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Opinion Mohan Bhagwat Speech: मोहन भागवत इन दिनों भारत से बाहर हैं. लेकिन चर्चा भारत की ही हो रही है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख अमेरिका और यूरोप के दौरे पर हैं. न्यूयॉर्क से लेकर टोरंटो और लंदन तक उन्होंने हिंदू, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, भारत और विविधता पर बातें की हैं. उनके बयानों को एक साथ रखकर देखें तो एक बात साफ नजर आती है. भारत को एक बनाने के लिए एक जैसा बनाना जरूरी नहीं है. यानी एकता के लिए एकरूपता जरूरी नहीं. न्यूयॉर्क में भागवत ने कहा कि विविधता में एकता भारत के डीएनए में है. विविधता पर खुशी मनानी चाहिए. उसका सम्मान करना चाहिए और उसे स्वीकार करना चाहिए. लंदन में उन्होंने इसी विचार को हिंदू राष्ट्र की अपनी व्याख्या से जोड़ा. उन्होंने कहा कि अस्तित्व मूल रूप से एक है, भले ही वह अलग-अलग रूपों में दिखाई देता हो. विविधता प्राकृतिक है. इसलिए उसे स्वीकार करना और सम्मान देना जरूरी है. अब सवाल यह है कि इस सोच में हिंदू राष्ट्र का मतलब क्या है?
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत.
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हिंदू राष्ट्र की भागवत की परिभाषा
हिंदू राष्ट्र शब्द भारत में राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा है. किसी के लिए यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है तो किसी के लिए बहुसंख्यकवाद. भागवत इसे अलग तरीके से समझाते हैं. लंदन में उन्होंने कहा कि हिंदू को सिर्फ धर्म या पूजा पद्धति के रूप में नहीं देखना चाहिए. भारत में अलग-अलग विचार पैदा हुए. आस्तिक भी रहे और नास्तिक भी. अलग-अलग पूजा पद्धतियां भी रहीं. लेकिन इन सब के बीच एक बात यह रही कि यहां हर किसी को अपने रास्ते पर चलने की जगह मिली. यानी तुम्हारा रास्ता अलग है तो भी तुम्हें अपना रास्ता चुनने का अधिकार है. दूसरे को अपने रास्ते पर लाने के लिए उसका रास्ता मिटाना जरूरी नहीं. यहीं पर भागवत हिंदुत्व को भारत की बहुलतावादी परंपरा से जोड़ते हैं.
फिर मुसलमान कहां हैं?
यही सबसे बड़ा सवाल है. भागवत ने लंदन में अपनापन की बात की. उनके मुताबिक यह अपनापन व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से पूरी मानवता तक जाता है. ऐसे में भारत के मुसलमानों और दूसरे समुदायों के लिए इसमें जगह कहां है? भागवत की विदेश में कही बातों से जो जवाब निकलता है, वह यही है कि भारत की विविधता को स्वीकार करना ही इस एकता का हिस्सा है. यानी मुसलमान भी इस विविधता के एक अभिन्न अंग हैं.
नफरत के आरोप का सीधा जवाब
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लंदन में भागवत ने संघ पर लगने वाले एक बड़े आरोप का भी जवाब दिया. कुछ लोग कहते हैं कि संघ के काम का आधार घोर नफरत है. भागवत ने इसे पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि संघ के काम का आधार शुद्ध सात्विक प्रेम है. यानी उनके मुताबिक संघ की सोच का केंद्र विरोध नहीं, अपनापन है. यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संघ को लेकर भारत में सबसे बड़ी बहस उसकी विचारधारा और दूसरे समुदायों के प्रति उसके नजरिए को लेकर ही होती है.
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भागवत विदेश में इस सवाल का जवाब प्रेम, अपनापन और विविधता के जरिए दे रहे हैं. लेकिन यहीं कांग्रेस का सवाल भी सामने आता है. भागवत विदेश में जो बातें कहते हैं, वह भारत में क्यों नहीं कहते? यह सवाल राजनीतिक है, लेकिन नजरअंदाज करने लायक नहीं. क्योंकि किसी विचारधारा की असली परीक्षा विदेशी मंच पर नहीं, अपने देश में होती है.
यूनिटी के लिए यूनिफॉर्मिटी जरूरी नहीं
भागवत के पूरे दौरे को एक लाइन में समेटना हो तो शायद यही बात सबसे अहम है. भारत को एक होने के लिए एक जैसा होने की जरूरत नहीं है. भारत में भाषाएं अलग हैं. पूजा पद्धतियां अलग हैं. खान-पान और रीति-रिवाज अलग हैं. फिर भी देश एक है. भागवत इसी विविधता को भारत की ताकत के रूप में पेश कर रहे हैं. यह संदेश अपने आप में बड़ा है. क्योंकि अगर विविधता भारत की ताकत है तो उसे खतरे की तरह देखने के बजाय स्वीकार करना होगा. दूसरे की अलग पहचान को अपने लिए चुनौती मानना बंद करना होगा.
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अब असली परीक्षा भारत में
भागवत के विदेश दौरे को सिर्फ संघ के शताब्दी वर्ष में आउटरीच प्रोग्राम का हिस्सा मानना ठीक नहीं होगा. यह संघ की उस छवि को दुनिया के सामने रखने की कोशिश भी है, जिसमें हिंदुत्व एक अनंत वर्ष पुराना विचार, हिंदू राष्ट्र को विविधता में एकता और संघ को शुद्ध सात्विक प्रेम पर आधारित संगठन के रूप में पेश किया जा रहा है. इन बातों से सहमति हो या असहमति, बहस के लिए उनका पक्ष अब काफी साफ है. लेकिन अगला सवाल इससे भी बड़ा है. जो बात न्यूयॉर्क और लंदन में कही जा रही है, वही बात भारत में उतनी ही स्पष्टता से क्यों नहीं सुनाई देती? अगर विविधता सचमुच भारत की ताकत है और एकता के लिए एकरूपता जरूरी नहीं, तो यही संदेश भारत की जमीन पर भी उतनी ही मजबूती से सुनाई देना चाहिए. तभी एक मजबूत, खुशहाल और शांतिप्रिय भारत का निर्माण हो सकेगा.
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