यहां एक बात समझनी होगी कि जो कार्रवाई कानूनी दायरे में हुई और अदालत की प्रक्रिया के बाद हुई, उसे सनातन से जोड़ना आखिर कहां तक जायज है? इस पूरे मामले में एक और बात सामने आई, जिसे असदुद्दीन ओवैसी ने उठाया. ओवैसी ने इसे वक्फ की जमीन बताया. अखिलेश यादव और ओवैसी के इन दावों से ही दो बड़े सवाल निकलकर सामने आते हैं. पहला, अगर यह सरकारी जमीन थी तो इतने वर्षों तक वहां कब्जा कैसे रहा? और दूसरा, अगर यह वक्फ की संपत्ति थी तो उसकी स्थिति, रिकॉर्ड और इस्तेमाल की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
हर अवैध कब्जे में सपा को धर्म क्यों दिखता है?
सपा को हर अवैध कब्जे में धार्मिक रंग क्यों दिखाई देता है? संविधान की बात करने वाले अखिलेश यादव को यह समझना होगा कि प्रशासनिक कार्रवाई अदालत की प्रक्रिया के बाद हुई है. ऐसे में उनका सवाल यह होना चाहिए था कि सरकारी जमीन पर इतने वर्षों से कब्जा क्यों था? वहां निर्माण कैसे हुआ? जमीन का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा था और अगर वहां व्यावसायिक गतिविधियां चल रही थीं, तो उसका पैसा किसके पास जा रहा था? लेकिन इन सवालों के बजाय अखिलेश यादव ने पूरे मामले को सनातन से जोड़ दिया. यही वह जगह है जहां उनकी राजनीति पर सवाल खड़े होते हैं. सनातन को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ने वाले अखिलेश यादव वक्फ की संपत्तियों और उनसे जुड़ी गड़बड़ियों पर क्यों नहीं बोलते?
सपा राज में आजम खान के दौर पर उठे सवाल
उत्तर प्रदेश में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर सबसे गंभीर सवाल उसी दौर में उठे, जब अखिलेश यादव की सरकार थी और आजम खान के पास वक्फ से जुड़ी जिम्मेदारियां थीं. सपा सरकार में ज्यादातर समय वक्फ का जिम्मा आजम खान के पास रहा. इसी दौरान वक्फ बोर्डों की कार्यप्रणाली, संपत्तियों और उनके इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल उठे. आजम खान पर आरोप लगे कि उन्होंने प्रदेश में कई जगह अपने करीबियों को वक्फ से जुड़े पदों पर जगह दिलाई और वक्फ संपत्तियों के नाम पर करोड़ों रुपये की हेरफेर हुई. स्थिति यह थी कि मुस्लिम समाज से जुड़े लोगों और नेताओं ने भी इन मामलों की जांच की मांग उठाई. यानी सपा राज में हुई गड़बड़ियों का सवाल केवल राजनीतिक विरोधियों ने नहीं उठाए थे. वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर गंभीर आपत्तियां उस व्यवस्था के भीतर से भी सामने आई थीं.
ऐसे में आज जब वक्फ संपत्तियों को लेकर सवाल उठते हैं, तो सपा को जवाब देना चाहिए कि उसके शासनकाल में वक्फ व्यवस्था किस तरह संचालित हुई? संपत्तियों का इस्तेमाल कैसे हुआ? उनका किराया और राजस्व कहां गया? और जिन लोगों को वक्फ व्यवस्था की जिम्मेदारी दी गई, उनकी जवाबदेही तय क्यों नहीं हुई?
वक्फ के नाम पर जमीन-संपत्ति का खेल कब रुकेगा?
आज वक्फ संपत्तियों को लेकर पूरे देश में बहस चल रही है. बड़ी संख्या में संपत्तियां वक्फ के नाम पर दर्ज हैं और कई जगह जमीनों पर दावे को लेकर विवाद हैं. सवाल सीधा है- वक्फ की संपत्ति अगर किसी धार्मिक और सामाजिक उद्देश्य के लिए समर्पित है, तो उसका इस्तेमाल निजी हितों के लिए कैसे हो सकता है? लखनऊ, मेरठ, प्रयागराज, अलीगढ़ और झांसी जैसे शहरों में वक्फ संपत्तियों के इस्तेमाल और प्रबंधन को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं. कहीं संपत्तियों को बेहद कम कीमत पर निजी हाथों में देने की शिकायतें सामने आईं, तो कहीं व्यावसायिक इस्तेमाल के जरिए कमाई किए जाने के सवाल उठे.
ऐसी स्थिति में वक्फ की हर संपत्ति का रिकॉर्ड सामने आना चाहिए. किस जमीन का मालिकाना रिकॉर्ड क्या है, उसका इस्तेमाल कौन कर रहा है, किराया कितना लिया जा रहा है और वह पैसा कहां जा रहा है. वक्फ के नाम पर किसी को भी कानून से ऊपर रहने की छूट नहीं मिल सकती.
सहारनपुर ने वक्फ के नाम पर चल रहे खेल का आईना दिखाया
सहारनपुर का मामला इसी बड़े सवाल को सामने लाता है. कलेक्ट्रेट परिसर की जमीन को लेकर प्रशासन ने कार्रवाई की. सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश में जमीन को सरकारी माना गया और अनधिकृत कब्जे को लेकर कार्रवाई की गई. इस मामले में यह भी सामने आया कि जिस जमीन को लेकर विवाद था, वहां व्यावसायिक गतिविधियों का इस्तेमाल हो रहा था और किराया वसूला जा रहा था. ऐसे में विपक्ष को यह सवाल उठाना चाहिए कि अगर जमीन वास्तव में वैध रूप से वक्फ की थी, तो उसके रिकॉर्ड क्या हैं? वहां व्यावसायिक गतिविधियां किस आधार पर चल रही थीं? किराया किसके खाते में जा रहा था?
लेकिन इन सवालों के बजाय कार्रवाई को धार्मिक रंग दिया गया. यही सपा की राजनीति पर सबसे बड़ा सवाल है. अगर सरकारी जमीन पर कब्जा है, तो कार्रवाई होनी चाहिए. अगर वक्फ की जमीन है, तो उसके रिकॉर्ड और इस्तेमाल की जांच होनी चाहिए. दोनों ही परिस्थितियों में कानून अपना काम करेगा.
कानून की कसौटी धर्म देखकर नहीं बदल सकती
वक्फ की संपत्ति होने का मतलब यह नहीं कि वह कानून और न्यायिक समीक्षा से बाहर हो गई. उसी तरह किसी जमीन पर धार्मिक ढांचा खड़ा हो जाने से सरकारी जमीन का स्वरूप नहीं बदल जाता. सवाल अखिलेश यादव से सीधा है- अगर मंदिरों, मठों और सनातन से जुड़े मामलों पर सवाल उठाना उनका राजनीतिक अधिकार है, तो वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और उनके शासनकाल में उठे गंभीर सवालों पर जवाब देना भी उनकी राजनीतिक जिम्मेदारी है.
वक्फ किसी राजनीतिक दल की निजी जागीर नहीं है. यह जिस उद्देश्य के लिए समर्पित संपत्ति है, उसकी रक्षा और पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करना जरूरी है. सहारनपुर ने एक बात बिल्कुल साफ कर दी है कि कानून की कार्रवाई को धार्मिक चश्मे से देखने की राजनीति ज्यादा दिन नहीं चल सकती. अगर सपा संविधान और कानून की बात करती है, तो उसे यह भी बताना होगा कि उसके शासनकाल में वक्फ संपत्तियों को लेकर उठे सवालों पर उसने क्या किया. मंदिरों पर सवाल और वक्फ पर चुप्पी का यह दोहरा मापदंड अब सवालों के घेरे में है.
(लेखक इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
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