सर जी कहते रहे कि हल्द्वानी के रामलीला मैदान में शुद्धिकरण यज्ञ करने वालों पर 'एफआइआर' हो, 'एफआइआर' हो, एक बड़े दलित नेता का अपमान किया गया है…। ऐसी बातें सुनते बीस दिन गुजर गए लेकिन 'एफआइआर' न हुई। उल्टे सर जी पर ही 'एफआइआर' हो गई। आरोप लगे कि ये सत्ता दल की साजिश है। सत्ता बोली कि हमारा उनसे कोई लेना-देना नहीं…।
फिर एक दिन वर्गभेद और जाति भेद की सैद्धांतिकी एक-दूसरे में गड्डमड्ड होती हुई 'दो हिंदुस्तान' खोजती नजर आई। चाय की हर दुकान पर दो तरह के कप होते हैं। एक कांच के गिलास, दूसरे पेपर कप या प्लास्टिक कप। एक चैनल ने तुरंत वह फोटो दिखाया जिसमें 'टू कप' सैद्धांतिकी खोजते सरजी 'सिरेमिक कप' में चाय पीते दिख रहे थे और दूसरे 'पेपर कप' में पी रहे थे।
'दो तरह के कपों' की मौलिक खोज शाम तक पुरानी हो गई। कई चर्चक कहते रहे कि हम सब पेपर कप में चाय पीते हैं। 'पेपर कप' सस्ता होता है। 'इस्तेमाल करो और फेंको' वाला होता है। कांच का महंगा होता है। बार-बार धोने के लिए पानी नहीं होता।
फिर एक ने कह दिया कि भेदभाव के सारे सवाल हिंदू धर्म से ही क्यों होते हैं, दूसरों से क्यों नहीं होते। क्या जाति सिर्फ हिंदुओं में है या कहीं और भी है..! ऐसे मार्मिक सवालों के बाद बहसें अक्सर 'गोलपोस्ट' बदलने लगती हैं।
फिर कुछ बहसें भारत की नई बढ़ी हुई जीडीपी के नाम रहीं। जैसे ही सरकार ने खबर दी कि पिछली तिमाही की जीडीपी 7.8 फीसद रही, वैसे ही विपक्षी कूद पड़े। एक कहिन कि इनको तो अर्थशास्त्र की कोई समझ ही नहीं है? एक विपक्षी विशेषज्ञ कहिन कि असल जीडीपी कुल 2.7 फीसद हो सकती है। 7.8 फीसद तो संभव ही नहीं। जब उनको सत्तापक्ष के एक अर्थशास्त्री ने आंकड़ों के साथ समझाया कि सिर्फ हो ही नहीं सकती, बल्कि 'है भी', तो कहने लगे कि हो सकता है जीडीपी चार या पांच फीसद हो। विशेषज्ञ पूरे समय हंसते ही दिखे।
फिर एक दिन एक चैनल में विपक्षी नेता जी 'मनुस्मृति' जलाते दिखे। इसके बाद 'मनुस्मृति' दो दिन तक बहसों में जिंदा रही। इस बीच राममंदिर के प्रबंधन व चंदा चढ़ावे आदि की देखरेख के लिए एक पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र को 'सीईओ' नियुक्त किया गया, तो एक विपक्षी नेता ने तंज किया कि 'आपरेशन सिंदूर' की असलियत छिपाने के लिए नियुक्ति की गई है। जब सत्ता ने बयान को 'देशविरोधी' कहा तो उनके दल ने उनसे किनाराकशी कर ली।
फिर एक दिन एक अभिनेत्री ने 'जौहर' पर सवाल उठा दिया… कि मैं बलात्कार से बचने के लिए मरने वाली नहीं… यानी बलात्कार से बचने के लिए जौहर नहीं करने वाली..! इसके बाद काफी विवाद हुआ। एक एंकर ने कहा कि क्या करें, बेरोजगार हैं।
अथ 'जन्माष्टमी' और योगी जी मथुरा में दो दिवसीय प्रवास पर। मथुरा को हजारों करोड़ की विकास योजनाओं की सौगात का एलान। फिर बांके बिहारी मंदिर में पूजा अनुष्ठान। फिर योगी जी द्वारा 2027 के चुनाव में अपनी बहुमत की सरकार बनाने की घोषणा।
फिर इधर अखिलेश जी और काकरोच जनता पार्टी के एक नेता के मिलने की खबर और उधर काकरोच जनता पार्टी का दिल्ली में निशू को न्याय दिलाने के लिए थाने के पास धरने का और सभी काकरोचों को पहुंचने का आह्वान। उधर एक चैनल की खबर रही कि काकरोच जनता पार्टी में दो फाड़।
काकरोच पार्टी के एक सदस्य मनीष ब्रह्मभट्ट ने अपने को अभिजीत दिपके की काकरोच जनता पार्टी से अलग कर 'काकरोच जनता पार्टी-(डेमोक्रेटिक)' बनाने का एलान किया और आरोप लगाए कि दिपके ने मनमाने तरीके से आठ लोगों की टीम बना ली है, जिसमें उन जैसे पार्टी की स्थापना करने वाले सदस्यों से पूछा तक नहीं गया।
इसी बीच कुछ चैनल 'दिमागी नक्सल' की व्याख्या करने में व्यस्त रहे। कुछ बताते रहे कि 'दिमागी नक्सल' ये, 'दिमागी नक्सल' वो… कि दिमागी नक्सल लाल काकरोच जैसे हैं… कि जेन-जी जैसे!
इसके बाद भाजपा के बरक्स विपक्षी दलों के बीच जारी नए 'रील व मीम' के संग्राम पर एक चर्चा आई। फिर सबने अपने पक्ष के रील, मीम, वीडियो आदि दिखाए और मालूम हुआ कि आजकल कोई कम नहीं… सब एक-दूसरे की हंसी उड़ाने में माहिर हैं। फिर भी सभी के चेहरों पर गुस्सा दिखता है।
इससे स्पष्ट होता है कि जो राजनीतिक वैचारिक हिसाब-किताब सड़क या चुनाव से तय नहीं हो पाते, उनको आजकल 'इंस्टाग्राम' और उस पर आते 'पांच से पंद्रह सेकंड के 'मजाहिया' रीलें, मीम, वीडियो, पोस्टर आदि तय करते हैं।
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