भारत की बौद्धिकता में नैमिषारण्य का क्या महत्व है? इसका उत्तर कम से कम उनके पास तो नहीं होगा, जो पाठ्यक्रमों के रास्ते शिक्षित या विद्वान बने हैं। साधु-संतों और कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में संलग्न लोग जरूर इसका महत्त्व समझा देंगे। यहां बारह वर्षों तक बौद्धिक मंथन हुआ था, जिसमें अठासी हजार विद्वान एकत्रित हुए थे।
सभ्यता के इतिहास में यह एक विशिष्ट, मगर अपवादस्वरूप घटना है। तब वहां के कुलपति ऋषि शौनक थे। यहां भारतीय दर्शन और जीवन मूल्यों के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण पक्षों पर सत्संग, शास्त्रार्थ और विवेचना हुई। इसके बारे में अनभिज्ञता का कारण क्या है? बौद्धिक इतिहास को आधुनिकता का प्रतिकूल समझने की हीन ग्रंथि हमारे मन-मस्तिष्क में डाल दी गई है।
प्राचीन भारत जीवन दर्शन का महासागर है। इसमें विचारों की विपुलता और भिन्नता दोनों हैं। वशिष्ठ, भारद्वाज, वेदव्यास, शौनक, शुक्राचार्य, बृहस्पति, धौम्य, कपिल, वामदेव और शंकराचार्य जैसे कुछ नाम हैं, जिनके ज्ञान, चेतना और साधना में विविधता थी और उसकी थाह पाना भी किसी के लिए दुष्कर है।
कपिल का सांख्य दर्शन, वामदेव का नाट्यशास्त्र या शंकराचार्य का अद्वैतवाद, इन सभी का उपयोग पश्चिम ने अपनी बौद्धिकता को संबल देने के लिए किया है। इन दर्शनों का प्रत्येक नाम एक विशिष्ट ज्ञान की धारा की उपज है। इसका इतिहास तो रुचिकर है, मगर शिक्षा के आधुनिक स्वरूप ने हमारी रुचि को समाप्त कर दिया है।
ये सभी शिक्षक थे। वैसे शिक्षक दो प्रकार के होते हैं- पहला वर्ग व्यावसायिक शिक्षकों का है। वे व्यावसायिक सफलता की राह दिखाते हैं। दूसरा वर्ग ऐसा है, जो अपनी साधना, ज्ञान और चेतना से स्वयं एक सनातन संस्था बन जाते हैं। ऐसे सनातन शिक्षक जीवन काल के बाद भी राह दिखाते रहते हैं। इसी वर्ग की खोज, उन्हें प्रोत्साहन देना और उनके महत्त्व को समझना शिक्षा नीति के निर्माताओं के लिए आवश्यक है।
सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर पांच सितंबर को प्रत्येक वर्ष शिक्षक दिवस मनाया जाता है। मगर यह दिन उनके राष्ट्रपति होने के कारण महत्त्व का नहीं बना। उनके शिक्षक होने की गुणवत्ता ही इसका कारण है। वे मैसूर विश्वविद्यालय के महाराजा कालेज में दर्शन शास्त्र के शिक्षक थे। उनका ज्ञान और साधना विद्यार्थियों को स्वस्थ मन, व्यापक दृष्टि और अर्ध-संत स्वभाव बनाने की जीवंत राह है।
उनकी नियुक्ति जब कलकत्ता विश्वविद्यालय में हुई और उन्होंने विदाई लेने से इनकार कर दिया, तब उन्हें घोड़ा गाड़ी से रेलवे स्टेशन ले जाना तय हुआ। मगर विद्यार्थियों ने घोड़ा हटा दिया और वे स्वयं बग्गी खींचते हुए उन्हें स्टेशन ले गए। स्टेशन फूलों से सजा था, हजारों लोग नम आंखों से उन्हें विदाई दे रहे थे। यही गुरुकुल भाव है, जो राधाकृष्णन ने पैदा किया। इसी ने एक सामान्य शिक्षक की उपाधि को गणतंत्र के सर्वोच्च पद की तुलना में छोटा नहीं पड़ने दिया।
इसी भावना ने चाणक्य को सार्वजनिक जीवन में रहने वालों के लिए एक नैतिक मानदंड बना दिया। 'अमात्य' (मंत्री) के रूप में वे 'राजा' (चंद्रगुप्त) के सामने लघुता के उदाहरण नहीं बने।
शिक्षा सरकारी हो या निजी, यह बहस का विषय रही है। मगर शिक्षा की सार्थकता नीयत पर निर्भर है। विश्वभारती (शांतिनिकेतन) तो सरकारी नहीं था, लेकिन उसका योगदान अविस्मरणीय है। मगर पहले की तुलना में आज यह पासंग भी नहीं है। बड़ौदा में गंगानाथ विद्यालय तो सरकारी था। इसके प्राचार्य सार्जेंट राव देशपांडे थे। उन्होंने शिक्षण संस्था को परिवार के रूप में ढालने का काम किया। प्रत्येक शिक्षक का स्वभाव, संगत और समझ के अनुसार नया नामकरण सहजता से किया गया।
कालेलकर 'काका साहेब', तो फडके 'मामा', हरिहर शर्मा 'अन्ना' के नाम से विख्यात हुए। उस संस्था से हटने के बाद भी यह भावनात्मक संबंध जारी रहा और वे मामा, काका, अन्ना बने रहे। शिक्षा सार्थकता पैदा करती है, तभी समाज दो कदम आगे बढ़ता है। व्यावसायिक सफलता समाज की मानसिक उन्नति को सुनिश्चित नहीं करती है। आज उच्च शिक्षा प्राप्त लोग विश्वविद्यालय परिसर में अपनी जातियों, समुदाय एवं क्षेत्र में अपनी अस्मिता तलाशते हैं। ऐसे लोगों के लिए यह उदाहरण एक आईना होगा।
आचार्य जेबी कृपलानी सिंधी थे और बिहार के लंगट सिंह कालेज में सफल प्राध्यापक रहे। अंग्रेजों ने उन पर जुल्म किए। वे शांतिनिकेतन गए, फिर गुजरात विद्यापीठ के एक महाविद्यालय के प्राचार्य बने। काका कालेलकर जन्म से मराठी थे, पर गुजराती साहित्य सभा के अध्यक्ष भी रहे। दरअसल, भवनों, सुविधाओं और विलासी वातावरण की शिक्षा से समाजपरक, समानतामूलक और संवेदनशीलता नहीं आती है। सभ्यताएं भवनों या विलासी सुविधाओं में प्राप्त शिक्षा से नहीं बनी हैं और न ही बनेंगी। उसी के प्राय: सभी शिकार हैं। जो समाज अपने मूल्यों को लेकर चिंतित नहीं रहता, उसका खोखलापन बढ़ता जाता है।
यह सत्य है कि हमारा भूतकाल चाहे वह कितना भी स्वर्णिम रहा हो, उसमें वापस नहीं लौट सकते हैं और न ही विश्व के विज्ञान, तकनीक और धन केंद्रित वस्तुनिष्ठ परिस्थितियों को एकाएक बदल सकते हैं। मगर तीन पहलुओं से वर्तमान शिक्षा की सार्थकता के सूचकांक को समझा जा सकता है। पहला यह कि मानवीय संबंधों और सामुदायिक जीवन को यह कितना प्रगाढ़ कर पा रही है? दूसरा, नव उदारवाद द्वारा विषमता को स्वाभाविक मानने की थोपी जा रही प्रवृत्ति के प्रतिकूल यह समानतामूलक स्वभाव को कितना विकसित कर पा रही है? तीसरा, यह सामाजिक संघर्षों के समाधान की कितनी शक्ति उपार्जित कर पा रही है?
यह सब न्यूयार्क, पेरिस, लंदन या मेलबर्न जाकर शिक्षा को समझने से संभव नहीं होगा। यह तो नवद्वीप, नालंदा, नैमिषारण्य और नेतरहाट को वर्तमान संदर्भ में पुनर्जीवित करके ही संभव है। इसका आधार और परिणाम दोनों ही आलोचनात्मक चिंतन है। वही हमारी सभ्यता की मौलिकता अर्जित करने का एकमात्र रास्ता हो सकता है।
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