शरीर के हर अंग को आधुनिकता और तरक्की के इस दौर में 'नक्सल' नामक चमकते हुए गहने से नवाजा जा चुका था। हालात यह थे कि इंद्रसभा से लेकर धरती तले तक, मस्तिष्क यानी दिमाग तक को यह तमगा और मुकुट पहना दिया गया था। हर कोई अपनी वैचारिक और सामरिक श्रेष्ठता सिद्ध करने में जुटा था, लेकिन बेकसूर पग, यानी पैर पूरी तरह उपेक्षित, ज्यों के त्यों, उन्हीं घिसी-पिसी पुरानी चप्पलों और नंगे छालों से खुद को ढककर अपनी लाज बचाने की जुगत में लगे रहे। मगर आखिर कब तक सहते? इस आधुनिक युग में जहां शरीर के हर हिस्से को 'नक्सल' का कोई न कोई डिजाइनर गहना पहनाने की होड़ मची है, वहीं हमारे बेचारे पैर हमेशा की तरह उपेक्षित रहे। वे आज भी वही घिसी-पिसी चप्पलों और सीधे-सादे छालों के सहारे अपनी इज्जत बचाने की जुगत में लगे रहते हैं।
भला कब तक वे बिना शिकायत के कोड़े खाते और लंबी दूरियां नापते रहते? एक दिन दोपहर की झपकी के दौरान सपनों में आकर पैरों ने सीधे-सीधे बगावत का झंडा उठा लिया। तल्ख तेवर में बोले- 'या तो हमें भी नक्सली घोषित करो, वर्ना हम हड़ताल पर चले!' सपने में भी ऐसी नौबत की उम्मीद कोई नहीं कर रहा था। पैरों को थोड़ा मनाया जाए, पुचकारा जाए, पर उससे पहले वे गायब हो चुके थे। हाथों ने बिस्तर की चादर से लेकर चारपाई के नीचे तक खूब टटोला, मगर सिवाय खालीपन के कुछ नहीं मिला। तभी कमरे के कोने से एक ठहाका गूंजा। पैरों की आवाज हवा में तैरते हुए आई- 'यह तो सिर्फ ट्रेलर है, पिक्चर अभी बाकी है!'
किसी तरह कलेजा मजबूत करके बंद आंखों से ही उससे पूछा गया- 'यारों, दुनिया तो शरीफ बनने की फरमाइश करती है, तुम्हें अचानक यह नक्सली बनने का भूत क्यों सवार हो गया?' पैर ने हंसते हुए कहा- 'भइया, शरीफ बनकर कौन-सा तमगा मिल गया? जिंदगी भर तुम्हारा खरा-खोटा ढोया, छाले पड़ गए, और मिला क्या? सिर्फ धूल-धक्कड़! आजकल चलन शरीफों का नहीं, विद्रोही होने का है। जब दिमाग और जुबान तक नक्सली हो चुके हैं, तो क्या हमारे पास भी थोड़ा-सा हक नहीं है?' यह धमकी नींद उड़ाने के लिए काफी थी। सुबह पैर अपनी जगह पर बिल्कुल सीधे और शांत रखे थे, लेकिन उनका तेवर कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। साफ था कि अब थके-हारे पैरों को थोड़ा लाड़-प्यार और सम्मान देना ही पड़ेगा, वरना एक दिन सचमुच चलना-फिरना दूभर कर देंगे! तभी पैरों ने उचक कर कहना जारी रखा- 'आखिर हम अभागे पैरों के भी कुछ छिपे हुए अरमान हैं, हमारे भी कुछ अपने दबे-कुचले सपने हैं। कब तक एड़ियां घिसते रहें और लंबी दूरी नापते रहें? किसी सभा सोसाइटी में हमारे सड़ेपन को देखते ही लोग नाक-भौं सिकोड़कर नाक पर रुमाल चढ़ा लेते हैं, कितना अपमान सहते हैं? कई बार तो उपेक्षा और दुत्कार के बीच हम एक जोड़ी टूटी चप्पल तक के लिए तरस जाते हैं। आजकल इज्जत शरीफों की नहीं, उन्हीं की होती है जो नक्सल हैं।'
यह समझ में आना चाहिए कि दिमागी नक्सलवाद की गाड़ी अब इन थके-हारे पैरों के सहारे ज्यादा दूर तक नहीं चल सकती। अगर इन्हें समय रहते सम्मान नहीं मिला, तो एक दिन पूरा शरीर धराशायी हो जाएगा। यह सोचना खास लगता है कि क्या सचमुच हमारे सारे अंग अपने हक के लिए खड़े हो गए हैं? क्या वे दिन अब दूर नहीं, जब हर आम आदमी का चलना-फिरना भी बगावत माना जाएगा? पैर अपनी जिद पर अड़े हों और पैरों का मालिक सोचे कि इस पैदली नक्सलवाद से कैसे बचा जाए। तभी शरीर के शेष अंग भी आपस में उलझ पड़ें और दिमाग ऊंचे सिंहासन पर लेटे-लेटे, झुंझलाते हुए बोले- 'अरे ओ पैरों! क्या बगावत-बगावत का शोर मचा रखा है? भूल गए क्या कि इस पूरे शरीर के हुक्मरान हम हैं? तुम्हारी हैसियत ही क्या है हमारे फैसलों के बिना?' इसके बाद पैर नीचे जमीन पर डटे हुए, तल्ख तेवर में बोले- 'हुक्मरान? वाह! मजे की बात है। हुकूमत तुम्हारी चलती है, और कोड़े हमारी पिंडलियों पर तथा छाले हमारे तलुओं पर पड़ते हैं। कब तक तुम्हारी सनक और अहंकार का बोझ ढोते रहेंगे? आज हम ही घोषणा करते हैं कि हमें भी तुम्हारी तरह का तमगा चाहिए।'
दिमाग हैरान होकर उठ बैठा और बोला- 'अरे नासमझो! वह तो हमने आधुनिकता की दौड़ में टिके रहने के लिए, टीवी बहसों में भारी-भरकम शब्द बोलने के लिए और खुद को क्रांतिकारी दिखाने के लिए पहन रखा है। वह सिर्फ कहने की बात है, हकीकत में थोड़े ही कुछ है!' पैर ने ठहाका मारकर कहा- 'बस! यहीं तो तुम्हारा पाखंड पकड़ा गया। जब भाषणों में, बयानों में और तुम्हारी इस वातानुकूलित कुर्सी पर बैठकर नक्सली होना फैशन है, तो हम जमीन पर घिस-घिसकर क्यों सिर्फ 'मजदूर' बने रहें?'
समझाने की कोशिश करते हुए दिमाग बोला- 'अरे भाई, जरा सोचो तो सही। अगर तुम भी नक्सली हो गए, तो यह शरीर चलेगा कैसे? विकास की रफ्तार कौन पकड़ेगा?' पैर ने कहा- 'विकास? कौन सा विकास? वही विकास, जिसके नाम पर तुमने हमें हर जगह दौड़ाया, पर बदले में मिला क्या? सिर्फ छालों का दर्द और टूटी हुई चप्पलें? अब बहुत हो चुका। या तो हमें भी बराबरी का दर्जा दो, वरना आज से तुम्हारी यह लंबी-चौड़ी नीतियां यहीं धरी रह जाएंगी, क्योंकि हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ेंगे!'
दिमाग पसीना-पसीना हो गया। उसे समझ आ गया कि कागजी बगावत और वैचारिक पाखंड की यह दुनिया अब सचमुच पैरों के छालों से टकराने लगी है।
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