो पचास से ऊपर, लेकिन कम से कम पार्टी के आला नेताओं से उनकी उम्र काफी कम है। सवाल यह है कि नई टीम क्या अपनी बातों में बदलाव ला पाएगी या नहीं! फिलहाल ऐसा नहीं दिख रहा है। नई टीम वही कर रही है जो पुरानी टीम ने किया था। यानी मोदी की खूब चापलूसी करने के बाद ही किसी मुद्दे के बारे में कुछ कहना।
इसलिए ऐसा लगने लगा है कि अभी कुछ खास नहीं बदला है। न मोदी बदले हैं, न उनकी मीडिया नीति और न ही उनकी क्षमता युवाओं की बातें सुनने की। बदलाव का सिर्फ नाटक हो रहा है जो साफ दिखता है। मोदी अगर वास्तव में देश के युवाओं के साथ जुड़ना चाहते हैं, तो नाटकीय परिवर्तन से काम नहीं चलने वाला है इसलिए कि ये पढ़े-लिखे बच्चे हैं जो बाहुबलियों से डरने के बदले उनका मजाक उड़ाते हैं। कुछ राजनेता इस बात को समझ गए हैं और मानते हैं कि हम जो देख रहे हैं वह पूरी तरह एक क्रांति है, जो देश की राजनीति को बदल कर रखेगी। यहां याद रखना चाहिए कि अगले लोकसभा चुनाव में युवाओं का वोट सबसे ज्यादा असरदार होने वाला है।
इस नई पीढ़ी तक पहुंचने के लिए टीम बदलने से काम नहीं चलेगा। इन तक पहुंचने के लिए विनम्रता के साथ ईमानदारी भी बहुत जरूरी है, इसलिए जब प्रधानमंत्री 7.8 फीसद आर्थिक वृद्धि पर कहते हैं कि देश के लोग खुशी से झूम रहे हैं, तो याद आती है उस 'इंडिया शाइनिंग' वाले चुनाव की, जिसने 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी को सत्ता से हटा कर कांग्रेस को मौका दिया था।
उस समय दिल्ली के सारे राजनीतिक पंडित मान ही नहीं सकते थे कि अटल बिहारी वाजपेयी को सोनिया गांधी हरा सकेंगी। इनमें मैं भी थी और मुंह की खानी पड़ी थी हम सबको। इसके बाद मैंने किसी भी चुनाव में भविष्यवाणी करना छोड़ दिया, लेकिन अब इतना कहना चाहती हूं कि देश की राजनीति इतनी बदल चुकी है जंतर मंतर के बाद कि पुराने तरीके और पुराने विचारों से काम नहीं चलने वाला है।
हिंदी फिल्मों की भाषा में इस बात को कहा जाए, तो कहना इस तरह होगा- नए लोग हैं, नई पीढ़ी और नया दौर। इस नए दौर में उभर कर आ रहे हैं नए किस्म के राजनेता, जिनकी छाया अभी तक हमने नहीं देखी है राष्ट्रीय राजनीतिक रंगमंच पर। इनको समझना जरूरी है।
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