विश्व बैंक इसका और भी बड़ा उदाहरण रखता है। 1993 की उसकी प्रभावशाली 'ईस्ट एशियन मिरेकल' रिपोर्ट का निचोड़ था कि विशिष्ट उद्योगों को बढ़ावा देना अमूमन काम नहीं करता। उस समय इसने वाशिंगटन सहमति को मजबूत करने में मदद की, जिसमें कहा गया था कि सरकार-नेतृत्व वाले औद्योगिक नियोजन के बजाय बाजार-अनुकूल नीतियां सही रास्ता हैं। तीन दशक बाद, इसकी 2026 की रिपोर्ट कहती है कि औद्योगिक नीति की वापसी हो चुकी है और यह सरकारों को इसके उपयोग के लिए साक्ष्य-आधारित टूलकिट प्रदान करती है। यह भारत की पीएलआई योजना के लिए अच्छी खबर है, लेकिन क्या यह यू-टर्न नहीं?
वर्षों तक विश्व बैंक अपनी 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' रैंकिंग प्रकाशित करता रहा, जिसने किसी देश की व्यापार-अनुकूल छवि को तय करने में बड़ी भूमिका हासिल कर ली। विडंबना यह थी कि 'डूइंग बिजनेस 2010' में 183 देशों में भारत 133वें, ब्राजील 129वें और रूस 120वें स्थान पर था; जबकि चीन 89वें पायदान पर था। स्पष्ट रूप से विश्व बैंक के संकेतक यह समझाने में पूरी तरह नाकाम रहे कि इतनी खराब रैंकिंग वाले ये ब्रिक्स देश इतनी तेजी से विकास कैसे कर रहे थे। इसके बाद, एक विवाद के चलते विश्व बैंक ने 2021 में डूइंग बिजनेस रैंकिंग को बंद कर दिया और इसकी जगह एक नया पैमाना लाया गया।
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