अगस्त 2026। ईरान की जंग को अब छह महीने हो गए। ट्रंप ने इसे 'छोटी कार्रवाई' कहा था, जो कुछ हफ्तों में खत्म हो जाने वाली थी। छह महीने बीत गए। 37.5 अरब डॉलर खर्च। गोला-बारूद का भंडार खाली। होर्मुज से गुजरने वाले जहाज 130 से घटकर 24 रह गए। और, अब ट्रंप ने हथियार बदला-बम की जगह भूख। 'ऑपरेशन इकनॉमिक आउटकास्ट।' 'इकनॉमिक डी-डे।' हर उस देश पर प्रतिबंध, जो ईरान से व्यापार करे। नाकाबंदी। घेराबंदी। दुनिया की सबसे पुरानी सैन्य रणनीति-दुश्मन को भूखा मारो। ईरान के विदेश मंत्री ने ट्वीट किया-14 साल पहले : 'इतिहास की सबसे सख्त पाबंदियां।' नाकाम। आठ साल पहले : 'अधिकतम दबाव।' नाकाम। पांच महीने पहले : 'बिना शर्त समर्पण।' नाकाम। आज : 'इतिहास का सबसे क्रूर आर्थिक अभियान। नाकाम होगा।' 47 साल से ईरान पर किसी न किसी रूप में पाबंदियां हैं। कभी अमेरिकी। कभी यूरोपीय। कभी संयुक्त राष्ट्र की। ईरान खड़ा है, लड़ रहा है। टाइम मशीन के मुसाफिरो-दुश्मन की घेराबंदी इतिहास की सबसे पुरानी और सबसे गलत समझी जाने वाली रणनीति है। कभी-कभी काम करती है, बड़ी शानदार जीत देती है और कभी-कभी जो घेरता है, वह खुद टूट जाता है। आइए, अपनी सीट पकड़िए। हम पहुंच रहे हैं 405 ईसा पूर्व। हेलेस्पोंट। आज का तुर्किये। आप एक बड़ी लंबी जंग के गवाह बन रहे हैं।
एथेंस और स्पार्टा की जंग 27 साल से चल रही है। एथेंस समुद्री ताकत है-बेड़ा, व्यापार, लोकतंत्र। उसकी कमजोरी? अनाज। एथेंस अपना अनाज खुुद नहीं उगाता। काला सागर से आता है, हेलेस्पोंट जलडमरूमध्य होकर। स्पार्टा के एडमिरल लाइसेंडर ने तय किया-जहाज डुबाओ, अनाज का रास्ता रोको। हेलेस्पोंट पर स्पार्टा ने एथेनियन बेड़ा तबाह किया। अनाज बंद। एथेंस भूखा। महीनों चला। लोग भुखमरी से मरे। और अब देखिए, एथेंस ने समर्पण कर दिया। लोकतंत्र मरा। एथेंस की दीवारें गिराई गईं-बांसुरी की धुन पर स्पार्टा ने जश्न मनाया। घेराबंदी काम करती है-जब दुश्मन के पास कोई दूसरा रास्ता न हो। एथेंस के पास नहीं था। डायल पर तारीख देखिए। 1453। कॉन्स्टेंटिनोपल। टाइम मशीन बोस्फोरस जलडमरूमध्य के ऊपर मंडरा रही है। नीचे इतिहास की सबसे शानदार घेराबंदी। ऑटोमन सुल्तान मेहमद द्वितीय (21 साल का) ने कॉन्स्टेंटिनोपल को घेरा। बाइजेंटाइन साम्राज्य की राजधानी। 1,100 साल पुरानी। दीवारें इतनी मजबूत कि पिछली 20 घेराबंदियां नाकाम रहीं। मेहमद ने दुनिया की सबसे बड़ी तोप बनवाई-'बैसिलिका।' आठ मीटर लंबी। 600 किलो के गोले। मगर दीवारें टूटतीं और रात में मरम्मत हो जातीं। तो मेहमद ने जो किया, वह पागलपन था-70 जहाजों को जमीन पर से खींचकर बंदरगाह में उतारा। गोल्डन हॉर्न (जो जंजीर से बंद था) जमीन के रास्ते पार किया। लकड़ी की पटरियों पर चर्बी लगाई। बैलों ने खींचे। रातभर में 70 जहाज पहाड़ पार। 53 दिन बाद दीवार टूटी। कॉन्स्टेंटिनोपल गिरा। रोमन साम्राज्य (जो 1,500 साल जिंदा था) खत्म। एक 21 साल के लड़के ने धैर्य और पागलपन से वह किया, जो 20 सुल्तानों ने नहीं किया। अब सीधे उड़ते हैं अमेरिका की तरफ। 1863। विक्सबर्ग। मिसिसिपी नदी। अमेरिकी गृहयुद्ध। टाइम मशीन कुछ नीचे उड़ रही है। आप देखिए, जनरल ग्रांट ने विक्सबर्ग को घेरा है-47 दिन। विक्सबर्ग शहर मिसिसिपी नदी की ऊंची चट्टानों पर बैठा है-सीधा हमला आत्महत्या है। ग्रांट ने कहा-इन्हें भूखा मारो। शहर के लोगों ने चूहे खाए। खच्चर खाए। दीवार पर लगे वॉलपेपर का पेस्ट खाया, क्योंकि उसमें लेई लगी थी, जिसमें गेहूं का आटा मिला होता था। तोपगोले से बचने के लिए गड्ढों में रहे। बच्चे गड्ढों में पैदा हुए। चार जुलाई, 1863 को विक्सबर्ग ने समर्पण किया। मिसिसिपी नदी पर संघ का कब्जा। दक्षिणी परिसंघ दो टुकड़ों में बंटा। लिंकन ने कहा था, 'विक्सबर्ग जंग की चाबी है, जो मिल गई।' घेरेबंदी ने फिर काम किया-दुश्मन छोटा था, घिरा हुआ था, कोई रास्ता नहीं था। लेकिन घेराबंदी की नाकामियों से मिलना भी जरूरी है। चलते हैं 1806 में। नेपोलियन का कॉन्टिनेंटल सिस्टम आ गया है। यूरोप में अफरातफरी है। नेपोलियन ने पूरे यूरोप को हुक्म दिया-ब्रिटेन से कोई व्यापार नहीं। महाद्वीपीय नाकाबंदी। ब्रिटेन को भूखा मारो। ब्रिटेन ने क्या किया? नए बाजार खोजे। लातिन अमेरिका से व्यापार बढ़ाया। तस्करी फली-फूली। फ्रांसीसी अफसर खुुद ब्रिटिश माल खरीद रहे थे। और नेपोलियन? उसे नाकाबंदी लागू करवाने के लिए स्पेन पर हमला करना पड़ा-छह साल का गुरिल्ला युद्ध। रूस पर हमला करना पड़ा-छह लाख सैनिक गए, एक लाख लौटे। जिसने घेरा, वह खुद घिर गया। नेपोलियन सेंट हेलेना में मरा। इस घेरेबंदी ने ब्रिटेन को अगली सदी तक दुनिया का मालिक बना दिया। अब शीत युद्ध की ओर बढ़ते हैं, जो अमेरिका-रूस के तनाव की शुरुआत थी। यह आपके सामने है 1948 का बर्लिन। स्टालिन ने पश्चिमी बर्लिन की हर सड़क, हर रेल लाइन, हर नहर बंद कर दी। 25 लाख लोग-भूखे मरें या सोवियत शर्तें मानें। ट्रूमैन ने तीसरा रास्ता चुना-आसमान। बर्लिन एयरलिफ्ट। हर तीन मिनट में एक विमान। 277,000 उड़ानें। कोयला, आटा, दूध, दवा-सब हवा से। एक पायलट गेल हालवर्सन ने अपने विमान से बर्लिन के बच्चों के लिए चॉकलेट और च्युइंग गम गिराए। बच्चों ने उसे 'कैंडी बॉम्बर' कहा। 15 महीने बाद स्टालिन ने हार मानी। नाकाबंदी हटाई। बिना एक गोली चले। घेराबंदी तोड़ने का सबसे शानदार उदाहरण और उसने शब्द नहीं, एक चॉकलेट से दुनिया का दिल जीता। और अब वह घेराबंदी, जो इतिहास की सबसे लंबी और सबसे दर्दनाक है। टाइम मशीन आ गई है लेनिनग्राद। साल है 1941-1944। हिटलर ने लेनिनग्राद (आज का सेंट पीटर्सबर्ग) को पूरी तरह घेर लिया। 872 दिन। ढाई साल। उसका इरादा शहर को जीतना नहीं था, भूखा मारकर मिटाना था। पहली सर्दी सबसे भयंकर। माइनस 30 डिग्री। राशन-125 ग्राम रोटी प्रति व्यक्ति प्रति दिन। रोटी? बुरादा, सेल्यूलोज और थोड़ा आटा। लोगों ने वॉलपेपर का गोंद खाया। चमड़े के बेल्ट उबाले। बिल्लियां और कुत्ते गायब हो गए। फिर चूहे। फिर कौवे। दस लाख नागरिक मरे-ज्यादातर भूख से। बमबारी से नहीं। मगर लेनिनग्राद ने समर्पण नहीं किया। 872 दिन। शोस्ताकोविच ने अपनी सातवीं सिंफनी लिखी (लेनिनग्राद सिंफनी) घेराबंदी के बीच। लाउडस्पीकरों पर बजाई गई, ताकि जर्मन सुनें। संगीत ने कहा-हम जिंदा हैं। हिटलर लेनिनग्राद को मिटा न सका। 10 लाख लाशें, फिर भी शहर ने हार नहीं मानी। और अब क्यूबा। चलिए उधर का चक्कर भी लगा ही लेते हैं। 1962 से अमेरिकी प्रतिबंध। कास्त्रो अपने बिस्तर पर मरा-90 साल का। राऊल ने सत्ता भाई को दी। शासन बदला नहीं। 64 साल की सबसे लंबी आर्थिक घेराबंदी और दुनिया का सबसे छोटा देश सबसे बड़ी ताकत के सामने खड़ा रहा। टाइम मशीन वापस लौट रही है। ट्रंप ने बम से शुरू किया। अब भूख पर आ गए हैं। 'ऑपरेशन इकनॉमिक आउटकास्ट।' यही कॉन्टिनेंटल सिस्टम है 21वीं सदी में। यही हुक्म-ईरान से कोई व्यापार नहीं करेगा। तो इतिहास क्या कहता है? घेराबंदी काम करती है-जब दुश्मन छोटा हो, घिरा हो, और उसके पास कोई दूसरा रास्ता न हो। घेराबंदी नाकाम होती है-जब दुश्मन के पास विकल्प हों, जब वह दर्द सहने का आदी हो, जब वह मरने को तैयार हो, मगर झुकने को नहीं। ईरान लेनिनग्राद और क्यूबा को देख रहा है। हम तेहरान में उतरते हैं। आप भी यही सोच रहे हैं न, जब हथियार इतने ताकतवर हों, तब भी अमेरिका घेराबंदी के पुराने तरीके अपनाने को क्यों मजबूर हुआ है?
मिलते हैं अगले सफर पर...
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