Last Updated: September 07, 2026, 11:04 IST
पटनाः तेजस्वी यादव कहते हैं कि भाजपा ने जेडीयू को खत्म करने के लिए संजय झा को काम पर लगाया था. भाजपा अपने मकसद में कामयाब रही. तेजस्वी ने अपने इस कथन को तार्किक आधार देने के लिए यह भी कहा कि संजय झा पहले भाजपा के बड़े नेता अरुण जेटली (अब स्वर्गीय )के पीए हुआ करते थे. बात कुछ हद तक सही भी है. पर, सरकारी रिकॉर्ड में यह बात अभी तक कन्फर्म नहीं हुई है कि वे आफिसियल-अन आफिसियल अरुण जेटली के पीए थे. अलबत्ता वे राजीव प्रताप रूडी के मीडिया एडवाइजर जरूर रहे. वे जेटली के करीबी थे और उनके साथ रह कर ही उन्होंने राजनीति की बारीकियां सीखीं. संजय झा के उम्दा राजनीतिक प्रशिक्षण का अंदाजा जेडीयू के साथ 14 साल की अल्पावधि में उनके राजनीतिक सफर से भी लगाया जा सकता है.
JDU को BJP के करीब पहुंचाया
2020 में 43 सीटों पर सिमट चुके जेडीयू को 2025 में भाजपा जैसी ऊंचाई तक जाने का अवसर संजय झा के कार्यकाल में ही मिला है. एनडीए की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को 89 सीटें मिलीं तो जेडीयू भी पिछली 43 से 85 पर पहुंच गया. बांकीपुर उपचुनाव में एक सीट गंवाने से भाजपा और जेडीयू के बीच अंतर अब सिर्फ 3 का रह गया है. मुजफ्फरपुर जिले के साहेबगंज से भाजपा के विधायक राजू सिंह की सदस्यता पर खतरा खड़ा हो गया है. उन्हें एक आपराधिक मामले में कोर्ट ने 4 साल की सजा इसी साल जुलाई में सुनाई है. उनकी मेंबरी रद्द हुई तो फासला 2 का ही रह जाएगा.
उपचुनाव में ही दिखाया जलवा
संजय झा को राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने 29 जून 2024 को जेडीयू का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया. उनकी पहली परीक्षा उसी साल हुए 4 सीटों के उपचुनाव में हुई. सीटों के तालमेल से लेकर अप्रत्याशित नतीजे आने तक का उनका परफार्मेंस देखा जा सकता है. कुल 4 में एक ही सीट एनडीए के पास थी. बाकी 3 पर महागठबंधन का कब्जा था. चूंकि बिहार में तब जेडीयू के नेतृत्व वाली सरकार थी, इसलिए सफलता-असफलता की नैतिक जिम्मेदारी जेडीयू की ही होती. उपचुनाव में सफलता-असफलता को लोग अगले ही साल होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़ देते. इसलिए अगर सभी सीटें जीतने में एनडीए कामयाब रहा तो इसका श्रेय बिहार में तब एनडीए की लीड भूमिका में रहे जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष को तो मिलना ही चाहिए.
पार्टी का हर टास्क पूरा किया
संजय झा और जेडीयू का जुड़ाव अब से 14 साल पहले 2012 में हुआ. उसके पहले वे भाजपा के लिए काम करते थे. उनके राजनीतिक सरोकारों की शुरुआत ही भाजपा से हुई थी. भाजपा ने उन्हें एमएलसी भी बनाया. नीतीश कुमार की पारखी नजर ने उनमें संभावनाएं देखीं. भाजपा के एमएलसी रह चुके संजय झा को नीतीश ने 7 साल तक परखा. फिर उन्हें 2019 में जेडीयू कोटे से एमएलसी बनाया. मंत्री पद दिया और राज्यसभा का सदस्य बना कर केंद्र की राजनीति के लिए दिल्ली भेजा. नीतीश को उनकी क्षमता से यह भी कम लगा तो जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष का दायित्व भी दे दिया.
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BJP-JDU में बेहतर समन्वय
नीतीश ने एक बार खुद कहा था कि संजय झा के कारण ही वे भाजपा से सटे थे. यानी भाजपा और जेडीयू के बीच बेहतर समन्वय का श्रेय संजय झा को जाता है. कहा भी जाता है कि नीतीश दरवाजा भले बंद करते हैं, लेकिन खिड़की खोल कर रखते हैं. संजय झा कहीं जेडीयू में वही खिड़की तो नहीं हैं! खैर, इसके लिए परेशान होने की जरूरत नहीं. अगर वे भाजपा के मक़सद के लिए काम कर रहे थे तो इसका कोई आधार भी तो होना चाहिए. सच तो यह है कार्यकारी अध्यक्ष बन कर उन्होंने न सिर्फ 2024 का उपचुनाव फतह किया, बल्कि 2025 के असेंबली इलेक्शन में अपना जलवा भी दिखा दिया. सीटों का तालमेल हो या उम्मीदवार का चयन, जेडीयू को भाजपा का अवांछित दबाव नहीं झेलना पड़ा. नतीजे भी शानदार रहे. यह सब इसलिए संभव हुआ कि संजय झा ने जेडीयू और बीजेपी के बीच बेहतर समन्वय बनाया.
तेजस्वी ने राजद को डुबोया
तेजस्वी अब राजद के घोषित कार्यकारी अध्यक्ष हैं. पहले भी थे, पर अघोषित. महागठबंधन 2 बार से उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा बना कर चुनाव भी लड़ाता रहा है. 2020 में तो उनके सीएम बनने की उम्मीद भी बन गई थी. 10-12 सीटों से ही वे पिछड़े थे. राजनीति के माहिर खिलाड़ी लालू यादव का गुरु मंत्र भी उन्हें सुलभ है. इसके बावजूद हाथ में आती बाजी वे हार गए. 2025 के चुनाव में पिछली बार 75 सीटों पर रहे राजद को उन्होंने 25 पर सिमटा दिया. इतना ही नहीं, जिस महागठबंधन के वे नेता थे, उसका भी बंटाधार हो गया. सम्मिलित रूप से महागठबंधन की 5 पार्टियां 35 पर ही अंटक गईं.
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