मगर यह सब तो बहुत पहले से वे जानते हैं, जो सच्ची आस्था रखते हैं। असल में जो कोई हिंसा, व्यभिचार, नफरत भेद का इस्तेमाल करते हैं, वे आस्थावान हो नहीं सकते, न तो धार्मिक ही हो सकते हैं। चूंकि उनका मार्ग अधर्म का है, जिनका विश्वास मानवता में नहीं। वे सिर्फ हिन्दू ही नहीं होते, वे कभी इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिक्ख या नास्तिक भी नहीं हो सकते। नास्तिक भी क्योंकि मानवतावादी तो होते हैं।
काश कि यह बयान शाखाओं बारंबार दिया गया होता।
वैसे इन सबसे परे कुछ और भी ख्याल आते हैं। किसी की आस्था को कोई और प्रमाणित नहीं कर सकता। धर्म के दो स्तर हैं। उसके आध्यात्मिक पक्ष की कोई हदबंदी नहीं हो सकती। वह अनंत है। उपनिषद कहते हैं कि वह क्या नहीं है, 'नैति-नैति' ही कहा जा सकता है। वह क्या है, यह बताना मुश्किल है। अध्यात्म सरहदों से ऊपर है, जहां सोच खत्म हो जाती है। अभ्यास या सिलसिला अविरल बहता है ऐक्य बनता है। पर धर्म का प्रशासकीय ढांचा इससे अलग है। वहां सीमा होती है। चौकी बैठाते हैं, स्वयंभू पहरेदार डंडा बजाते हैं।
अध्यात्म में सरहद हो सकती है, जहां से आना-जाना कोई खास बड़ी बात नहीं। कई तहज़ीब मूल्य साझा हो जाते हैं। अली को गाते-गाते किशन कन्हैया को गाने लगते हैं। पर सीमा पक्की होती है। सीमा की जरूरत बंटवारा है। उसके बिना उसका गुजारा नहीं चलता। हर मज़हब के प्रशासकीय तंत्र में सीमाएं खिंची जाती हैं। यहां आदान-प्रदान के लिए परमिट जारी होता है। विशेषकर स्त्रियों को कोई इज़ाजत नहीं मिलती। वे आध्यात्मिक तौर पर आज़ाद होने पर भी विरले ही प्रशासकीय ढांचों की अदला-बदली कर सकती हैं। उन्हें सूफी, भक्ति, विदुषि संतों ने किया जिन्होंने फिर संसार के किसी विधान को नहीं माना।
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