गुजराती पर्यटक इन दिनों अपने दबंग सार्वजनिक आचरण—बेहद आत्मविश्वास और और 'सब कुछ हमारा हक़ है' वाले तेवरों के चलते सुर्खियों में आए हैं. यह व्यवहार अपने देश में भी और खास तौर पर विदेशों में भी देखने को मिलता है. उन्हें एयरपोर्ट के रनवे पर, पैंगोंग झील पर या बुर्ज खलीफा के ऊपर गरबा करते हुए देखा जा सकता है. जर्मनी में बसों में सफर करते समय वे पूरे सुर में एक साथ गाने गाते हुए दिखते हैं. या फिर उड़ान के दौरान सीटों की कतारों के बीच खाना पास करते हुए, जिससे पूरे केबिन में ऐसी खुशबू फैल जाती है जो दूसरे यात्रियों को असुविधाजनक लग सकती है.
यह सोच कि उनके ऐसे कामों से दूसरों को परेशानी हो सकती है, शायद ही कभी इन लोगों के दिमाग में आती है. इसके पीछे की वजहें काफी गहरी हैं:
असल में, बात एक नई अस्मिता, यानी पहचान की है, जो कन्हैयालाल मुंशी की सोच से काफी अलग है. मुंशी एक प्रतिष्ठित साहित्यकार थे. उन्होंने 'गुजरातनी अस्मिता' का गुणगान करने वाले लोकप्रिय और प्रभावशाली उपन्यास लिखे तथा राजनीति में उनका झुकाव दक्षिणपंथी रखा, पर भद्देपन को उन्होंने कभी महिमामंडित नहीं किया. दरअसल, जब 1956 में महागुजरात आंदोलन शुरू हुआ और बॉम्बे स्टेट से अलग गुजरात बनाने की मांग उठी, जिसमें बॉम्बे यानी आज का मुंबई भी शामिल था, तब मुंशी, जो गुजरातनी अस्मिता के शुरुआती झंडाबरदार थे, इस विचार के विरोध में थे. उनके लिए महानगर वाला मुंबई गुजरात का हिस्सा नहीं था.
गुजरातनी अस्मिता का सिकुड़ना राज्य के नक्शे पर बनने से पहले ही शुरू हो गया था. गुजराती साहित्य के शिखर पुरुष उमाशंकर जोशी ने चेतावनी दी थी कि नकली रस‑गरबा को गुजरात की एकमात्र सांस्कृतिक पहचान के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए (समयरंग, जनवरी 1958, पेज 237). विडंबना यह है कि गुजराती भाषा से प्यार इस अस्मिता के विचार का कभी मुख्य हिस्सा नहीं रहा, जबकि इसी क्षेत्र ने कुछ बेहतरीन कवि, उपन्यासकार, हास्य लेखक और निबंधकार दिए हैं. गुजरात ने कारोबार की आम छवि से कहीं आगे जाकर देश को कई बड़े नाम भी दिए. (मैंने अपनी सीरीज गुजरात जायंट्स में ऐसे कई लोगों के बारे में लिखा है.) फिर भी, पिछले तीन से चार दशकों में उनके नाम लोगों की याददाश्त से पूरी तरह गायब हो गए हैं.
चिमनभाई पटेल के मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरातनी अस्मिता ने हिंसक रूप ले लिया. नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं के साथ टकराव में बांध के समर्थन में रहने वाले लोगों ने, जिन्हें अक्सर राज्य की चुपचाप मिली मंजूरी से हौसला मिलता था, गुंडागर्दी का सहारा लिया. बांध के सभी समर्थक अस्मिता के इस आक्रामक रूप से सहमत नहीं थे, फिर भी यह सोच जड़ पकड़ गई. उस समय विपक्ष की आम राजनीतिक कहानी थी, 'केंद्र सरकार गुजरात के साथ अन्याय कर रही है.' मुख्यमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने भी इसी मुद्दे का सहारा लिया और यूपीए सरकार पर राज्य की अनदेखी करने का आरोप लगाया.
दूसरी जगहों पर गुजरातियों को लेकर पुरानी धारणा बनी रही. उन्हें अमीर तो माना जाता था, लेकिन उनमें शिष्टता और पढ़ाई-लिखाई की कमी मानी जाती थी. इस सामान्य धारणा में रजनी कोठारी, धीरूभाई शेठ और घनश्याम शाह जैसे बड़े नामों को आसानी से नजरअंदाज कर दिया गया. ये सभी देश की प्रमुख बौद्धिक संस्था सीएसडीएस से जुड़े महत्वपूर्ण नाम थे. इस धारणा में थोड़ी सच्चाई ज़रूर थी, लेकिन उसे अतिशयोक्ति के सहारे एक हास्यास्पद चित्र में बदल दिया गया. गुजरातियों का उनकी टूटी‑फूटी अंग्रेज़ी के लिए मज़ाक उड़ाया गया, और उन पर यह ठप्पा लगाया गया कि वे बस पैसा बनाने और घोटाले करने के अलावा कुछ नहीं जानते.
गुजरातनी अस्मिता की सबसे कमजोर बातों में से एक हमेशा से अपनी मातृभाषा के लिए सच्चे प्यार की कमी रही है. फिर भी इस वजह से गुजरातियों ने अस्मिता का झंडा दूसरे संकेतों के जरिए लहराना बंद नहीं किया. मोदी का उभरना इनमें से सबसे महत्वपूर्ण संकेतों में से एक बन गया. इसके साथ ही उदारीकरण के बाद नए मध्यम और उच्च वर्ग का उभरना भी एक बड़ा कारण था. 2002 की हिंसा के बाद दक्षिणपंथ ने मोदी को लंबे समय से इंतजार किए जा रहे उद्धारकर्ता के रूप में पेश किया. सांप्रदायिक हिंसा के दौरान और उसके बाद उन्होंने जो किया और जो नहीं किया, उसके लिए मोदी की कड़ी और सही आलोचना हुई. लेकिन मोदी ने इस आलोचना को गुजरात और गुजरातियों पर हमला बताकर उसका मतलब ही बदल दिया.
गुजरात के हिंदू समाज के एक बड़े हिस्से ने, दुख या शर्म महसूस करने के बजाय, मोदी की वजह से उन लगभग सभी चीजों पर गर्व करना शुरू कर दिया, जिन पर कभी शर्म महसूस हो सकती थी, यहां तक कि हिंसा पर भी. उन्होंने ऐसा माहौल बनाया और बनाए रखा, जिसमें सही और गलत के बीच की साफ रेखाएं धुंधली होकर राय और बहस का मुद्दा बन गईं. गलत चीजों का बचाव करना मुख्यधारा की सोच बन गया, जिसे सरकार की नीतियों और कामों से भी मजबूत समर्थन मिला. दूसरों को तकलीफ़ देने की हिचक धीरे‑धीरे अधिकार‑बोध और दबंगपन में बदल गई. 'गांधीजी गुजराती मोदीजी गुजराती' जैसे लोकप्रिय गानों ने पूरी कहानी को बहुत सरल बना दिया—गांधी और मोदी दोनों को गुजरात का गौरव घोषित करते हुए गुजरातियों को 'लहेरी लाला' यानी मौज में डूबे लोग ठहराया गया, जो कभी सिर्फ़ सूरतियों के लिए कहा जाता था.
बेशक, यह बात सभी गुजरातियों पर लागू नहीं होती. इसके बहुत बड़े अपवाद हैं.घर हो या बाहर, सार्वजनिक जगहों पर हंगामा करने वालों को अब 'मोदी की ताक़त, गुजरात की ताक़त' के साथ-साथ नए पैसे की ताकत से भी हौसला मिला है. पहले गुजराती यात्रियों की वजह से होने वाली एकमात्र परेशानी शायद अंताक्षरी खेलना होती थी, जो पूरे भारत में पसंद किया जाने वाला खेल है, और जहां भी जाते, वहां गुजराती खाना मिलने पर उनका जोर होता था. 'रोम में रस-पुरी और पेरिस में पात्रा' 1990 के दशक में ट्रैवल एजेंसियों की एक मशहूर टैगलाइन थी. रोम में पिज्जा के बजाय रस-पुरी पसंद करने के लिए गुजरातियों का मजाक उड़ाया जाता था. इसके अलावा, उनकी आदतें दूसरे भारतीय पर्यटकों से बहुत अलग नहीं थीं और उन्हें अलग से निशाना नहीं बनाया जाता था.
हालांकि, कुछ गुजराती पर्यटकों का व्यवहार और पिछले कुछ सालों में इंटरनेट पर इसके लिए बार-बार होने वाली आलोचना एक खतरनाक मिश्रण का नतीजा है: धार्मिक कट्टरता, मोदी की मानी जाने वाली वैश्विक हैसियत और यह विश्वास कि उनके नेतृत्व में भारत की दुनिया की नजरों में तरक्की हुई है. मोदी के शासन में बुनियादी शिष्टाचार और दूसरों के अधिकारों का सम्मान जैसे फैशन से बाहर हो गए हैं. संदेश साफ़ है: गुजराती धमाके के साथ आ गए हैं, और वे आपकी बैंड बजा देंगे. इसी सोच से प्रेरित कुछ पर्यटक अनुचित आचरण करते हैं, जिससे पूरे समुदाय की छवि धूमिल होती है. जाहिर है, पूरे राज्य को एक ही रंग में नहीं रंगा जा सकता. लेकिन कई गुजराती जिस शर्मनाक बर्ताव में फंसे हैं, उसे न तो माफ़ किया जा सकता और न ही हल्के में लिया जा सकता.
उर्विश कोठारी अहमदाबाद में रहने वाले एक कॉलमिस्ट और लेखक हैं. वे @urvish2020 पर ट्वीट करते हैं. ये उनके निजी विचार हैं.
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