सत्य निकेतन में राहत और बचाव कार्य अपनी जगह अत्यंत जरूरी है। मलबे में फँसे प्रत्येक व्यक्ति का जीवन सर्वोच्च प्राथमिकता है। लेकिन मलबा हट जाने के साथ यह मामला समाप्त नहीं होना चाहिए। इस हादसे की जांच केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि भवन किस तकनीकी कारण से गिरा। यह भी पता चलना चाहिए कि भवन की स्थिति क्या थी, उसमें किस प्रकार का निर्माण या मरम्मत कार्य चल रहा था, उसका उपयोग किस रूप में स्वीकृत था, उसमें कितने लोग रह रहे थे और संबंधित सरकारी एजेंसियों ने उसकी सुरक्षा की निगरानी कब और कैसे की थी। क्योंकि अगर जांच केवल एक मकान मालिक तक पहुँचती है और उस पूरी प्रशासनिक श्रृंखला तक नहीं पहुँचती जिसने इतने लोगों को उस भवन में रहने दिया, तो अगली त्रासदी के लिए जमीन फिर तैयार रहेगी।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि सुरक्षा कोई हादसे के बाद दिया जाने वाला मुआवजा नहीं है। सुरक्षा वह व्यवस्था है जो मुआवजे की जरूरत ही पैदा न होने दे। सत्य निकेतन का मलबा साफ हो जाएगा। कुछ दिनों बाद शायद वहाँ फिर आवाजाही शुरू हो जाएगी। अखबारों के पन्नों से यह खबर भी उतर जाएगी। लेकिन यदि इस हादसे के बाद भी दिल्ली के पीजी, हॉस्टल और कोचिंग परिसरों का वास्तविक, पारदर्शी और नियमित सुरक्षा ऑडिट नहीं होता, तो यह केवल एक और घटना होगी-उस लंबी सूची में जुड़ी हुई, जिसमें हर हादसे के बाद एक ही वाक्य लिखा जाता है: 'दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।' अब इस रटे-रटाए वाक्य से आगे बढ़ने का समय है। सवाल दोषियों को बख्शने या न बख्शने का ही नहीं है। सवाल यह है कि जिनकी जिम्मेदारी लोगों को मलबे के नीचे पहुँचने से पहले उन्हें बचाने की थी, उनकी जवाबदेही कब तय होगी?
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